प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। तो आचार्य जी, मेरा जो सवाल है वो शिक्षा से सम्बन्धित है। मैं जानना चाहती हूँ कि सच्ची शिक्षा क्या है? जैसे कि शिक्षा के प्रति हमारी विचारधारा क्या होनी चाहिए? जैसे कि हम स्कूल, कॉलेजेज, यूनिवर्सिटीज में जाते हैं तो जो जितने प्रसिद्ध इन्स्टिट्यूशन (संस्थान) में जाता है उसे सामाजिक मान्यता उतनी ज़्यादा मिलती है। यहाँ तक कि जो ऊॅंचे पद पर समाज में काम करता है उसे भी उतनी ही ज़्यादा मान्यता मिलती है। ऐसी मान्यताएँ भी समाज में बहुत प्रचलित है।
तो इन सब से होता क्या है कि जो माँ-बाप हैं उनकी इसी सोच के कारण ज़्यादा-से-ज़्यादा बड़े ट्यूशन्स-इन्स्टिट्यूशन में अपने बच्चे को डालने की उनकी कोशिश रहती है। और इन सबके बीच जो शिक्षा का मर्म है, जो अन्तिम उद्देश्य है ‘चरित्र का निर्माण करना’, वो बहुत जगह धुॅंधला होता दिखाई दे रहा है। और इस बात का अनुभव मुझे भी हुआ है।
मुझे नीट में और बारहवीं बोर्ड में विज्ञान में बहुत कम अंक आये थे तो मैंने ये सोचा कि मैं दक्षिण एशिया का जो पहला महिला विद्यापीठ है एसएनडीटी वहाँ से बीए कर लूँ। लेकिन बीए करने के बाद मुझे हर वक्त यही ताने सुनने पड़ रहे हैं कि बीए तो कर लिया, वहीं नीट का दो-तीन अटेंप्ट (प्रयास) ज़्यादा देती तो कुछ अच्छा हो जाता। आज ये बी.ए. करके क्या मिलेगा? तो क्या शिक्षा का भी कोई स्तर होता है? कि ये शिक्षा अच्छी है, ये शिक्षा नीची है।
आचार्य प्रशांत: देखिए, उपनिषद् हमें समझाते हैं, दो तरह की विद्या होनी चाहिए। एक वो जो आपको सांसारिक ज्ञान दे, और दूसरी वो जो आपको आत्मज्ञान दे। दोनों तरह की शिक्षा बहुत आवश्यक है अगर व्यक्ति को एक स्वस्थ जीवन जीना है तो।
जो हमारी शिक्षा व्यवस्था है उसमें फिर दो तरह के भूलें होती हैं। पहली तो स्पष्टतया यही है कि आत्मज्ञान के लिए उसमें कोई जगह नहीं है, एकदम नहीं है। और दूसरी ये कि बाहरी जगत के बारे में भी उसमें जो कुछ बताया जाता है वो बस व्यावसायिक और वाणिज्यिक उद्देश्यों से बताया जाता है। शिक्षा का मतलब ही ये बन गया है। मैं बाहरी शिक्षा की बात कर रहा हूँ, भीतरी शिक्षा तो दी ही नहीं जाती, उसके लिए तो ज़रा भी कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ी गयी है, तो वो मुद्दा तो अलग रख दिया।




