Operation 2030 ही क्लाइमेट चेंज रोकने का एकमात्र तरीक़ा है

Acharya Prashant

42 min
1.3k reads
Operation 2030 ही क्लाइमेट चेंज रोकने का एकमात्र तरीक़ा है
हम शायद वह आख़िरी पीढ़ी हैं, जो मौसमों को कुछ सामान्य देख पा रहे हैं। सेलिब्रिटी, क्रिकेटर, पॉलिटिशन, या रिलिजस फ़िगर — इन सबका मूल्यांकन इनके कार्बन फुटप्रिन्ट से होना चाहिए। एक बिलियनेयर का जेट दो घंटे में उतना एमिशन करता है, जितना एक भारतीय हज़ारों साल में करेगा। इनके एमिशन से हज़ारों प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं। पृथ्वी जल रही है, मासिव एक्सटिंक्शन हो रहा है। अमीर मौज कर रहे हैं, आम आदमी मर रहा है। Operation 2030 ही क्लाइमेट चेंज रोकने का एकमात्र तरीक़ा है, क्योंकि आत्मज्ञान का अभाव ही क्लाइमेट चेंज है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। मेरा सवाल आज क्लाइमेट चेंज को लेकर है। आज ही एक ख़बर आई है कि उत्तराखंड में एक बादल फट गया था, जिससे गाँव का गाँव बह गया है। साथ ही, कुछ दिनों से हम सुन रहे हैं कि हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड में बाढ़ों की ख़बरें लगातार आ ही रही हैं, और उत्तर प्रदेश के भी कुछ मेन सिटीज़ जैसे, प्रयागराज और वाराणसी से भी बहुत सारी रील्स आ रही हैं, जिनमें लोगों के घरों में बाढ़ का पानी भर गया है। कुछ लोग डुबकी लगाकर उसकी रील्स डाल रहे हैं, कुछ लोगों को परेशानियाँ बहुत ज़्यादा हो रही हैं, वो भी आ रही हैं सामने।

इसी कॉन्टेक्स्ट में, एक प्रमुख हमारे साइंटिस्ट रहे डेविड सुज़ुकी, जिन्होंने ये कहा है, “इट्स टू लेट टू स्टॉप द क्लाइमेट चेंज।” साथ ही, एक डॉक्टर कार्टर, जो हमारे प्रमुख वैज्ञानिक रहे हैं उन्होंने भी कोट किया था कि “ऑल फ़्यूचर जेनरेशन्स ऑफ़ होमो सेपियन्स ऐंड अदर स्पीशीज़ आर गोइंग टू इनहैबिट ऐन इन्क्रीज़िंगली हैलिश अर्थ।”

तो आचार्य जी, इज़ इट रियली वेरी लेट टू स्टॉप द क्लाइमेट चेंज? क्या हम वाक़ई कुछ नहीं कर सकते हैं?

आचार्य प्रशांत: नहीं, ऐसा नहीं है कि कुछ नहीं कर सकते, पर जो कर सकते हैं वो हम करेंगे नहीं। कुछ ऐसा तो नहीं है कि बिल्कुल कुछ करा नहीं जा सकता। कुल मिलाकर, जो क्लाइमेट साइंस है, वो बड़ी सीधी है, आप जानती हैं, है ना?

कार्बन डाइऑक्साइड जो है, बहुत कम, छोटे अनुपात में रहती है वातावरण में। मिलियन पार्ट्स में, 10 लाख पार्ट्स में, 280 पार्ट्स (280 हिस्सा) उसको होना चाहिए, इतना ही होना चाहिए। इतने में जो पूरी पृथ्वी की सामान्य व्यवस्था है वो मज़े में चलती है, ठीक है। वो उससे बहुत बढ़ गई है, बहुत बढ़ गई है। वो उससे 70–80% बढ़ गई है, अभी 430–440 पी.पी.एम. हो रही होगी। ये है कुल मिलाकर।

अब ये क्यों बढ़ गई है? वो इंसान के कारण बढ़ गई है, वो हमारी हरकतों से बढ़ गई है। हमने ही कार्बन डाइऑक्साइड और जो कार्बन डाइऑक्साइड इक्विवेलेंट गैसेज़ होती हैं, जो ग्रीन हाउस गैसेज़ होती हैं, जैसे मीथेन हो गई, हमने ही उनका उत्सर्जन किया है, हम ही अपनी हरकतों से उनको और ज़्यादा एमिट, रिलीज़ करते जा रहे हैं। तो हमसे ही बढ़ गई हैं।

तो कुछ किया नहीं जा सकता, मैं इसमें क्या बोलूँ? ऐसा थोड़ी है कि कोई बाहर से बहुत बड़ी चट्टान कोई मेटेरॉइड, कोई ऐस्टेरॉइड आकर के पृथ्वी पर टकरा रहा है और हम बेबस हैं कि अब हम क्या करें, पृथ्वी से तो सारा जीवन विलुप्त हो जाएगा। डायनासोर हुए थे ऐसे विलुप्त पता है न, किलोमीटरों लंबा एक पत्थर आया था। अंतरिक्ष में ऐसे करोड़ों पत्थर जो हैं वो तैर रहे हैं, वो भी एक तरह के सैटेलाइट्स हैं। वो भी अपने ग्रैविटेशनल फोर्सेस में इधर-उधर भागते रहते हैं।

तो वैसे ही एक बहुत बड़ा पत्थर आया था और वो आकर पृथ्वी से टकराया और उससे इतनी धूल उठी, और ऐसे भूकंप आए, और ऐसी सुनामियाँ आईं, और वो जो धूल थी वो छा गई वातावरण में। उससे पूरे वातावरण का तापमान बदल गया, मौसम बदल गया, बारिश बदल गई कि धीरे-धीरे करके सब डायनासोर विलुप्त हो गए। उस पर हमारा कोई हक़ नहीं था, कोई अधिकार नहीं था, हम कुछ कर नहीं सकते थे तो इसलिए मास एक्स्टिंक्शन हो गया था।

जब डायनासोर विलुप्त हुए थे तो अकेले वही नहीं हुए, उनके साथ न जाने कितनी प्रजातियाँ और उड़ गई थीं। हम कुछ नहीं कर सकते थे तब। पर अभी जो हो रहा है, उसमें हम कहें कि हम कुछ नहीं कर सकते, तो ये बात अजीब सी है। हम कुछ नहीं कर सकते मानें क्या? हमने ही तो सब कुछ किया है! ये सब करतूत और किसकी है? कार्बन डाइऑक्साइड को 280 पी.पी.एम. से 440 पी.पी.एम. और कौन ले कर आया है? खरगोश? हिरण? गाय? चीता? स्वयं पृथ्वी? समुद्र? पहाड़? नदियाँ? नहीं इन्होंने कुछ नहीं किया। भुगत ये रहे हैं पर इन्होंने कुछ नहीं किया है। ये तो हम हैं — अनूठी प्रजाति जो अपने घर को ही जला सकती है और अपने आप को कहती है, “द मोस्ट इंटेलिजेंट क्रीएचर।”

आपने इतनी प्रजातियाँ हुई हैं पृथ्वी पर, इतनी, उसमें से किसी को ऐसा देखा कि वो अपने ही घर को आग लगा दे? सिर्फ़ मनुष्य अभागा, आज तक ऐसी कोई प्रजाति निकली है जिसने अपना ही घर बर्बाद कर दिया हमेशा के लिए। और वो अपने आप को क्या बोलता है? “बुद्धिमान प्राणी! द बेस्ट आउटपुट ऑफ इवोल्यूशन!” हम ये सब बोलते हैं अपने आप को। “द वाइज़ मैन — हमारे पास विज़डम है, इंटेलिजेंस है।” हम ये सब बोलते हैं।

“शेर, चीते, खरगोश, गाय, बकरा इनके पास कुछ नहीं है, ये तो ऐसे ही पागल हैं, हम इन्हें काट के खा जाएँगे, हम होशियार हैं।” वो जैसे भी हैं उन्होंने पृथ्वी नहीं खा ली। तुम ऐसे हो तुमने पृथ्वी, मानें अपना ही घर खा लिया। तुमने अपने बच्चों के लिए या आपने जैसे उद्धृत किया था कोट में कि “वी आर लिविंग अ हेलिश अर्थ फ़ॉर द फ़्यूचर जेनरेशन्स।” तुमने अपने ही बच्चों के लिए नरक तैयार कर दिया है तुम वो प्रजाति हो इंसान, और अपने आप को इंटेलिजेंट बोलते हो!

जो क्लाइमेट साइंस है वो तो बहुत सीधी है, कार्बन डाइऑक्साइड ग्रीन हाउस गैस होती है। ग्रीन हाउस गैस का मतलब क्या होता है? कि जो रेडिएशन आता है उसको ऐब्ज़ॉर्ब कर लेती है। जो कार्बन डाइऑक्साइड का मॉलिक्यूल है न, जो सूरज से आ रहा है रेडिएशन, जो फोटॉन्स आ रहे हैं उससे एनर्जी ऐब्ज़ॉर्ब कर लेता है।

तो वो 280 पी.पी.एम. तक तो फायदे की बात होती है, क्योंकि यदि वो ऐब्ज़ॉर्ब न करे तो जितनी आई थी उतनी सब वापस भी चली जाएगी और पृथ्वी बहुत ठंडी हो जाएगी। सूरज ने रेडिएशन ही तो भेजा है, अब रेडिएशन को आप बक्से में बंद करके तो रख नहीं सकते। रेडिएशन अगर आया है, तो जैसे आया है वैसे ही वापस भी चला जाएगा। स्पेस से आया है, स्पेस में वापस चला जाएगा रेडिएशन। तो कार्बन डाइऑक्साइड का मॉलिक्यूल अपने आप में बढ़िया चीज़ होता है, वो पृथ्वी पर जीवन को कायम रखने में योगदान देता है — 280 पी.पी.एम. तक। 280 पी.पी.एम. के आगे वो पृथ्वी पर जीवन समाप्त करता है, वो पृथ्वी का तापमान बढ़ा देता है।

और जहाँ मैं कार्बन डाइऑक्साइड बोल रहा हूँ, तो उसमें कार्बन डाइऑक्साइड जैसी दो–चार और भी गैसेज़ होती हैं। नाइट्रोजन के भी कुछ ऑक्साइड होते हैं और मीथेन तो हम जानते ही हैं। जो हाइड्रोजन का ऑक्साइड है, वॉटर वो भी ग्रीन हाउस गैस है। तो ये सब इन सबको कार्बन डाइऑक्साइड ही मानिए, सारी गैसेज़ को। तो ये तो हमने ही रिलीज़ कर रखी हैं। और ये बात आपको पता है हम कब से जानते हैं कि इन गैसों को वातावरण में डालने से हम बर्बाद हो रहे हैं, आप बताओ हम कब से जानते हैं? अभी 10–20 साल से?

ये सब मैं आपको कम्युनिटी के लिए काम दे रहा हूँ, कि इंसान को कब से पता है कि क्लाइमेट चेंज हो रहा है। हमें एक दशक, दो दशक, तीन दशक नहीं, हमें न जाने कितने दशकों से पता है कि क्लाइमेट चेंज हो रहा है और हम ही कर रहे हैं। हमें पता है और हम किए जा रहे हैं। ये कोई आज की बात नहीं है कि "अरे लोगों ने ए.सी. लगा ली इसलिए क्लाइमेट चेंज।” क्लाइमेट चेंज आज से नहीं हो रहा, कम से कम 50–70 साल पहले से हमें पता था कि ये हो रहा है। सरकारों को भी पता था, सबको पता था ये हो रहा है। हमने कुछ नहीं किया, हम कुछ करना भी नहीं चाहते।

आप सोच रहे होंगे कि आपका साधारण कारोबार चल रहा है, अचानक कोई गायब हो जाएगा। और वो जो गायब होगा, वो व्यक्ति नहीं होगा वो एक प्रजाति होगी — एन एंटायर स्पीशीज़। बात आ रही है समझ में? तो आप एमिट कर रहे हो, आप मत एमिट करो तो जहाँ तक पहुँचा है पी.पी.एम. हो सकता है वहीं पर रुक जाए। हालाँकि वहाँ पर भी उसका रुकना अब मुश्किल है, क्योंकि जैसा बहुत बार आपको समझा चुका हूँ कि अब फीडबैक लूप सक्रिय हो गए हैं। और वो इररिवर्सिबल होते हैं, वो एक बार शुरू हो गए तो मतलब अब वो इंसान के अधिकार से बाहर के हो गए।

अभी तक जो आप एमिशन करते थे, उसमें ये था कि आपने फैक्ट्री लगा रखी है, उस फैक्ट्री में कार्बन डाइऑक्साइड आप निकाल रहे हो। आप फैक्ट्री बंद कर दो, तो वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड और जानी अब बंद हो जाएगी। तो आप गुनहगार थे लेकिन कम से कम आपके पास कुछ अधिकार थे। क्या अधिकार था? कि चाहो तो एमिशन को रोक सकते हो। लेकिन अब मामला वहाँ आ गया है कि वहाँ आप चाहो भी तो भी नहीं रोक सकते हो। समझ रहे हो न बात को?

ऐसे जैसे कि समझ लो कि आप कागज़ में आग लगाओ, बहुत सारा कागज़ रखा है आप आग लगाओ। जब तक थोड़ी सी आग लगी है, तब तक आपने आग लगाई फिर आप उसको ऐसे पाँव से दबा देते हो, जूते से मार देते हो तो आग बुझ जाती है। पर आप इतने बेहोश हो और इतने मूर्ख हो कि आग को आप फैलने दो, तो एक बिंदु आता है कि अब आग आप बुझा नहीं पाओगे। अब आग ही आग को आगे बढ़ाएगी। तो जो पूरा क्लाइमेट का साइकिल है, उसमें हम वहाँ आ गए हैं जहाँ एमिशन ही एमिशन को और बढ़ाएगा। समझ में आ रही है बात?

जहाँ पर जितनी कार्बन डाइऑक्साइड पहले से ही है, वही अब और ज़्यादा कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में खींचेगी, और जब और बढ़ेगी तो और खींचेगी। और बढ़ेगी, तो और खींचेगी। तो वो जो पी.पी.एम. कर्व है वो एकदम एक्सपोनेंशियल भी हो सकता है, उसके उदाहरण भी आपको बहुत बार दे चुका हूँ।

सबसे जो उसका प्रकट उदाहरण होता है, वो कौन सा होता है? ग्लेशियर का होता है कि ग्लेशियर होता है, बर्फ़ सफेद होती है। ग्लेशियर के नीचे जो पत्थर होता है वो काला होता है। जब तक ग्लेशियर था तो सफेद बर्फ़ पर रोशनी पड़ रही थी तो सफेद रंग जो है प्रकाश को परावर्तित कर देता है, वापस भेज देता है। ठीक है? जब वापस भेज देता है तो बर्फ़ पिघलती नहीं है, क्योंकि पिघलेगी तो तब जब आप हीट को मानें लाइट को अब्सॉर्ब करोगे। अब्सॉर्ब नहीं किया उसको रिफ्लेक्ट कर दिया तो बर्फ़ बची रहती है, पर बर्फ़ पिघल गई। क्यों पिघल गई? क्योंकि कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ गई तो टेम्परेचर बढ़ गया, तो बर्फ़ पिघल गई। बर्फ़ पिघल गई तो क्या एक्सपोज़ हो गया? काला पत्थर।

काला पत्थर चूँकि काला है इसीलिए वो रेडिएशन को अब्सॉर्ब करता है, सोखता है। जब वो सोखेगा तो काला पत्थर गर्म हो जाएगा, जब वो गर्म हो जाएगा तो बर्फ़ और पिघलेगी। जब बर्फ़ और पिघलेगी तो काला पत्थर और एक्सपोज़ होगा और एक्सपोज़ होगा तो और गर्म होगा, और गर्म होगा तो बर्फ़ और पिघलेगी। ये साइकिल होता है। ये समझ में आ रही है बात? और इसी तरीक़े से, जितनी बर्फ़ पिघलती जा रही है तो बर्फ़ के नीचे जो कार्बन डाइऑक्साइड स्टोर्ड थी, ये तो हमने पत्थर की बात की। जब हम ठंडे इलाकों की बात करते हैं तो वहाँ मिट्टी के ऊपर भी बर्फ़ जमा है और उस मिट्टी में कार्बन डाइऑक्साइड स्टोर्ड है, न जाने कब से।

जब बर्फ़ पिघलती है तो वो जो एंशिएंट कार्बन डाइऑक्साइड, बल्कि कार्बन डाइऑक्साइड भी नहीं होती वहाँ मीथेन होती है। मीथेन परमाफ्रॉस्ट के नीचे होती है, तो वहाँ जो बहुत पुरानी मीथेन जमी थी वो मीथेन एटमॉस्फियर में रिलीज़ हो जाती है। समझ लो उस मीथेन को प्रकृति ने बंद करके रखा हुआ था, एक तरह की सीक्वेस्टरिंग थी। पर वो मीथेन अब पहुँच गई एटमॉस्फियर में और मीथेन का जो ग्रीन हाउस पोटेंशियल होता है वो कार्बन डाइऑक्साइड से 20 गुना होता है। तो ये तो फीडबैक लूप शुरू हो गए हैं।

लेकिन फिर भी आप अगर पूछो कि हम क्या कर सकते हैं?

तो हम ये कर सकते हैं कि एमिशन बंद कर दो। टोटल जो एमिशन्स होते हैं न हमारे वो भी बहुत सीधा गणित है। दुनिया में जितने लोग हैं उनको गुणा कर दो हर व्यक्ति द्वारा जितना कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित किया जा रहा है, नंबर ऑफ पीपल मल्टीप्लाई बाय पर कैपिटा एमिशन बस यही करना है। तो उससे टोटल एमिशन आ जाता है।

तो आपको यही करना है कि आप जो अपनी टोटल पॉप्युलेशन है उसको कम कर दो, कम होने दो। वो अपने आप कम होती है क्योंकि लोग अपने आप धीरे-धीरे वृद्ध होकर मरते जाते हैं, तो पॉप्युलेशन तो कम हो जाएगी। आपको बस और बच्चे नहीं पैदा करने हैं, पॉप्युलेशन तो अपने आप कम हो जाएगी। और दूसरा होता है पर कैपिटा एमिशन कि आप जो ज़िंदगी जी रहे हो, उसमें एमिशन करना कम कर दो, तो नहीं होगा। और आपको ज़ीरो नहीं करना है एमिशन। प्रकृति में एमिशन और ऐब्ज़ॉर्प्शन का एक साइकिल अपने आप चलता रहता है। हमेशा ही कार्बन डाइऑक्साइड एमिट भी हो रही होती है पृथ्वी से और उसको ऐब्ज़ॉर्ब भी कर रहे होते हैं। कौन ऐब्ज़ॉर्ब कर रहा होता है? फॉरेस्ट ऐब्ज़ॉर्ब करते हैं और ओशन ऐब्ज़ॉर्ब करते हैं। और बहुत जगह ऐब्ज़ॉर्ब होता है, प्रिंसिपल जो कार्बन डाइऑक्साइड के सिंक्स होते हैं, वो ये दोनों होते हैं।

तो पृथ्वी में क्षमता है, कुछ कार्बन डाइऑक्साइड अगर आप एमिट करोगे तो पृथ्वी बुरा नहीं मानेगी। आप एमिट करते रहो पृथ्वी उसको ऐब्ज़ॉर्ब करती रहेगी। पर आपने हद कर दी है, जितना पृथ्वी ऐब्ज़ॉर्ब कर सकती है उससे आप कई–कई–कई–कई–कई गुना आप एमिट कर रहे हो। तो आपकी लाइफ़स्टाइल अगर ऐसी है कि उसमें कुछ कार्बन एमिशन है, तो चल जाता है। पर जितना होना चाहिए, जो औसत जीव है इस ग्रह पर वो उससे छ: गुना ज़्यादा एमिशन कर रहा है।

अभी औसत कहते ही जो मुद्दा है वो कहीं और आ गया, मैं उधर भी आ जाता हूँ। आप पूछते हो, “हम क्या कर सकते हैं?” हाँ, बिल्कुल ठीक है कि जो पर कैपिटा इस वक़्त प्लैनेट पर एमिशन है वो सस्टेनेबल लिमिट से पाँच–छ: गुना ज़्यादा है, बिल्कुल सही बात है ये। लेकिन पर कैपिटा हमेशा एक डिसेप्टिव टर्म होती है क्योंकि वहाँ हम एक एवरेज ले रहे होते हैं और एवरेज बहुत सारी सच्चाइयाँ छुपा देता है।

ऐवरेज क्या सच्चाई छुपा देता है?

ऐवरेज ये सच्चाई छुपा देता है कि जैसे भारत देश है, भारत का जो पर कैपिटा कार्बन डाइऑक्साइड एमिशन है, वो अभी भी सस्टेनेबल लेवल्स के अंदर–अंदर है। दुनिया की 90% आबादी जो एमिशन करती है वो सस्टेनेबल लिमिट्स के अंदर–अंदर है। तो आप चौंक गई? नहीं आप नहीं चौंकी, थोड़ा चौंकिए। चौंक के दिखाइए तो आगे बढ़ें। (प्रश्नकर्ता चौंकने का अभिनय करते हुए)। ठीक है, आप चौंक गई, हमने मान लिया। ये कैसे हो रहा है कि दुनिया की 90% आबादी जब सस्टेनेबल लिमिट्स के अंदर–अंदर कार्बन एमिशन कर रही है, तो टोटल कार्बन एमिशन सस्टेनेबल लिमिट का कई गुना कैसे हो सकता है?

जिन्हें थोड़ी अर्थमेटिक आती है वो समझ गए होंगे कैसे हो सकता है।

ये जो बाक़ी 10% हैं, इन्होंने उपद्रव मचा रखा है। और उन 10% में भी जो टॉप 1% है वो है असली क़ातिल। ये इतना एमिशन कर रहे हैं, इतना एमिशन कर रहे हैं कि जो 90% साधारण जनता है दुनिया की उस पर भारी पड़ रहे हैं।

एक बिलियनेयर दो घंटे में अपने प्राइवेट जेट से उतना एमिशन कर सकता है जितना एमिशन करने में एक औसत भारतीय को हजारों साल लगेंगे, अपनी औसत ज़िंदगी जीते–जीते। जैसे आप बैठी हैं इधर, मैं बैठा हूँ, हम हज़ारों साल में जितना कार्बन एमिशन करेंगे, उतना एक अमीरज़ादा अपने प्राइवेट जेट या यार्ट होती हैं उनके पास, उससे कुछ घंटों में कर देगा। तो ये हैं जिन्होंने एवरेज को इतना ऊपर टाँग रखा है, आम आदमी ने नहीं टाँग रखा।

तो आप क्या कर सकती हैं? आपको तो छूट मिल गई कि आप तो बेगुनाह हैं, आपने तो कुछ किया ही नहीं, एमिशन आप तो कर ही नहीं रही। एमिशन आप नहीं कर रही पर आप एमिशन करवा रही हैं। आप एमिशन करवाने वाले लोगों की मददगार हैं, आपने उनको अपने मन पर चढ़ने की छूट दी है, वो आपके ही कंधों पर खड़े होकर के हमें इतने बड़े दिखाई देते हैं। आप ही उनका माल ख़रीदते हो, आप ही उनको आदर्श बनाते हो, आप उनके जैसा ही बन जाना चाहते हो। आप उन्हें मौका देते हो कि वो आपकी सरकारें बनवा दें, पैसे दे–दे कर के। आप उन्हें मौका देते हो, आपकी मीडिया पर कब्ज़ा कर लें, और जब वो मीडिया पर कब्ज़ा कर लेते हैं तो आप उसी मीडिया को देखते भी जाते हो।

दुनिया भर की पूरी सोशल मीडिया बताइए कितने लोग कंट्रोल करते हैं? गिनिएगा। और मेनस्ट्रीम मीडिया से ज़्यादा इस समय ताक़तवर है सोशल मीडिया। और पूरी सोशल मीडिया सिंगल डिजिट में लोगों के हाथों में है। सिंगल डिजिट में भी नौ नहीं, आठ नहीं और छोटा आँकड़ा। और ये लोग हैं जो अपने ऐल्गॉरिद्म्स के द्वारा तय करते हैं कि दुनिया क्या सोच रही है, आप क्या सोच रही हैं, क्या समझ रही हैं?

आपकी संस्था को ज्ञान की बात का प्रचार करने के लिए करोड़ों ख़र्च करने पड़ते हैं, क्योंकि ये लोग हैं जो दुनिया के सबसे अमीर लोग हैं, इन्होंने अपने जानबूझ कर ऐल्गॉरिद्म्स ऐसे सेट करे हैं कि सिर्फ़ कंज़म्प्शन वाली, टिटिलेटिंग बातें, जो तुरंत आपको डोपामिन हाई देती हैं, वो बातें, मिनट की, दो मिनट की, छोटे–छोटे वीडियोज़ यही हैं जो उनका एल्गोरिदम लगातार आगे बढ़ाता रहता है। और जितना वो वहाँ पर डोपामिन और टिटिलेशन और एक्साइटमेंट और क्रेविंग और एड्रिनलिन का खेल चलता है उतना आप शॉपिंग के लिए आतुर होते हो। जितना आप शॉपिंग करते हो उतना वो अमीर और अमीर होता है। जितना वो और अमीर होता है, उतना वो और ज़्यादा कार्बन एमिशन करता है।

ये साइकिल चल रहा है।

कैसे तोड़े इस साइकिल को? तभी छूट सकता है, जब आप देख पाओ कि आपको किन–किन तरीक़ों से ये गुलाम बना रहे हैं। जब आप ये बस मत बोल दो कि फलानी चीज़ वायरल हो गई, पूछो वायरल हो गई? अच्छा कहाँ वायरल हुई? अच्छा इस मीडिया पर वायरल हुई। अच्छा, इस मीडिया पर वायरल हुई तो वायरल मानें कैसे होता है कुछ? माने कि जो ऐल्गॉरिद्म है वो सबको बार–बार दिखा रहा है। है न? तभी तो वायरल है। ऐल्गॉरिद्म किसी भी चीज़ को बहुतों को दिखाना शुरू कर दे तो संभावना है कि वो वायरल हो सकता है। देखो न कि ऐल्गॉरिद्म किस चीज़ को वायरल कराते हैं, किसी भी ढंग की चीज़ को कभी वायरल कराया किसी ऐल्गॉरिद्म ने?

लोग तो ठीक है नालायक थे हमेशा से पर नालायकों की भी श्रेणियाँ होती हैं। नालायकों में जो सबसे घटिया श्रेणी के नालायक थे, उसको इन अमीरों ने बिल्कुल वायरल कर रखा है। गंदगी हमेशा से थी दुनिया में, पर गंदगी का ज़बरदस्त प्रचार हो रखा है और ये प्रचार बहुत सुनियोजित तरीक़े से हो रहा है। इसी प्रचार से दुनिया की पूरी गाड़ी चल रही है, पूरी व्यवस्थाएँ चल रही हैं।

मैंने एक उदाहरण दिया है अभी बस सोशल मीडिया का, क्योंकि आज जो बड़े–बड़े अमीर हैं, उनमें से बहुत सारे ऐसे हैं जो नए–नवेले अमीर बने हैं सोशल मीडिया के दम पर या इंटरनेट के दम पर। और इसी तरीक़े से हर चीज़ आपको मिलेगी, कार्बन एमिशन हम जानते हैं सबसे ज़्यादा फ्यूल, ट्रांसपोर्ट, फॉसिल फ्यूल जलाने से होता है।

आपके मन में ये बात किसने डाल दी? सोचिएगा, कि एक गुड लाइफ़ में कार बहुत बड़ी चीज़ होती है। सोचिएगा, किसने डाली होगी? ये भावना आप ले के तो नहीं पैदा हुए थे, ये बात किसी ने आपके मन में डाली है। दुनिया का 40 से 50% कार्बन एमिशन सिर्फ़ पाँच–सात कंपनियाँ हैं वो मिलकर कर देती हैं। और आपको क्या लग रहा है, वो आपके मन में हज़ार तरीक़े से विज्ञापन के द्वारा, मास मीडिया के द्वारा, लिटरेचर को अफेक्ट करके, कल्चर को अफेक्ट करके ये बात नहीं डाल रहे होंगे कि और गाड़ियाँ ख़रीदो, और फ्यूल जलाओ, और ट्रैवल करो, यहाँ जाओ, वहाँ जाओ?

आपने देखा, आप एयरलाइंस में जाते हो आप प्लेन में बैठो वहाँ पर उनके सामने एक पत्रिका, एक पुस्तिका रखी होती है, उसमें वो बता रहे होते हैं कि कौन–कौन सी बहुत अच्छी पर्यटन की जगह हैं। वो आपको क्यों बता रहा है मुफ़्त में कि कौन–कौन सी घूमने की जगह हैं? क्योंकि जब वो आपको बताएगा तो आपके भीतर इच्छा उठेगी, जब इच्छा उठेगी तो फिर आप जाकर के उसी एयरलाइन का टिकट ख़रीदोगे।

आपको पता भी नहीं चलता कि आपकी इच्छा आपकी नहीं है, किसी और ने आपके भीतर डाली है। और आम आदमी बस इच्छाओं का पुतला ही तो है न बस। वो कहता है, “मेरी इच्छा,” वो तुम्हारी इच्छाएँ नहीं हैं वो अमीरों की साज़िशें हैं जो उन्होंने तुम्हारे भीतर इच्छाएँ बनाकर बैठा दी हैं। ग़ौर से देखना तुम्हारी क्या कोई भी ऐसी इच्छा है जिससे किसी अमीर को लाभ न हो रहा हो? तुम्हारी कोई ऐसी इच्छा नहीं है। और जो तुम्हारी जितनी बड़ी इच्छा होती है वो उतना ज़्यादा कार्बन एमिशन करती है, ये भी देखना, ख़ुद जाँच लेना।

मेरी बड़ी से बड़ी इच्छा है, मैं बेटे का धूमधाम से ब्याह करूँगा। ये धूमधाम माने? सोचो, धूमधाम माने क्या? और पैसा आ गया तो मेरी इच्छा है कि मैं डेस्टिनेशन वेडिंग करूँगा, वो और बड़ा कार्बन एमिशन है। जितना आपके भीतर भावना और इच्छा उत्तेजित की जाती है, उतना ज़्यादा कार्बन एमिशन होता है और उतना ज़्यादा किसी पूँजीपति को लाभ होता है। और ये वही पूँजीपति है जो सब कार्बन एमिशन का ज़िम्मेदार है।

अब मैं यहाँ पर कोई एंटी कैपिटलिस्ट बन के नहीं बोल रहा हूँ, मैं तो बहुत सीधे–सीधे आध्यात्मिक दृष्टिकोण से बोल रहा हूँ, “भाई, लालच बुरी बला है,” बहुत सीधी सी बात है। भगवद्गीता षड्रिपु बताती है, षड्रिपु में लोभ, मात्सर्य, मद, यही सब तो हैं जिनसे क्लाइमेट चेंज हो रहा है। और क्या है?

आप एक कंपनी चलाते हैं, कोई अपर लिमिट है आपके पास कि भाई, मैं बस इतना जिस दिन टर्नओवर कर लूँगा उसके बाद मैं नहीं बढ़ाऊँगा? कभी होता है क्या? तो आपको अगर कंटिन्युअसली अपना प्रॉफिट बढ़ाना ही है, टॉप लाइन भी बढ़ानी है, प्रॉफिट भी बढ़ाना है, मार्केट शेयर भी बढ़ाना है, तो आपको कंटिन्युअसली फिर पृथ्वी के रिसोर्सेज़ को जलाना भी पड़ेगा न। नहीं तो आपका माल ऐसे ही तो तैयार हो नहीं सकता।

एक एयरलाइंस अगर चाहती है कि उसका रेवेन्यू साल–दर–साल बढ़ता रहे, तो साल–दर–साल उसे अपने एमिशन्स भी तो बढ़ाने पड़ेंगे न। यही है क्लाइमेट चेंज। और ये रोकना बड़ा मुश्किल है अब, क्योंकि हम कहीं से कोई संकेत नहीं दे रहे कि हम ज़िंदगी की अपनी फंडामेंटल फिलॉसफी बदलने को तैयार हैं, कि हम अपनी मूढ़ता, अपने अज्ञान को साफ़–साफ़ देखने को तैयार हैं। हम कह रहे हैं, जैसी हमारी ज़िंदगी चली है, जैसा आज तक रहा है, जो हमारा हिसाब–किताब है बिल्कुल सही है। हमने जिस चीज़ को गुड लाइफ़ मान रखा है, हम तो वो करेंगे ही करेंगे। तुम करो, मौज कोई और ले रहा है, मरेगा आम आदमी, मर रहा है।

आप उत्तराखंड की बात कर रहे हैं, वहाँ पर क्या जो एलीट वर्ग है वो मरने गया था? वो थोड़ी मरता है कभी। गरीब मारा जाता है, आम आदमी मारा जाता है। ये जिनको तुम अपना भगवान बनाए बैठे हो न, यही काल है तुम्हारी ज़िंदगी का। समझो बहुत अच्छे से। और ये तो बात बहुत सीधी है, मूर्ख आदमी जिसको अपना आदर्श मानता होगा वो उसकी मूर्खता की ही तो प्रतिछवि होगा। गधा किसको आदर्श मानेगा? बड़े गधे को। और अगर बहुत बड़ा गधा है, तो मालूम है वो किसको अपना आदर्श मानेगा? बाघ को।

और वो बाघ के पास जाएगा कहेगा, “देखिए, मैं आपको अपना आदर्श मानता हूँ। मैं आपके चरणों में बैठ जाता हूँ, लेट जाता हूँ।” बाघ कहेगा, “अच्छे से लेट जाओ, और चारों टाँगें ऊपर कर लो।” और बस फिर उसको ऐसे एक मारना है, ख़त्म गधा।

अच्छा, हर आदमी यही कहता है न, “मुझे ज़िंदगी में तरक़्क़ी करनी है।” आपको भी करनी होगी, सबको करनी है। अच्छा, एक बात बताओ, किसी भी तरीक़े से संभव है कि आप तरक़्क़ी करो, जो भी आपकी तरक़्क़ी की अभी परिभाषा है उस परिभाषा के अंतर्गत क्या ये संभव है कि आप तरक़्क़ी करो और आपका कार्बन फुटप्रिंट न बढ़े? आपने भी तरक़्क़ी करी होगी, पूरा मध्यम वर्ग तरक़्क़ी कर रहा है। पिछले 20 साल में आपके घर में भी तरक़्क़ी आई होगी। पहले घरों में स्कूटर होता था, अब स्कूटर की जगह कार आ गई है। इतनी तरक़्क़ी तो सभी घरों में आ रही है, आई है?

प्रश्नकर्ता: जी।

आचार्य प्रशांत: तो 20 साल पहले आपके घर से जो कुल कार्बन एमिशन होता था, अब उससे ज़्यादा होता है कि कम होता है?

प्रश्नकर्ता: ज़्यादा होता है।

आचार्य प्रशांत: हाँ। और ये जो तरक़्क़ी की परिभाषा है न ये आपने ख़ुद नहीं जानी है, ये आपके मन में ठूँसी गई है कि यही तरक़्क़ी है। आपके लिए, ग़ौर से देखिएगा, ख़ुद परख के देखिएगा, तरक़्क़ी के आप जितने एलिमेंट्स गिना सकती हैं, उन सब एलिमेंट्स में कंज़म्प्शन शामिल है। और आप अगर कंज़म्प्शन करोगे, तो कोई दूसरा होगा जो प्रोडक्शन कर रहा है और अपनी जेब भर रहा है। आपके लिए तरक़्क़ी का मतलब होता है, अब मैं पहले से ज़्यादा कंज़्यूम कर पा रही हूँ। ये डेफिनिशन आपके भीतर डाली गई है, इंप्लांट करी गई है।

क्योंकि जब ये डेफिनिशन डाली जाएगी, तभी तो किसी का माल बिकेगा। और जितना उसका माल बिकेगा उतना वो और निरंकुश होकर के पृथ्वी को बर्बाद करेगा। क्या हम तरक़्क़ी की कोई वैकल्पिक परिभाषा ला सकते हैं? ये प्रश्न है। अगर आप ला पाए समय रहते, तो शायद थोड़ा बहुत कुछ बच जाए इस पृथ्वी पर। हम वही प्रयास कर रहे हैं, आपकी संस्था वही प्रयास कर रही है कि आपको बता पाएँ कि आपके लिए तरक़्क़ी की असली परिभाषा क्या है।

मछली के लिए तरक़्क़ी की परिभाषा ये नहीं हो सकती कि उसको रेगिस्तान में बहुत बड़ा महल बनाकर दे दिया गया। नहीं मछली के लिए तरक़्क़ी की परिभाषा हो सकती है कि उसको पहाड़ों पर अब दौड़ने के लिए एक बड़ी साफ़ जगह दी गई है। “आप हैं कौन?” इससे तय होगा न कि आपके लिए तरक़्क़ी क्या है। आप जानते ही नहीं आप कौन हो, तो मुझे अब उसी पुरानी घिसी-पिटी बात पर आना पड़ेगा:

“आत्म-ज्ञान का अभाव ही क्लाइमेट चेंज है।”

आपको पता ही नहीं है आप मछली हो। वो सब आपको रेगिस्तान में महल बेच रहे हैं और आप व्याकुल हुए जा रहे हो। पहली बात तो वो जो बेचने वाले हैं, उल्लू सीधा करके निकल जाएँगे। दूसरी बात, किसी क़दर हज़ार में से एक मछली ने रेगिस्तान वाला महल ख़रीद भी लिया, तो अब वो अपने महल के भीतर तड़प-तड़प के मरेगी। बिना ये जाने आप कौन हो, आपने अपनी तरक़्क़ी की परिभाषा निर्धारित कैसे कर ली? आपको कैसे पता, तरक़्क़ी माने क्या?

तो समझाने वालों ने कहा है कि पहले ये जानो कि तुम्हें वास्तविक तकलीफ़ क्या है, अपनी वास्तविक तकलीफ़ को हटाना ही तरक़्क़ी है। जब तुम्हें यही नहीं पता कि तुम्हारी सचमुच की तकलीफ़ क्या है तो तरक़्क़ी के नाम पर तुम कुछ उल-जुलूल ही करोगे।

कोई आदमी इतना पागल हो, उसको यही न पता हो कि दर्द उसकी कोहनी में हो रहा है, तो वो अपनी चिकित्सा के नाम पर कभी अपनी नाक में उँगली डालेगा, कभी आँख में मट्ठा डालेगा, कभी घुटने पर हथौड़ा मारेगा। तुम्हारी वास्तविक तकलीफ़ क्या है, ये समझो। और फिर तरक़्क़ी करो, और तरक़्क़ी का तब अर्थ होता है: अपनी असली तकलीफ़ को हटाना। मछली की वास्तविक तकलीफ़ ये थी कि पानी गंदा हो रहा था, पर उसको पता ही नहीं कि “मैं कौन हूँ? मैं मछली हूँ।” न उसको ये पता कि उसकी असली तकलीफ़ क्या है। उसको किसी ने आकर के रेगिस्तान में महल बेच दिया और उसने ख़रीद भी लिया और ज़िंदगी भर की वो पूँजी लुटा बैठी, और अब जाकर के तड़प-तड़प के वहाँ बालू पर मर रही है। ये हमारी कहानी है, ये क्लाइमेट चेंज की कहानी है।

आप एक बार जान जाओ न आपकी वास्तविक तकलीफ़ क्या है? पूरी दुनिया बदल जाएगी। उसके बाद कोई वोट माँगने आएगा, आप सबसे पहले पूछोगे, “मैनिफ़ेस्टो दिखाओ, मैनिफ़ेस्टो दिखाओ। इसमें कहाँ है क्लाइमेट ऐक्शन?" और ये तुम क्या कर रहे हो? तुम्हारे मैनिफ़ेस्टो में तो लिखा है कि इतने लाख हेक्टेयर जंगल और काट देंगे। ये तुम क्या कर रहे हो? क्या किए जा रहे हो दुनिया में?

पर मछली को कोई आके बता देता है कि तू चमगादड़ है, मछली मान लेती है। मछली को कोई आके बता देता है तू चील है, वो मान लेती है। हम वो मछलियाँ हैं। और मछली को बता दिया गया तू चील है और साँप तेरा दुश्मन है, जा के साँप का शिकार कर। अब मछली चली है वहाँ पर वो खेत में जा के साँप का शिकार करने। उसके लिए ज़िंदगी में यही सबसे बड़ी अब वरियता हो गई है कि साँप का शिकार करना है। “मैं तो चील हूँ, साँप मेरा दुश्मन है।”

तुम वो हो ही नहीं। जो तुम अपने आप को मान रहे हो, जो तुम्हें बता दिया गया है कि तुम हो, तुम वो नहीं हो। तुम अपनी असली तकलीफ़ समझो, तो क्या कुछ हो सकता है? पता नहीं। हम कर रहे हैं कुछ करने की कोशिश, अब कुछ हो सकता है कि नहीं हो सकता है, वो आपके सहयोग पर है। जो हो सकता है वो मुझे तो साफ़-साफ़ पता है कि क्या है, जो करा जा सकता है और वो एकमात्र चीज़ क्या है जो करने से क्लाइमेट चेंज को रोका जा सकता है, मैं उसको जानता हूँ। ऑपरेशन 2030 — उसी का नाम है।

अपने दम पर जितना कर सकता हूँ, कर भी रहा हूँ। मुझे भीतर ये ग्लानि नहीं रहेगी कि मैं जानता था और फिर भी जाने हुए को मैंने जिया नहीं। तो मैं उस अर्थ में तो संतुष्ट हो के ही मरूँगा। लेकिन हम कुछ सार्थक बड़ा काम ज़मीन पर कर पाएँगे कि नहीं कर पाएँगे, मुझ पर नहीं निर्भर करता, वो आप पर निर्भर करता है।

जब तक आपने ठान ही रखा है कि चील-कौए ही आपके आदर्श होंगे, तब तक आप मेरे साथ नहीं खड़े हो पाओगे। जब तक आप अपने परंपरागत अरमानों पर ही चलते रहोगे, तब तक आपको यही लगेगा कि ये तो आचार्य हमें हमारी अच्छी, खुशहाल, सपनौती ज़िंदगी से वंचित कर रहा है। आप समझ ही नहीं पाओगे कि आपके सपने आपके हैं ही नहीं, आपके सपने दूसरों द्वारा आपके ऊपर डाली गई ज़ंजीरें हैं। मैं अगर आपको आपके सपनों की व्यर्थता दिखा रहा हूँ, तो मैं आपकी ज़ंजीरें काट रहा हूँ।

बड़ा बुरा सा लगता है न ये मानने में कि मेरी एक-एक मान्यता उधार की है, और उधार में भी देखो थोड़ी तो चेतना होती है न? जब एक आदमी उधार लेने जाता है तो थोड़ा होशो-हवास रखता है, तभी उधार माँगता है। हमारी मान्यताएँ उधार की भी नहीं हैं। हमारी मान्यताएँ ऐसी हैं जैसे चोरी-छुपे आपको बेहोश करके, आपके भीतर कुछ फिट कर दिया गया हो।

ये सब तो जानते ही हो होता है कई अस्पतालों में, ख़बर आ जाती है कि एक आदमी था उसको ले जाकर के बेहोश कर दिया, धोखे से उसकी किडनी निकाल ली। बड़ा बुरा लगता है। मान्यता उससे मिलती-जुलती, पर और घातक चीज़ है। वहाँ पर आपको चोरी से बेहोश करके, आपके भीतर कुछ अतिरिक्त लगा दिया जाता है, कुछ फिट कर दिया जाता है। और कोई आपकी किडनी निकाल ले, ये कम घातक बात है। आपकी बेहोशी में कोई आपके भीतर मान्यता इंप्लांट कर दे, आरोपित कर दे, वो ज़्यादा ख़तरनाक बात है।

पर चूँकि वो काम आपकी बेहोशी में हुआ है तो आप मानते ही नहीं कि आपके सपने, आपके आदर्श, ये सब नकली हैं। आप लगे हुए हो कि “नहीं, कुछ तो हम ठीक ही बोल रहे होंगे न, कुछ तो हम ठीक ही बोल रहे होंगे न!” अरे तथ्य देखो! तुम्हारे चारों ओर पृथ्वी जल रही है। तुम आख़िरी पीढ़ी हो शायद, जो मौसमों को कुछ-कुछ अभी भी सामान्य देख पा रही है।

आप जो बच्चे पैदा कर रहे हो, जब तक वो जवान होंगे आप उनको बताओगे कि “मौसम ऐसे होते थे, ऐसे होते थे” उनको नहीं समझ में आएगा। पूरी पृथ्वी मिलकर के आपको दनादन प्रमाण दे रही है कि तुम बहुत ग़लत जी रहे हो। तुम्हारी सारी मान्यताएँ, धारणाएँ सब झूठी हैं और तुम्हारे सपने खोखले हैं। पूरी पृथ्वी आपको प्रमाण दे रही है पर फिर भी आप मानने को तैयार नहीं हो। अब मैं क्या करूँ? मैं ज़बरदस्ती मनवाऊँ? मैं क्या करूँ?

भाई, आपका जो मन है न वो आपकी टेरिटरी है, होना भी चाहिए। और वहाँ आपने भर रखी है गंदगी, मन में गंदगी भर रखी है। मन को घर मानो, घर में गंदगी भर रखी है और उससे आपका बड़ा नुक़सान हो रहा है, लेकिन घर तो आपका है, मैं कैसे साफ़ करूँ? मैं बाहर खड़ा होकर चिल्ला रहा हूँ कि अपना घर साफ़ कर लो, पर आप साफ़ नहीं करते। तो फिर आपको मालूम है मैं क्या करता हूँ? मैं रातों को चोरी-छुपे सेंध लगाकर के आपके घरों में घुसता हूँ, आपकी सफ़ाई करने के लिए, और फिर मैं चोर कहलाता हूँ। कहा जाता है, “ये ज़बरदस्ती आ गया, बिना अनुमति के हमारे घर में बर्गलरी करी है। हैज़ ब्रोकन इन, इसने सेंध लगाई है।”

क्या? क्यों सेंध लगाई है? कुछ चुराने के लिए? या सफ़ाई करने के लिए? कूड़ा भरा है तुम्हारे घरों में, वहाँ से मैं चुराकर क्या ले जाऊँगा? और मुझे नहीं आना किसी और की गंदगी साफ़ करने, मैं तो बात कर रहा हूँ कि सुन लो बात। और बात में कोई कमी हो तो बता दो, तुम्हारे हित की बात कर रहा हूँ पर तुम्हें मानना नहीं है। तुम कह रहे हो, “ये सब कूड़ा-कर्कट जो है ये तो संपदा है हमारी!” देखो, मेरे तो कोई आने वाली पीढ़ी है नहीं अपनी व्यक्तिगत। पर तुम्हें तो जवाब देना होगा अपने बेटे-बेटियों और पोते-पोतियों को। और जवाब देने लायक तुम्हारा चेहरा बचेगा नहीं।

ज़्यादा नहीं — 10, 20, 30 साल बाद ही, इतिहास तुमसे बहुत कड़ाई से और बहुत क्रोध के साथ सवाल पूछेगा कि "सन 2025 में तुम क्या कर रहे थे, जब पृथ्वी जल रही थी?" और तुम्हारे पास कोई जवाब नहीं होगा।

तुम कहोगे, “हम तो अपने आदर्शों की पूजा कर रहे थे — बाबा जी, नेता जी, सेठ जी।” यही है त्रिपुटी, यही ज़िम्मेदार है। सेठ जी का बता ही दिया क्या करते हैं? वो तो डायरेक्टली एमिट करते हैं। और सेठ जी का कारोबार क़ानूनी तरीक़े से चलता रहे, इसके लिए नेता जी को पैसा देते हैं क्योंकि क़ानून पर नेता जी का क़ब्ज़ा है। और आम जनता विद्रोह न करे, इसके लिए सेठ जी बाबा जी को पैसा देते हैं। बाबा जी को खड़ा करते हैं, एक के बाद एक।

सेठ जी, नेता जी मिलकर बाबा जी को क्यों खड़ा करते हैं?

ताकि जब पृथ्वी पर आग लगे, तो बाबा जी कहें, “बच्चा, ये तुम्हारे पिछले जन्म का पाप है। ये सेठ जी की करतूत नहीं है, ये तुम्हारे पिछले जन्म का पाप है बच्चा। और बहुत संतोष के साथ हर चीज़ को धीरज से सहन करना चाहिए, सहन-शक्ति सबसे बड़ी शक्ति है बच्चा, तुम सहन करो। और जब आग लगे पूरी पृथ्वी पर तो बस आँख बंद कर लो, और अपने इष्ट का स्मरण करो। और ये तो होना ही था, ये तो भगवान की मर्ज़ी है और भगवान ने बहुत पहले पुरानी किताब में लिख रखा है कि देखो, इस साल में इतने बजे, ऐसे-ऐसे करके पृथ्वी में आग लग जाएगी और सारी प्रजातियाँ मिट जाएँगी। तुम्हारा कोई दोष नहीं है। ना नेता जी का, ना सेठ जी का दोष है, किसी का कोई दोष नहीं है। ये तो प्रारब्ध की बात है, ये सब पहले से ही तय था, सब पुरानी पुस्तकों में लिखा हुआ है।”

मुझे न इंसानों से भी उतनी सहानुभूति नहीं है, मुझे सहानुभूति है नंगे लोगों से, ये सब जो जानवर हैं इनसे। इनके पास तो कपड़े भी नहीं हैं। आप तापमान बढ़ा रहे हो, आप बारिशें ला रहे हो, उनके पास कपड़े भी नहीं हैं। आपको शर्म नहीं आती है?

अभी गाय को एक मार गया बोधस्थल के पास कोई, वो सड़क पर मर गई। उसका छोटा सा बच्चा उसको तो दूध भी नहीं पीने दिया होगा पहले भी, तो इसीलिए बहुत कमज़ोर था। और वो मरी माँ को देखते वहाँ खड़ा है, दो दिन से खड़ा हुआ है वहीं पर वो माँ है। वो उसको उठा भी ले गए तो भी वहीं खड़ा हुआ है, उसकी हड्डियाँ निकली हुई हैं। उसको दे रहे हैं खाने को, खा नहीं रहा। फिर संस्था के लोग गए उसको मोटरसाइकिल पर उठाकर के रखकर के लेके आए हैं, अभी बोधस्थल के अंदर उसको रखा हुआ है। उसकी फ़ोटो भेज रहे हैं। उसका मुँह देख रहा हूँ उसको कुछ समझ में ही नहीं आ रहा कि मैं कौन हूँ? मेरे साथ ये हो क्यों गया? और ये इंसान मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहे हैं?

वो तो पैदा भी ज़बरदस्ती किया गया होगा। दूध के लिए बछिया-बछड़े ज़बरदस्ती पैदा किए जाते हैं। जब ज़बरदस्ती कृत्रिम गर्भाधान से पैदा होंगे तभी तो फिर गाय दूध देगी। पहले तो तुमने उसको ज़बरदस्ती पैदा किया, उसकी माँ मार दी। जब तक वो ज़िंदा था उसको दूध पीने नहीं दिया क्योंकि वो दूध पी लेगा तो आपके घरों में चाय कैसे बनेगी? अब उसको ले आए उसको खिला भी रहे हैं तो वो खा नहीं रहा। उसको ज़बरदस्ती पकड़-पकड़ के उसके मुँह में ठूँस रहे हैं, “कुछ तो खा ले!” वो मर ही जाएगा, इतना कमज़ोर है।

आपको पता है हर 0.1 डिग्री सेल्सियस राइज पर हज़ारों पशु-पक्षियों की प्रजातियाँ विलुप्त हो जाती हैं, आपको नहीं पता चलता अपने घर में बैठे हो। उनका इकोसिस्टम तबाह हो गया, सिर्फ़ 0.1 डिग्री एवरेज टेम्परेचर राइज पर हज़ारों प्रजातियाँ एडिशनली ख़त्म हो गईं। उन्हें ख़त्म करने के लिए थोड़ी है कि आके उनको मारोगे तो ही ख़त्म होंगे, तुमने उनका घर ख़त्म कर दिया। वो ख़त्म हो गए ना? वो कहाँ रहेंगे? वो ख़त्म हो गए। आपको नहीं पता चलता, अपने घर में हो।

मासिव एक्स्टिंक्शन चल रहा है जंगलों में। और वो क्यों चल रहा है? वो आपके कन्ज़म्प्शन की खातिर चल रहा है, ऐसे नहीं चल रहा। आपके घर में जितना कुछ है वो जंगल काट के ही आ रहा है। आपके पास पैसा आ जाता है आप बोलते हो, "मेरे पास पैसा आ गया है, तो अब तो मैं नॉनवेज खाऊँगी।" दुनिया की 70% खेती इसलिए होती है ताकि बकरा, ख़ासकर जो बीफ़ है वो तैयार हो सके। वो सब बड़े जानवर होते हैं, उनको खिलाने के लिए बहुत ज़मीन लगती है, वो ज़मीन जंगल काट के आती है।

आप सोचते हो कि आपका जो घर है, वो तो बस ऐसे ही स्पेस में टंगा हुआ है, आइसोलेशन में। आपका जो घर है, वो एक कन्ज़म्प्शन का पैटर्न है। घर को आप ऐसे भी डिफ़ाइन कर सकते हो: द हाउसहोल्ड इज़ अ यूनिट ऑफ कन्ज़म्प्शन। वो जो कन्ज़म्प्शन है, वो कहाँ से आ रहा है? आप पढ़े-लिखे होकर भी सोचना नहीं चाहते।

कहीं कोई प्राकृतिक आपदा आ जाती है, ठीक है? मनुष्यों को बचाने के लिए आर्मी पहुँच जाती है, डिज़ास्टर फ़ोर्स पहुँच जाती है, हेलीकॉप्टर पहुँच जाते हैं। जंगलों में उनको बचाने के लिए कौन पहुँचेगा? जो जंगलों में करोड़ों ख़त्म हो गए इंसान की करतूत की वजह से।

आप देखिएगा, हमारी जितनी वैल्यूज़ हैं, वो सब की सब कन्ज़म्प्शन को बढ़ावा देती हैं कि नहीं देती हैं, आप ग़ौर से देखिएगा। जिसको हम कहते हैं न कल्चरल वैल्यूज़, उसमें ऊपर-ऊपर भले ही क्या दिया जाए: "संतोषं परमं सुखम्" — पर आप ग़ौर से देखिएगा, वहाँ जिन-जिन बातों को एग्ज़ॉल्ट किया जाता है, जिन-जिन बातों को महत बताया जाता है, मूल्यवान बताया जाता है, वो सारी बातें कन्ज़म्प्शन को बढ़ाती हैं कि नहीं बढ़ाती हैं?

आप महिला हैं। मुझे नहीं पता, आप विवाहिता हैं कि नहीं। पर आप ना हो, तो आपके पीछे पड़ जाएँगे कि शादी करो, बच्चे पैदा करो। उसको बोला जाता है फुलनेस्ट, मार्केटिंग की भाषा में। और जो फुलनेस्ट होता है न, ये किसी भी मार्केटर की ड्रीम होता है: मियाँ-बीवी जवान और दो हैं बच्चे और अब होगा दनादन कन्ज़म्प्शन। और बच्चा जो होता है, वो तो ख़ासतौर पर किसी भी मार्केटर के लिए बिल्कुल ऐसा होता है कि देखो लॉटरी लग गई।

हमारी सारी जो वैल्यूज़ हैं, आप ग़ौर करिएगा मार्केट-फ़्रेंडली वैल्यूज़ हैं। माने कन्ज़म्प्शन-फ़्रेंडली, माने एमिशन-फ़्रेंडली। हमारी सारी वैल्यूज़ ही एमिशन-फ़्रेंडली हैं, आप फेस्टिवल्स मनाते हो वो तो एक बहुत गहरी बात होनी चाहिए, आध्यात्मिक बात। आपने देखा है? फेस्टिवल का मतलब एमिशन होता है। आपने देखा है?

प्रश्नकर्ता: जी।

आचार्य प्रशांत: बस। कल्चरल, रिलिजस, सोशल — ऑल वैल्यूज़ आर जस्ट एमिशन-फ्रेंडली। कोई भी चीज़ हो सकती है आपकी ख़ुशी की, जिसमें धूम-धड़ाका ना हो? आपकी संस्था अध्यात्म के ज़रिए आपको एक सूक्ष्म आनंद सिखा रही है, कि जिसमें धूम-धड़का करने की बहुत ज़रूरत नहीं है, फिर भी मौज है। क्लाइमेट चेंज को यही चीज़ रोक सकती है बस, कि मुझे आनंदित होने के लिए तेल जलाने की ज़रूरत नहीं है। माय रिक्रिएशन डज़ नॉट डिपेंड ऑन कन्ज़म्प्शन।

और फिर कह रहा हूँ, ये सब चीज़ें न, कि दो-चार बल्ब बंद कर दें और वो ए.सी. है, वो फोर-स्टार की जगह सेवन-स्टार ए.सी. ले लिया, या ईवी ले ली। ये अच्छी बातें हैं, पर इनसे बात बनेगी नहीं। दो फ़ैक्टर्स हैं: कितने लोग हैं और हर व्यक्ति द्वारा कितना भोगा जा रहा है। कितने व्यक्ति हैं और हर व्यक्ति कितना भोग रहा है, यही है। और उन व्यक्तियों में भी आप जानते हो कौन से व्यक्ति हैं जो भोग रहे हैं, जब तक उन्हें उनके महलों से नीचे नहीं उतारोगे खींच करके कुछ नहीं हो सकता।

मैंने कहा था, ये जितने सेलिब्रिटी बनके घूमते हैं, ये कभी भी किसी भी मीडिया पर आएँ, नियम क्यों नहीं है कि ये मीडिया पर आएँ, और इनके बगल में इनका कार्बन फुटप्रिन्ट कितना है ये प्रदर्शित होने लगे? ताकि मुझे पता तो चले कि इस आदमी को इज़्ज़त देनी है कि नहीं देनी है। और जैसे ही आपको दिखाई देगा ना कि जिसको आप पूज रहे हो, चाहे वो क्रिकेटर हो, कि पॉलिटिशियन हो, कि एंटरटेनर हो, कि यूट्यूबर हो, कि कोई भी हो दुनिया का, कि जो आपके लिए बहुत बड़ी चीज़ बना बैठा है कि रिलिजस फ़िगर हो, जैसे ही उसके बगल में यहाँ पे आपको ऐसे-ऐसे फ़्लैश करता उसका दिखाई देगा कार्बन फुटप्रिन्ट का फ़िगर वैसे ही आपको समझ में आ जाएगा कि कितना बड़ा दानव है ये।

दानव वही है आज का जो पृथ्वी को बर्बाद कर रहा हो, दुर्गा सप्तशती में भी वही दानव थे जो पृथ्वी को बर्बाद कर रहे थे।

और नहीं कोई दानव की परिभाषा है। चुनाव में नेताओं से अब लिखवाया जाता है अपने ऐसेट्स बताओ, चल-अचल संपत्ति का ब्यौरा दें। ये भी लिखवाओ कि तुम्हारा कार्बन फुटप्रिन्ट कितना है। वोट देने से पहले पता होना चाहिए ना कि ये कितना बड़ा क्लाइमेट क्रिमिनल है जिसको मैं वोट दे रहा हूँ। और इसकी जो पुरानी पॉलिसीज़ हैं, उनमें कहीं भी कोई क्लाइमेट केयर शामिल है? तुम आज पहली बार वोट माँगने नहीं आए हो, तुमने पहले भी बहुत बार वोट माँगे हैं, दिखाओ कि तुम्हें जब वोट मिला तो तुमने क्लाइमेट का क्या किया? ये सब सार्वजनिक होना चाहिए।

किसी भी इंसान का मूल्यांकन आज करने में बहुत बड़ी वेटेज उसके कार्बन फुटप्रिन्ट की होनी चाहिए। और बाक़ी बातें छोड़ो, तुम कितनी इज़्ज़त के हक़दार हो ये मैं तय करूँगा इससे कि तुम्हारा कार्बन फुटप्रिन्ट कितना बड़ा है। कम से कम 50% वेटेज तो इस बात की होनी चाहिए।

लगाओ ग्रीन टैक्स, हर माल जो ख़रीद रहे हो उसके कार्बन इम्पैक्ट के हिसाब से असली टैक्स होना चाहिए — ग्रीन टैक्स। और साथ ही साथ जो भी प्रॉडक्ट्स हैं जिसमें कार्बन एमिशन ज़ीरो है या बहुत कम है, उसी टैक्स से उसको सब्सिडाइज़ भी करो, ताकि आम आदमी पर बोझ ना पड़े। सबसे ज़्यादा तो ग्रीन टैक्स लगेगा माँस पर क्योंकि फॉसिल फ्यूल के बाद कार्बन डाइऑक्साइड एमिशन का सबसे बड़ा कारण एनिमल एग्रीकल्चर है। तो आप जो मज़े में खा लेते हो ना कि अंडे और मांस और ये, इन सब पर इतना हेवी टैक्सेशन होना चाहिए कि उनका क्लाइमेट इम्पैक्ट जस्टिफ़ाइ हो सके।

और ये कोई नया आइडिया नहीं है। ग्रीन टैक्स तो यूरोप में बहुत सारे देश लगा ही रहे हैं, वो चल रहा है ऑलरेडी। छोड़िए मैं बोलता ही जाऊँगा।

और कुछ इसमें?

प्रश्नकर्ता: जी, आचार्य जी इसका एक फ़ॉलो-अप क्वेश्चन था, कि अभी जैसे आपने कार्बन फुटप्रिन्ट की बात कर रहे थे, तो अभी एक नासा ने इसरो ने एक सैटेलाइट भी लॉन्च की है, निसार करके। तो इस सैटेलाइट की ख़ासियत ये बताई जा रही है कि अब जितना भी कार्बन एमिशन होगा, उसका पर्टिकुलर एरिया से और भी इन-डेप्थ में हमें पता चल जाएगा कि कितना एमिशन कहाँ पर हो रहा है। किस कंट्री में हो रहा है। तो क्या इससे कोई फ़ायदा होगा?

आचार्य प्रशांत: फ़ायदा तो होगा, बिल्कुल। सूचना अगर आ रही है तो हमारे लिए झूठ बोलना थोड़ा और मुश्किल हो जाएगा। जब सूचना नहीं रहती, तथ्य नहीं रहते तब व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी चलती है। जब सीधी-सीधी, बिल्कुल सर्टिफ़ाइड, आपके सामने इन्फ़ॉर्मेशन मौजूद होगी तो झूठ बोलना थोड़ा मुश्किल होगा।

प्रश्नकर्ता: थैंक यू, आचार्य जी।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
Comments
LIVE Sessions
Experience Transformation Everyday from the Convenience of your Home
Live Bhagavad Gita Sessions with Acharya Prashant
Categories