क्लाइमेट चेंज: क्या कोर्ट, सरकार और मीडिया सच में बदलाव ला सकते हैं?

Acharya Prashant

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क्लाइमेट चेंज: क्या कोर्ट, सरकार और मीडिया सच में बदलाव ला सकते हैं?
जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्या का समाधान केवल अदालतों, सरकारों या अन्य संस्थाओं से उम्मीद करके नहीं हो सकता, क्योंकि ये सभी संस्थाएँ उसी समाज और चेतना से निकलती हैं, जिसने समस्या को जन्म दिया है। वास्तविक परिवर्तन के लिए मनुष्य को बदलना होगा। जब तक अज्ञान, conditioning और उदासीनता बनी रहेगी, संस्थाएँ भी व्यवस्था को ही बनाए रखेंगी। इसलिए तथ्यों को सीधे देखना, मिथकों से ऊपर उठना और जागरूकता विकसित करना ही मूल परिवर्तन का आधार है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: क्लाइमेट चेंज, हमारा देश बहुत ग्रसित है उससे। हमारे देश में कहीं-न-कहीं इलेक्शंस हर समय होते रहते हैं। हम सभी मुद्दों पर बात करते हैं। रोटी, कपड़ा, मकान, मैक्सिमम वोट वही ले जाते हैं, जो बोलते हैं कि महिलाओं को हर महीने ₹2000 देंगे, ₹2100 देंगे, ₹2500 देंगे। इन सब कारणों से सरकारें बदल जाती हैं। क्लाइमेट चेंज के बारे में हम कभी बात नहीं करते। हमारे में, हमारे पब्लिक में भी इतना ज्ञान नहीं है कि हम समझ पाएँ कि भाई, वह आगे जाके हमें क्या-क्या विपदाएँ देने वाली है।

अब हम आम आदमियों के पास में एक ही संशोधन है कि पॉलिटिशियंस सुन नहीं सकते हैं, कर नहीं सकते हैं। एक ही संशोधन हमारे पास होता है, जुडिशरी के पास जाएँ कि भाई, अगर जुडिशरी सिस्टम कुछ ऑर्डर्स निकाले, कुछ बोल सके कि भाई, नहीं, यह तो आपको करना मैंडेटरी है, तो इन लोगों को मानना पड़ता है। हम अपनी तरफ़ से क्या कर सकते हैं? जस्ट इसके बारे में आपसे समझना चाहता हूँ।

आचार्य प्रशांत: इतने मैंने एग्जाम्स क्लियर किए ज़िंदगी में, अगर जुडिशरी से हो जाता न तो इंडियन जुडिशियल सर्विस भी क्लियर करके जज बन जाता।

प्रश्नकर्ता: नहीं मैं समझ सकता हूँ सर, क्योंकि हमारे...

आचार्य प्रशांत: आप नहीं समझ सकते, क्योंकि जहाँ समझाता हूँ वहाँ आप सो रहे होते हैं। जब मैं समझा रहा होता हूँ, तो आप सो रहे होते हैं। और फिर आप चाहते हो कि इंस्टीट्यूशनल तरीकों से काम हो जाए। क्यों? क्योंकि आप इंस्टीट्यूशंस का आधार नहीं समझ रहे हो। उन सब इंस्टीट्यूशंस का आधार हमारा ही अज्ञान है। तो इंस्टीट्यूशन के अंदर से तुम कैसे बदलाव ले आ लोगे? कि ला सकते हो?

एक बस में एक यात्री बैठा हुआ है। ठीक है? क्या वह कुछ भी करके बस को रोक सकता है? वह बस में दौड़े, भागे, दीवारों को मुक्का मारे, कुछ भी करके? और बस के ड्राइवर तक उसकी एक्सेस नहीं है, क्योंकि कोई एक ड्राइवर नहीं है। वो बस चल रही है अपने सारे यात्रियों की सामूहिक ऊर्जा से। कोई भी यात्री रोक सकता है क्या? एक ही तरीका है, बस से पहले तो नीचे उतरो। यह जो इंस्टीट्यूशनल बस है, पहले तो उससे नीचे उतरो और फिर बाहर उतर के देखो कि अब इस बस का करना क्या है?

फंडामेंटल इंस्टीट्यूशन का नाम जानते हैं आप क्या है? जिससे सारे इंस्टीट्यूशंस निकलते हैं। ईगो। ईगो, मैं उस फंडामेंटल इंस्टीट्यूशन से सबको उतारने का काम कर रहा हूँ। उससे उतर जाओ। जज इसी समाज से आता है न, या आसमान से उतरते हैं बेचारे? बोलिए। और वह भी प्रेसिडेंट से बंधे हुए हैं, पुराने नियम-कायदों से बंधे हुए हैं। अभी कल ही उन्होंने कहा कि पॉलिसी मैटर्स पर तो हम कुछ बोलेंगे ही नहीं। वी आर गार्डियंस ऑफ द कॉन्स्टिट्यूशन। अगर कोई पॉलिसी सीधे-सीधे कॉन्स्टिट्यूशन को वायलेट कर रही होगी, तो हमारे पास आ जाना। वरना पॉलिसी क्या बना रही है? लेजिस्लेचर, वो जाने। देयर इज़ एन इंस्टीट्यूशनल डिवीजन ऑफ पावर्स एंड रिस्पॉन्सिबिलिटी। लेजिस्लेचर जो काम कर रहा है, उसमें जुडिशरी दखल नहीं देगी। उन्होंने ख़ुद कह दिया है।

और यही व्यवस्था बनाई गई है। और लेजिस्लेचर माने क्या होता है? वही लोग, जिनको आप वोट दे रहे हो। और जुडिशरी ने तो बोल दिया कि हम लेजिस्लेचर के काम में दखल नहीं देंगे। बिल्कुल ठीक बोला, क्योंकि संविधान ने ही तय कर रखा है कि कौन कितना करेगा और कहाँ तक जाएगा।

हाँ, जुडिशियल एक्टिविज़्म दिखाते हैं। राइट टू लाइफ़ है, आर्टिकल 21। उसकी एक ज़्यादा जेनरस, एक ज़्यादा लिबरल परिभाषा करती है जुडिशरी कई बार। तो राइट टू लाइफ़ में राइट टू क्लीन एनवायरमेंट भी शामिल करने की कोशिश करती है। यह सब काम जुडिशरी करने की कोशिश करती है अपने तल पर। पर ज़्यादा करेगी, तो फिर वो कहलाता है जुडिशियल ओवररीच कि जितने तुमको संविधान प्रदत्त अधिकार हैं, तुम उससे आगे जाने की कोशिश कर रहे हो, यू आर ओवरलैपिंग योरसेल्फ। वो नहीं कर सकते।

पर हम क्या कह रहे हैं? नहीं। एग्जीक्यूटिव कर दे। अच्छा, ठीक है, यह जो सरकारी तंत्र है एनफोर्समेंट वाला, यह कर दे, यह लोग आकर के पराली जलना रुकवा दें। ये लोग आकर के वाहनों का चालान काट दें। अच्छा, अच्छा, एग्जीक्यूटिव वाले नहीं कर रहे, तो आप लोग कुछ नियम बना दीजिए न। आप लेजिस्लेचर हो, प्लीज़, प्लीज़, आप लोग कर दीजिए। अच्छा, ये भी नहीं कर रहे, तो अब किसके पास जा रहे हैं? अरे, अरे, योर ऑनर, आप जुडिशरी हो, आप लोग कर दीजिए। वो भी नहीं कर रहे, तो अब क्या करें? क्या करें? अच्छा, वो फोर्थ पिलर, मीडिया, उसके पास जाते हैं। देखिए, आप लोग लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाते हैं। आप लोग खूब लिखिए न, आप लोग करिए।

बिना यह देखे कि ये चारों ही जने आते कहाँ से हैं? कहाँ से आते हैं? हमारे ही घरों से आते हैं। एक ही घर, एक ही माँ और उसके चार लड़के-लड़कियाँ हो सकते हैं। एक प्रेस में है, एक कोर्ट में है, एक पार्लियामेंट में है और एक अफ़सर बना बैठा है। हो सकते हैं न? चारों अलग-अलग काम कर रहे हैं। चारों अब अलग-अलग इंस्टीट्यूशन, संस्थाओं के प्रतिनिधि हो रहे हैं। पर चारों की माँ तो एक ही है न, चारों के संस्कार तो एक ही हैं न। तो वो निश्चित रूप से कुछ अच्छा करने का प्रयास कर सकते हैं। पर कितनी दूर तक जाएँगे? बोलो, कितनी दूर तक जाएँगे?

और इतना ही नहीं है। जैसे हम हैं ऐसे ही रहें, तो संविधान कोई देववाणी तो है नहीं। हम जैसे हैं, कोई बड़ी बात नहीं कि हम कह दें कि संविधान में ये सब जो इक्वलिटी और जस्टिस और ये सब लिखा हुआ है, बेकार की बात है संविधान ही बदल डालो। संविधान बेचारा क्या करेगा? लोगों के भीतर जैसा अंधेरा है वह अगर बढ़ता ही गया, बढ़ता ही गया, तो संविधान को भी बदल डालेंगे।

अभी-अभी आज ही कॉन्स्टिट्यूशनल अमेंडमेंट हुआ है पाकिस्तान में। वो असीम मुनीर को बना दिया उन्होंने फील्ड मार्शल जिंदगी भर के लिए। और अब वह आर्मी भर का प्रमुख नहीं है। आर्मी, नेवी, एयरफोर्स सबका बन गया है। और यह काम बाकायदा कॉन्स्टिट्यूशनली करा गया है। इसको कॉन्स्टिट्यूशनल कू कहा जा रहा है कि पहले तख्ता पलट होता था, तो उसमें दिखाई देता था। जैसे मुशर्रफ ने जाकर के नवाज शरीफ को बिल्कुल घेर लिया था, भगा दिया था। या जैसे जियाउल हक ने भुट्टो को फाँसी दे दी, तो दिखाई पड़ता था कि देखो, जो इलेक्टेड रिप्रेजेंटेटिव है फौजी जनरल ने जाकर के उसका तख्ता पलट दिया।

अब इस बार वो प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, उनकी पूरी लेजिस्लेचर ने मिलकर के स्वयं घोषित किया है कि यह महानुभाव फील्ड मार्शल हैं और अब यह देश के रहनुमा बनेंगे। क्या कर लोगे आप इंस्टीट्यूशंस का? इंस्टीट्यूशन तो इंसानों से ही बनते हैं। वो इंसान ख़ुद ही इंस्टीट्यूशन को सबवर्ट कर दे, तो आप क्या करोगे? बोलो।

ये हो गया पाकिस्तान में, अभी कल ही हुआ है। कोई क्रांति हो रही है वहाँ पर? कुछ नहीं हो रहा। लोग उठ रहे हैं क्या विद्रोह में? कुछ नहीं हो रहा। जुडिशरी तो वहाँ भी है, कुछ करती है क्या? कुछ करती है। और जितने थोड़े-बहुत छिटपुट अधिकार हैं उस हिसाब से अपना कुछ कर दिया फुटकर काम, उतना चलता रहता है।

आपको इंसान को जगाना होगा; आप यह नहीं कर सकते कि तुम कर दो, तुम कर दो, तुम कर दो। ये इंस्टीट्यूशन क्यों नहीं कर रहा? वो इंस्टीट्यूशन क्यों नहीं कर रहा? सारे इंस्टीट्यूशन के नीचे फिर दोहरा रहा हूँ, द फंडामेंटल इंस्टीट्यूशन, अनफॉर्चूनेटली, इज़ द ईगो। द डार्कनेस इन मैन'स हार्ट। और जब तक उसको चैलेंज नहीं करोगे, बार-बार जाकर इंस्टीट्यूशंस का मुँह देखना कि तुम मेरे लिए कुछ कर दोगे, तुम कर दोगे, तुम कर दोगे। कोई कुछ नहीं करने वाला।

श्रीकृष्ण इसीलिए बोलते हैं, निराश हो जाओ। वी नीड अ थरो डिसइल्यूजनमेंट। वी नीड टोटल डिसअपॉइंटमेंट। तुम जब तक ये उम्मीद बाँध कर बैठे हो न, तब तक चीज़ें और बुरी होती जाएँगी, आपकी आशा निराधार है।

आप बीमारी के लक्षण से ही बीमारी का इलाज माँग रहे हैं। मिलेगा कभी? और जहाँ बीमारी का सचमुच इलाज हो रहा है वहाँ आप कहते हो, वो मुझे नींद आ जाती है।

तो अब मैं क्या कर सकता हूँ? अपनी ओर से जो भरसक प्रयास कर रहा हूँ, वह आपको पता है, आपको बता दिया है। कहीं और हो सकता, तो मुझे भी कोई शौक नहीं था अपनी जान, अपनी ज़िंदगी जलाने का। मैं भी चला गया होता किसी इंस्टीट्यूशन की शरण में और वहाँ जाकर कोई पदाधिकारी बन गया होता। बहुत आसान था, बहुत इंस्टीट्यूशन खुले हुए थे, “हाँ, आओ, आओ, आओ।” पर दिख रहा था कि वहाँ कुछ होना नहीं है।

एक क्लोज्ड सिस्टम को उसके भीतर से बदला नहीं जा सकता। क्योंकि वो सिस्टम यह भी तय करता है कि उसके भीतर कौन प्रवेश करेगा। उसके भीतर प्रवेश ही वो उसको करने देता है, जिसकी नियत ही न हो उसको बदलने की। आप बहुत बड़े क्रांतिकारी हैं। यह बात आप जाकर यूपीएससी के इंटरव्यू में बोल दीजिए, आपका सिलेक्शन नहीं होगा। क्योंकि उन्हें क्रांतिकारी नहीं चाहिए। उन्हें कैसे लोग चाहिए? जो स्टेटस को मेंटेन कर सकें। अच्छे काबिल मैनेजर्स चाहिए, एडमिनिस्ट्रेटर्स चाहिए। क्रांतिवीर नहीं चाहिए।

आप बोलो कि मैं आ रहा हूँ और पूरी व्यवस्था को भीतर से तोड़ के रख दूँगा। तो वहीं से आपको ही तोड़ के निकाल देंगे। कहेंगे, चलो बेटा। तो उन इंस्टीट्यूशंस में प्रवेश ही उन्हीं लोगों को मिलता है, जो व्यवस्था में मामूली सुधार तो कर सकते हैं पर कोई आमूलचूल परिवर्तन नहीं ला सकते। कोई फंडामेंटल रेडिकल चेंज नहीं ला सकते। द इंस्टिट्यूशन इज़ बिल्ट टू प्रिज़र्व इटसेल्फ।

मार्जिनल ग्रेजुअल इंप्रूवमेंट लाना एक बात होती है। और उसके लिए इंस्टीट्यूशंस हमारे वेल इक्विप्ड होते हैं। लेकिन अभी हम बात किसी और चीज़ की कर रहे हैं। अभी हम किसकी बात कर रहे हैं? अभी हम पैराडाइम चेंज की बात कर रहे हैं। अभी हम सेंटर में ही एक रेडिकल शिफ्ट की बात कर रहे हैं। वो काम किसी इंस्टिट्यूशन के भीतर से नहीं हो सकता, उसके लिए इंसान को ही जगाना पड़ेगा। क्योंकि इन्हीं इंसानों से सब इंस्टीट्यूशन निकलते हैं। और इन इंसानों में अगर अंधेरा है, तो उन्हीं उसी अंधेरे से सारे इंस्टीट्यूशंस निकल रहे हैं।

यह काम मेहनत का है, यह काम लंबा है। लॉन्ग ड्रॉन है, कठिन है। पर इसके अलावा कोई चारा भी नहीं है, बाबा।

प्रश्नकर्ता: सर, सौ में से अस्सी आदमी तो आज के दिन में AQI बोलने से हँसते हैं। समझते ही नहीं कि क्या बोल रहे हो।

आचार्य प्रशांत: तो आदमी को बदलना होगा न फिर। जब सौ में से अस्सी आदमी हँस ही रहे हैं, तो कोर्ट्स किस सीमा तक जाकर के हस्तक्षेप कर सकते हैं? आप कोर्ट्स पर भी हँसोगे।

मान लीजिए कोई सूरमा जज निकल ही आता है, दिल का साफ़, जो कह ही रहा है कि यह जो दुर्दशा है, यह नहीं होनी चाहिए, मैं इसे ठीक करूँगा। ठीक है न? जुडिशियल सिस्टम के भीतर ऐसा कोई व्यक्ति निकल आता है। तो क्या आप लोग उसका समर्थन करोगे? आपने ही कहा, सौ में से अस्सी लोग तो AQI पर हँसते हैं। कौन समर्थन करेगा उसका? न तो उसको उसके इंस्टिट्यूशन के भीतर से समर्थन मिलेगा और न ही उसे जनता-जनार्दन से समर्थन मिलेगा, तो वह बेचारा फिर क्या करेगा? कुछ नहीं करेगा।

आपके इंस्टीट्यूशन इतने ही अच्छे होते, तो ये इंसान जो आपके सामने खड़ा हुआ है, इसे इंस्टीट्यूशनल रिकॉग्निशन नहीं मिल गया होता? आपको दिख नहीं रहा है, आप कैसे लोग हो? आपको दिख नहीं रहा है कि आपके देश का एक-एक इंस्टिट्यूशन मुझे बिल्कुल कॉर्नर करके रख रहा है। उनके लिए मैं एक्ज़िस्ट ही नहीं करता। उन्हें जहाँ मैं दिख जाता हूँ, वो जल्दी से आँखें बंद कर लेते हैं। जितने भी इंस्टीट्यूशन हो, चारों, मीडिया, लेजिस्लेचर, सब। इसी से आप समझ लीजिए कि इंस्टीट्यूशंस कितना बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं। पर सवाल पूछना हमारी फितरत के बाहर की बात हो चुकी है, बहुत साधारण सवाल भी हमें कौंधते ही नहीं हैं।

मैं पूछ रहा हूँ आपसे। बताइए न, मैं आपके सामने खड़ा हूँ। आपने मुझे इतना-सा भी इंस्टिट्यूशनल रिकॉग्निशन मिलते कहीं देखा है? इंस्टिट्यूशनल प्रोटेक्शन मिलते देखा है? हाँ, इंस्टिट्यूशनल थ्रेट्स ज़रूर हैं। ये हैं हमारे इंस्टीट्यूशन और मेरे सामने खड़े हो के मजमे से कह रहे हैं, वो हम लोगों को अपने इंस्टीट्यूशंस पर भरोसा रखना चाहिए। ठीक है, दिल को बहलाने को ग़ालिब ख़याल अच्छा है। बहलाओ।

प्रश्नकर्ता: सर, मैं इतना जानता हूँ कि आप ज्ञान के बिंदु को सबके लोगों में जगाना चाहते हैं।

आचार्य प्रशांत: अगर इतने जानने से काम हो जाता, तो फिर जो हम दिन-रात मेहनत कर रहे हैं, उसकी क्या ज़रूरत थी, भाई?

लेकिन मैं आपकी बात को समझ रहा हूँ! उम्मीद पर दुनिया कायम है। आप उम्मीद बना कर रखिए और बाक़ी हम लोगों को हमारा काम करने दीजिए। आप उम्मीद बना कर रखिए। आप अपने जितने भी आप संस्थागत का द्वार खटखटा सकते हैं। यह इंस्टीट्यूशन मेरे लिए कुछ कर देगा। यह काउंसिल मेरे लिए कुछ कर देगी। ये एकेडमी मेरे लिए कुछ कर देगी। यह असेंबली मेरे लिए कुछ कर देगी। आप उन सब से जाकर के ज़ोर-आज़माइश करते रहिए।

हम तो पागल लोग हैं, हमें हमारा काम करने दीजिए। पर हमें समझ में आ रहा है कि उन दरवाज़ों को खटखटाने से क्या होना है। आप दरवाज़ा देख रहे हो, हमें पहले ही पता है दरवाज़े के पीछे कौन है।

दरवाज़े के पीछे हम ही हैं, हमारा ही अज्ञान है। उसको आप खटखटाओगे भी, तो अँधेरा ही जवाब देगा भीतर से। क्या मिल जाएगा आपको?

प्रश्नकर्ता: समय की बर्बादी सर।

आचार्य प्रशांत: पहले यह हुआ कि दुनिया के जो सबसे दस गंदे शहर हैं, उनमें पाँच भारत के आए। बड़ा बुरा लगा। फिर सात हुए भारत के और अभी शायद हालत यह है कि दुनिया के पचास सबसे गंदे शहरों में पैंतालीस या सैंतालीस भारत के हैं, या शायद सौ में से नब्बे भारत के हैं। कुछ ऐसी स्थिति आ गई है और टॉप 10 में तो सब दस के दस हम ही होते हैं। या बीच में एक-आध बार ये पाकिस्तानी भाँजी मार देते हैं, इनको चैन ही नहीं है, लाहौर घुस आता है बीच में। टॉप 10 पूरा हमारा होता, उसमें बीच में आ गया।

यह कैसे हो सकता है, बताओ तो, कि दुनिया का एक देश दुनिया में के सौ में से पंचानबे सबसे गंदे शहर रखकर बैठा है? वजह कुछ और होगी। ये पर कैपिटा इनकम वग़ैरह तो वजह नहीं हो सकती। कोई और अलग गहरी बात है। कुछ और चल रहा है। वहीं आऊँगा, जहाँ सारे फ़साद की जड़ है: लोकधर्म।

लोकधर्म, जो तथ्यों को देखने नहीं देता क्योंकि उसमें कल्पनाएँ और कहानियाँ बहुत हैं। जो देखने ही नहीं देगा कि यमुना और गंगा की क्या हालत है, क्योंकि उसमें यमुना एक कथा का किरदार बन चुकी हैं, यमुना अब नदी है ही नहीं। यमुना कथा की एक बहुत सुंदर चरित्र हैं, पात्र हैं। और कथा में तो सुंदर है ही, कथा में तो सुंदर हैं ही न यमुना। तो तथ्य में कैसी हैं इससे बहुत फ़र्क पड़ता नहीं। क्योंकि यमुना नदी नहीं है। यमुना क्या है? यमुना एक कहानी है और कहानी सुंदर है। तो अब वह सामने तथ्य कैसा है? फ़र्क क्या पड़ता है?

हम तथ्यों से बिल्कुल कटकर जीना सीख चुके हैं। सब कुछ हमारे लिए महान है, बिना यह देखे कि उसकी हक़ीक़त क्या है। अभी उसकी हक़ीक़त देखो और फिर बताओ कि कहाँ है महानता? और जिसको तुम महान नहीं बोल रहे, जिसको तुम गिरा हुआ बोल रहे हो, निंदित बोल रहे हो, गर्हित बोल रहे हो, तुम बताओ, उसमें किसकी निंदा कर रहे हो? किस बात की निंदा कर रहे हो? उसकी हक़ीक़त, उसका फ़ैक्ट देखकर बताओ कि वहाँ निंदनीय क्या दिख रहा है तुमको?

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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