प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जीवन में पैसा कितना ज़रूरी है?
आचार्य प्रशांत: जितना किसी सत्कार्य के लिए चाहिए; दो रुपए में भी काम चल सकता है, दो अरब भी कम हो सकता है।
प्र: आचार्य जी, सत्कार्य मतलब?
आचार्य: काम ऐसा होना चाहिए जो पैसा माँगे। अपने लिए तो पैसा उतना ही चाहिए कि पेट भर जाए, और कितना माँगोगे भाई? नहीं तो जेब में ही भरना पड़ेगा। नहीं तो बैंक में डाल रखा है, स्टॉक में लगा रखा है, बुलियन में लगा रखा है और तुम उसकी पहरेदारी कर रहे हो। जैसे होता है न, पिक्चरों में देखते होगे कि वो सोने-चाँदी का ढेर पड़ा हुआ है, उस पर एक साँप बैठा हुआ है, और वो क्या कर रहा है? वो पहरेदारी कर रहा है; वो तो करना नहीं है।
अपने लिए कितना चाहिए होता है आदमी को? खाना, पहनना, सर के ऊपर छत; और करोगे क्या? उससे ज़्यादा तुम कमा भी लोगे तो उपभोग नहीं कर सकते, एक आदमी कितना उपभोग कर लेगा? लेकिन अगर जीवन में कोई महत् लक्ष्य हो तो धन की आवश्यकता पड़ सकती है।
महामना मदनमोहन मालवीय — कौन थे वो?
श्रोता: बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक।




