पृथ्वी नहीं झेल सकती हम सबको!

Acharya Prashant

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पृथ्वी नहीं झेल सकती हम सबको!
एलन मस्क को मनुष्यों की प्रजाति के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता क्या? बाक़ी सब जो प्रजातियाँ हैं, वो क्या हैं? हमारे दुश्मन हैं या वो हमारे बच्चे हैं? वो चंद गिने-चुने विकसित देशों की बात कर रहे हैं। वो बहुत गिने-चुने विकसित देशों की बात कर रहे हैं, जहाँ पर अब टीएफ़आर इस लेवल पर आ गया है कि पॉपुलेशन स्टेबलाइज़ हो गई है, या माइनर डिक्रीज़ है। कुछ देश हैं बस ऐसे। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: कह रहे हैं, एलन मस्क की टीएफ़आर (टोटल फर्टिलिटी रेट) घटता जा रहा है — 2.2, मतलब आकलन ह्यूमैनिटी क्राइसिस में है। उसका एग्ज़ाम्पल वो देते हैं जैसे जापान, साउथ कोरिया, कि आप अधिक से अधिक बच्चे पैदा करें। एलन मस्क अपने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पे लगातार ये पोस्ट करते रहते हैं।

आचार्य प्रशांत: एलन मस्क को मनुष्यों की प्रजाति के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता क्या? बाक़ी सब जो प्रजातियाँ हैं, वो क्या हैं? हमारे दुश्मन हैं या वो हमारे बच्चे हैं?

किसने कह दिया? जब हम कहते हैं कि कुछ घटता जा रहा है, तो थोड़ा समझिएगा, बुद्धि लगाइएगा, तर्क से। मान लीजिए हम 800 करोड़ हैं आज। जब हम कह दें कि 800 करोड़ से हम कम हो रहे हैं। कम तो पहली बात, हम हो नहीं रहे। हम 1000 करोड़ की ओर बढ़ रहे हैं। वो जो बात कर रहे हैं, वो चंद गिने-चुने विकसित देशों की बात कर रहे हैं। वो बहुत गिने-चुने विकसित देशों की बात कर रहे हैं, जहाँ पर अब टीएफ़आर इस लेवल पर आ गया है कि पॉपुलेशन स्टेबलाइज़ हो गई है, या माइनर डिक्रीज़ है। कुछ देश हैं बस ऐसे।

दूसरी बात, हम ये कहें भी अगर कि पॉपुलेशन डिक्लाइन कर रही है, तो उसमें हम ये कहना चाहते हैं कि 800 करोड़ तो होनी ही चाहिए। 800 करोड़ से नीचे क्यों जा रही है? कौन से फॉर्मूला ने ये प्रूफ़* *करा है कि 800 करोड़ होनी चाहिए?

ये ऐसी सी बात है कि, साहब मेरा वजन ना 160 किलो है और गिरता ही जा रहा है, गिरता ही जा रहा है, 158 हो गया। अरे! 158 हो गया तो शुभ बात है, अच्छी बात है। कौन से फॉर्मूला ने बताया है कि 160 किलो वजन होना चाहिए तुम्हारा?

सिर्फ़ इसलिए कि कोई सफल व्यापारी है, इससे ये नहीं सिद्ध हो जाता कि बुद्धि भी है उसके।

मैं फिर पूछ रहा हूँ, कौन सा फॉर्मूला है जो कह रहा है कि 160 किलो वजन होना चाहिए? सारी बात ये हो रही है *पॉपुलेशन डिक्लाइन*। मैं पूछ रहा हूँ, फ्रॉम व्हाट लेवल्स? डिक्लाइन फ्रॉम व्हाट लेवल्स?

एक आदमी 50 किलो का है, उसका 2 किलो वजन कम हो गया, ये बुरा हुआ। एक आदमी 160 किलो का है, उसका 2 किलो वजन कम हो गया, ये बहुत अच्छा हुआ। पॉपुलेशन डिक्लाइन पहली बात तो हो नहीं रही। दूर-दूर तक पॉपुलेशन डिक्लाइन नहीं हो रही है। दूसरी बात, अगर हो रही हो तो उससे शुभ घटना कोई हो नहीं सकती।

तीसरी बात, जो महत्त्वपूर्ण बात है, वो समझो। बात सिर्फ़ पॉपुलेशन की नहीं होती है।

कंजम्प्शन = पॉपुलेशन × पर कैपिटा कंजम्प्शन।

पॉपुलेशन 2% गिरी, पर कैपिटा कंजम्प्शन 10% बढ़ गया, तो कंजम्प्शन का क्या हुआ? लगभग 8% बढ़ गया। और अगर आपको अपना पर कैपिटा कंजम्प्शन बढ़ाना है, जो कि बढ़ेगा, क्योंकि दुनिया के बहुत सारे मुल्क अभी बहुत गरीब हैं। और हमारा जो विकास का model है, उसमें जब आपके पास समृद्धि आती है तो आपका कंजम्प्शन बढ़ता है। तो पर कैपिटा कंजम्प्शन तो बढ़ेगा ही, बढ़ेगा।

तो पर कैपिटा कंजम्प्शन अगर बढ़ रहा है, तो उसको भी न्यूट्रलाइज़ करने के लिए आपको क्या करना पड़ेगा? पॉपुलेशन कम करनी पड़ेगी न? नहीं समझे?

अभी अगर 50 यूनिट का कंजम्प्शन हो रहा है, और 50 यूनिट कंजम्प्शन ऐसे हो रहा है कि पॉपुलेशन है 10 और पर कैपिटा कंजम्प्शन है 5। 10 की पॉपुलेशन है मान लो पूरे ग्लोब की, और 5 पर कैपिटा कंजम्प्शन है। तो टोटल कंजम्प्शन कितना है? 50। और यही जो टोटल कंजम्प्शन है, यही टोटल कार्बन एमिशन है। डायरेक्ट कोरिलेशन है। कंजम्प्शन एंड कार्बन एमिशन डायरेक्टली कोरिलेटेड।

तो 50 = 10 × 5, ठीक।

ये जो "5" है, 5 क्या है? प्रति व्यक्ति उपभोग, *कंजम्प्शन*। ये बढ़ेगा ही, क्योंकि दुनिया में अभी कैसे लोग बहुत हैं? गरीब लोग बहुत हैं। उनके पास जब पैसा आएगा, तो क्या करेंगे? वो कंजम्प्शन करेंगे। एक गरीब का घर था, जिसके पास पंखा भी नहीं था उसके पास पैसा आया है, वो पंखा और कूलर ख़रीद रहा है। हम ये नहीं कह सकते कि ये गलत कर रहा है। गलत कर रहा है।

बिल्कुल गलत नहीं कर रहा है। एकदम ठीक कर रहा है।

भारत जैसे देश में अगर किसी घर में कूलर भी नहीं है, तो ये क्लाइमेट एक्टिविज़्म की बात नहीं है, ये पॉवर्टी है सीधी-सीधी। हर घर में कूलर होना चाहिए।

लड़कियाँ आती हैं अपने छोटे कस्बों से, गाँव से, शहरों में काम करने आती हैं। और हम जानते हैं शहरों का पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम कैसा है। हर लड़की के पास कम से कम अपनी एक बाइक या स्कूटी होनी चाहिए। हम इसको नहीं कह सकते कि ये तो कंजम्प्शन है। कंजम्प्शन नहीं है, ये बेसिक नीड है। कूलर का होना, स्कूटी का होना, ये बेसिक नीड है।

तो आदमी जब गरीबी से थोड़ा सही स्तर पर जाएगा, तो कंजम्प्शन तो बढ़ेगा। माने 50 = 10 × 5 था, उसमें ये जो "5" का आँकड़ा है इसे तो बढ़ना पड़ेगा। और इसके बढ़ने में कोई बुराई नहीं है, बिल्कुल कोई बुराई नहीं है। अमीर अपना कंजम्प्शन बढ़ाए, उसमें बुराई है।

अमीर अपना कंजम्पशन बढ़ाए, प्राइवेट जेट ख़रीदे, उसमें बुराई है। पर एक ग़रीब आदमी है, वो अपना कंजम्पशन बढ़ा रहा है, तो वो ज़रूरी है बाबा। वो फटे कपड़े पहनता था, अब कपड़े पहनना शुरू करेगा। तो कपड़े पहनने में भी कुछ कार्बन एमिशन होता है, उसको हम बुरा नहीं बोल सकते।

तो ये जो "5" का आँकड़ा है, ये बढ़ना है। और जो "50" है, हम वही नहीं संभाल सकते। हम अच्छे तरीक़े से जानते हैं कि आगे हम बात क्या कर रहे हैं, आदर्श क्या बना रहे हैं। ये जो सीओपी सीओपी - कॉन्फ़्रेंस ऑफ़ पार्टीज़ वग़ैरह हमारे होते हैं, तो उसमें 2030 के, 2050 के हम गोल्स लेकर आते हैं कार्बन एमिशन के। उसमें हम क्या बोलते हैं? कि ये जो "50" का आँकड़ा है, इसको अभी कम करना है ना? और नहीं बढ़ा सकते। जितना है, उतने में ही क्लाइमेट चेंज इतना हो गया।

अब, 50 = 10 × 5। 5 को तो बढ़ना ही बढ़ाना है, और 50 को नीचे लाना है, तो क्या करेंगे? इस 10 को तो गिराना पड़ेगा न? तो 10 अगर गिर रहा है, तो शुभ बात है या रोएँ कि पॉपुलेशन डिक्लाइन हो रही है? तो ये क्या हवा बना रखा है, कि पॉपुलेशन कोलैप्स, पॉपुलेशन कोलैप्स। मूर्खता की बातें! हमें चाहिए पॉपुलेशन कोलैप्स भाई, हमें चाहिए है। और वो हो नहीं रहा है, कहीं से नहीं हो रहा।

जापान की आबादी ही कितनी है? जापान में अगर 0.5% डिक्लाइन इनपॉपुलेशन हो गया, उससे पूरी दुनिया की आबादी पर क्या असर पड़ता है? भारत और बांग्लादेश को देखे, हमारे 5 ज़िलों के बराबर है जापान। और जो विकसित देश भी हैं, उनमें जो सबसे बड़ा विकसित देश है। जो बात ईलॉन मस्क बोलेंगे नहीं, उनका अपना देश अमेरिका, वहाँ पर आबादी जबरदस्त तरीक़े से बढ़ रही है।

जापान का उदाहरण बार-बार दे रहे हो। डिवेलप्ड कंट्रीज़ में से एक ही है जिसकी आबादी अंधाधुंध बढ़ रही है, उसका नाम है अमेरिका। क्योंकि अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा कंज़्यूमर है, और इमिग्रेशन भी सबसे ज़्यादा अमेरिका में होता है। अमेरिका में होता है, कनाडा में होता है — इनकी आबादी खूब बढ़ रही है।

तो कुल मिलाकर दुनिया की आबादी काफ़ी तेज़ी से बढ़ ही रही है।

और एक बात और समझना, कुछ बातें पर्सपेक्टिव में रखनी ज़रूरी हैं, नहीं तो हमें आँकड़ों के माध्यम से धोखा दे दिया जाता है। एक आदमी का वज़न 90 किलो था, उसका वज़न 90 से बढ़कर 95 हो गया। इसको देखिएगा। यहाँ पर डॉक्टर कितने हैं? वो बताएँगे मुझे।

ठीक है, आप बताइएगा एक आदमी का वज़न 90 किलो था, 90 से बढ़कर 95 हो गया। और एक आदमी का वज़न 160 किलो था, 160 से बढ़कर 162 हो गया। दोनों में से ज़्यादा ख़तरनाक बात कौन-सी है?

प्रश्नकर्ता: ख़तरनाक दोनों ही हैं, पर 160 से 162 — वो ज़्यादा ख़तरनाक है।

आचार्य प्रशांत: समझ में आ रही है बात? लेकिन मीडिया बोलेगा कि देखो, अच्छे दिन आ गए हैं। अब उतनी गति से नहीं बढ़ रही है। पहले 5 की गति से बढ़ती थी, पहले प्रतिवर्ष इसका जो वज़न था, वो 5 किलो की गति से बढ़ता था अब 2 किलो से बढ़ रहा है। इसका मतलब ये है कि सब ठीक है? तुम ये नहीं देख रहे हो कि पहले जब बढ़ रहा था, तब बेस 90 का था। 90 से 95 हो गया और शायद उसकी जान बच जाए। पर 160 वाला जब 162 होगा, तो अब वो मर के रहेगा।

बेस भी देखना पड़ता है। मीडिया बेस नहीं बताएगा। मीडिया बस ये बता देगा कि देखो, आबादी इतनी गति से बढ़ रही थी। पहले 3.5% की दर से आबादी बढ़ रही थी, अब आबादी मात्र 1.8% की दर से बढ़ रही है।

बट ऐट व्हाट बेस?

90 वाला 95 हुआ है या 160 वाला 162 हुआ? ये आपको नहीं बताया जाएगा। ये आपको ख़ुद सोचना पड़ेगा। समझ में आ रही है बात? नहीं समझ में आई ये बात?

अच्छा, फिर पूछता हूँ।

एक आदमी 40 की स्पीड पर कार चला रहा था, उसने 40 से बढ़ाकर 70 कर दी स्पीड। ये आपको समझ में आएगा। आप 40 पर चला रहे थे, आपने 40 से बढ़ाकर 70 कर दी स्पीड, कुछ ख़तरा बढ़ा होगा? ये ख़तरा ज़्यादा बढ़ा, 40 से 70 पर आ गए? या एक आदमी 140 पर चला रहा था उसने 150 कर दी, ये ख़तरा ज़्यादा बढ़ा?

श्रोता: 140 वाला।

आचार्य प्रशांत: पर मीडिया बस ये बताएगा —"देखो, वी आर ऐक्चुअली स्लोइंग डाउन। पहले स्पीड 30 की rate से बढ़ती थी, अब स्पीड सिर्फ़ 10 की rate पर बढ़ रही है!"

बट ऐट व्हाट बेस?

पहले आप 40 पर थे, 40 से 70 होना बहुत ख़तरे की बात नहीं है। पर 140 से 150 होना बहुत ख़तरे की बात है। 140 से तो आपको Negative जाना है। पर जब Negative जाओ तो शोर मचाएँगे, पॉपुलेशन कोलैप्स, पॉपुलेशन कोलैप्स

भाई, हमें पॉपुलेशन कोलैप्स चाहिए! हो नहीं रहा है। पहली बात, हो नहीं रहा। दूसरी बात, अगर हो तो बहुत अच्छी बात है। जितने लोग हैं पृथ्वी पर, 800 करोड़। पृथ्वी इनका कंजम्प्शन नहीं झेल सकती। सस्टेनेबल पॉपुलेशन लेवल्स अभी जितनी है, उसकी आधी होंगी। और इसका मतलब ये नहीं है कि लोगों को मार देना है। पॉपुलेशन अपने-आप कम हो जाएगी। मृत्यु अपने-आप आ जाती है, बस आप अंधाधुंध पैदा करना बंद करो।

अगर आप पृथ्वी को, सब प्रजातियों को, और मानव प्रजाति को भी बचाना चाहते हो, तो। मरना ही हो, आग ही लगानी हो, तो आपकी मर्ज़ी।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते। सर, मैं एम.पी. कटनी से आया हूँ। और बलराम नाम है मेरा, और पिछले 10 महीने से आपके सत्रों से जुड़ा हूँ।

सर, मेरा सवाल था कि जैसे गाँव में पाँच-छह बेटियाँ पैदा कर रहे हैं, और परिवार के वारिस के चक्कर में कि लड़का ही चाहिए परिवार चलाने के लिए। तो अब छठवाँ या सातवाँ लड़का चाहिए। और चिंता इसलिए नहीं है, कि सरकार तो दे रही है खाने के लिए। तो चिंता क्या करना? और इसी से अब फिर मंदिर भी तैयार हैं। मंदिर कह रहा है कि, "इस बार लड़का होगा!" और इस चक्कर से 1, 2, 3, 4, 5, 6 ऐसे बढ़ते जा रहे हैं। इसमें मंदिर भी साझेदार है।

आचार्य प्रशांत: नहीं समझा क्या बोल रहे हो?

प्रश्नकर्ता: सर, जो मंदिर में पंडा बैठा है, तो वो बता रहा है कि "नहीं, इस बार लड़का ही होगा।"

आचार्य प्रशांत: इसमें कई तरीक़े के चुटकुले बनाए जा सकते हैं, पर अभी मौका ठीक नहीं है। तो क्या किया है हमने? हमने आम आदमी को झुनझुना दे दिया है, कि ले भाई, तुझे मुफ़्त खाना मिलता रहेगा। तुझे मुफ़्त खाना मिलता रहेगा, तू झुनझुना बजा।

बाक़ी दुनिया भर की तरक्की सब अमीरों के पास रहे, सारी ताक़त सत्ताशीनों के पास रहे, सारी अय्याशियाँ एक बहुत छोटे से दल के पास रहे — "ए ग्रुप ऑफ़ वेरी प्रिविलेज्ड इंडिविजुअल्स" और आम आदमी झुनझुना बना रहा है। उसे मंदिर भेज दो, वो जो भी पंडा जी हैं उनके पास। तो मंदिर में झुनझुना बजाएगा। उसे मुफ़्त का खाना-पीना दे दो, वो ख़ुश है। कह रहा है — "आठ बच्चे भी कर लो, सरकार से आ जाता है मुफ़्त का खाना, बढ़िया बात है।” ठीक है।

और अब तो बाकायदा चुनावों के समय अलग-अलग दल इस तरह की योजनाएँ निकालते हैं, कि अगर बेरोज़गार है तो उसे हर महीने इतना दे देंगे। महिला है, तो उसे हर महीने इतना दे देंगे। और भी कुछ निकालते होंगे। “अगर आपका नाम 'र' से शुरू होता है तो आपको मिलेंगे हर महीने ₹3000। ये हमारा चुनावी घोषणा-पत्र है!" कुछ भी हो सकता है।

इन सब मुद्दों की जो काट है, वो बताए दे रहा हूँ। इन सब मुद्दों की काट क्या है?

आत्मज्ञान।

एक बार आप समझ गए न, आपके भीतर कौन-सी चीज़ है जो आपको बेवकूफ़ बनाती है। आपके भीतर ऐसा क्या है जिसका उपयोग करके पूरा संसार आपको मूर्ख बनाता है, फिर आप बच जाओगे।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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