क्लाइमेट चेंज: क्या कोर्ट, सरकार और मीडिया सच में बदलाव ला सकते हैं?

जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्या का समाधान केवल अदालतों, सरकारों या अन्य संस्थाओं से उम्मीद करके नहीं हो सकता, क्योंकि ये सभी संस्थाएँ उसी समाज और चेतना से निकलती हैं, जिसने समस्या को जन्म दिया है। वास्तविक परिवर्तन के लिए मनुष्य को बदलना होगा। जब तक अज्ञान, conditioning और उदासीनता बनी रहेगी, संस्थाएँ भी व्यवस्था को ही बनाए रखेंगी। इसलिए तथ्यों को सीधे देखना, मिथकों से ऊपर उठना और जागरूकता विकसित करना ही मूल परिवर्तन का आधार है।
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प्रश्नकर्ता: क्लाइमेट चेंज, हमारा देश बहुत ग्रसित है उससे। हमारे देश में कहीं-न-कहीं इलेक्शंस हर समय होते रहते हैं। हम सभी मुद्दों पर बात करते हैं। रोटी, कपड़ा, मकान, मैक्सिमम वोट वही ले जाते हैं, जो बोलते हैं कि महिलाओं को हर महीने ₹2000 देंगे, ₹2100 देंगे, ₹2500 देंगे। इन सब कारणों से सरकारें बदल जाती हैं। क्लाइमेट चेंज के बारे में हम कभी बात नहीं करते। हमारे में, हमारे पब्लिक में भी इतना ज्ञान नहीं है कि हम समझ पाएँ कि भाई, वह आगे जाके हमें क्या-क्या विपदाएँ देने वाली है।
अब हम आम आदमियों के पास में एक ही संशोधन है कि पॉलिटिशियंस सुन नहीं सकते हैं, कर नहीं सकते हैं। एक ही संशोधन हमारे पास होता है, जुडिशरी के पास जाएँ कि भाई, अगर जुडिशरी सिस्टम कुछ ऑर्डर्स निकाले, कुछ बोल सके कि भाई, नहीं, यह तो आपको करना मैंडेटरी है, तो इन लोगों को मानना पड़ता है। हम अपनी तरफ़ से क्या कर सकते हैं? जस्ट इसके बारे में आपसे समझना चाहता हूँ।
आचार्य प्रशांत: इतने मैंने एग्जाम्स क्लियर



