
आचार्य प्रशांत: जैसा कि हम जानते हैं, वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड के बढ़ने से क्लाइमेट चेंज होता है। और कार्बन डाइऑक्साइड के बढ़ने के प्रमुख कारणों में से एक है ऊर्जा का उत्पादन, जिसमें बिजली का उत्पादन भी आता है। और इसीलिए जब हम 2030 के अपने क्लाइमेट गोल्स की बात करते हैं, तो उसमें एक प्रमुख लक्ष्य था कि कोयले से जो बिजली का उत्पादन होता है, उसको कम करके 50% तक जो उत्पादन है, वो रिन्यूएबल नवीकरणीय एनर्जी के स्रोतों द्वारा हो। जिसमें ग्रीन एनर्जी हम जिसको कह सकते हैं, सोलर विंड वग़ैरह।
अब आजकल मैं पढ़ रहा हूँ, अख़बारों में काफ़ी आ रहा है। हम काफ़ी प्रसन्न हैं कि भारत ने 2030 की डेडलाइन से 5 साल पहले ही, यानी 2025 में 50% गैर-फॉसिल फ्यूल की बिजली उत्पादन क्षमता हासिल कर ली है। और हम ख़ुद को बधाइयाँ दे रहे हैं कि साहब, हम कोयले की अपेक्षा अब 50% गैर-फॉसिल फ्यूल पर आ गए हैं। कोयला फॉसिल फ्यूल है। बाक़ी ये सब जितना पेट्रोल, डीज़ल, गैस, ये सब भी फॉसिल फ्यूल्स में गिने जाते हैं। तो ये 50% की इंस्टॉल्ड कैपेसिटी हमने लगा ली है। क्या इसका मतलब है कि हम हरे-भरे हो गए, या कोयले की पकड़ ढीली हो गई? थोड़ा देखते हैं।
पहली बात, इंस्टॉल्ड कैपेसिटी का बस इतना-सा मतलब है कि प्लांट कितना उत्पादन कर सकते हैं संभावित तौर पर, पोटेंशियली। पर असली बात ये है कि वो वास्तव में कितना उत्पादन कर रहे हैं, संभावित तौर पर नहीं, पोटेंशियली नहीं, एक्चुअली।
हक़ीक़त ये है कि भारत की 72% बिजली आज भी कोयले से आ रही है (सोर्स: सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी)। सोलर और विंड बस 12–13%, हाइड्रो 10%, न्यूक्लियर 3% से भी कम। तो बताइए, जब 7 में से 5 यूनिट बिजली कोयले से ही बन रही हो, तो क्या हम ख़ुद को नवीकरणीय देश, रिन्यूएबल एनर्जी, क्लीन एनर्जी, ग्रीन एनर्जी का देश कह सकते हैं?
अब दूसरी बात, जो नॉन-फॉसिल या गैर-फॉसिल होता है, उसको सुनकर हमें ऐसा लगता है कि वह तो क्लीन ही होगा। फॉसिल जैसा मैंने अभी आपको कहा था, फॉसिल में कोल, गैस, गैसोलिन, पेट्रोल, डीज़ल—ये सब जितना कुछ भी ज़मीन के भीतर से निकलता है, वह सब फॉसिल फ्यूल में आ जाता है। वो वहाँ से आता है और हमें मालूम है कि जब वो जलेगा, तो कार्बन उत्सर्जन करता है। उसमें से बहुत कार्बन डाइऑक्साइड रिलीज़ होती है और उससे क्लाइमेट चेंज होता है।
तो जो नॉन-फॉसिल फ्यूल्स होते हैं, हमारे दिमाग़ में एक बात बैठ गई है कि वो तो शायद क्लीन ही होते होंगे। नहीं, ऐसा नहीं है। क्योंकि नॉन-फॉसिल में सोलर और विंड वग़ैरह हैं — वो तो चलिए साफ़ होते हैं, क्लीन होते हैं इस अर्थ में कि वो कार्बन डाइऑक्साइड नहीं रिलीज़ करते। लेकिन नॉन-फॉसिल में फिर न्यूक्लियर भी तो आता है, हाइड्रो भी तो आता है, माने बड़े डैम्स भी तो आते हैं।
ये जो बड़े-बड़े डैम्स हैं, इन्होंने लाखों गाँव उजाड़ दिए, जंगलों को डुबो दिया। पर इतना ही नहीं है, ये मीथेन गैस भी छोड़ते हैं। और ये जो मीथेन गैस होती है, ये कार्बन डाइऑक्साइड से 20 गुना ज़्यादा ग्रीनहाउस पोटेंशियल रखती है (सोर्स: इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज)। तो फिर नॉन-फॉसिल माने क्लीन कैसे हो गया? अगर नॉन-फॉसिल में हाइड्रो भी आता है, तो हाइड्रो तो कहीं से क्लीन नहीं है।
तो क्या इसे ग्रीन कहना भी ईमानदारी है या सिर्फ़ एक कम-ईमानदारी की सुविधा?
अगला बिंदु — भारत का कार्बन उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है। हम दुनिया में तीसरे सबसे बड़े कार्बन एमिटर हैं। 2023 में हमने 3 बिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित करी है (सोर्स: इंडियन एक्स्प्रेस)। नंबर एक पर चीन है, नंबर दो पर अमेरिका, तीसरे नंबर पर हम ही हैं (सोर्स: वर्ल्ड पॉपुलेशन रिव्यू)।
त्रासदी की बात ये है कि कार्बन क्राइसिस जो होगी, जो क्लाइमेट कैटस्ट्रॉफ़ी है, इसका सबसे भयानक असर जिन देशों पर पड़ना है, उनमें हम अव्वल नंबर पर आते हैं।
अमेरिका कार्बन एमिशन कर रहा है, पर अमेरिका उतनी मार नहीं झेलेगा। तो अमेरिका का स्वार्थ तो समझ में आता है, अमेरिका एमिट करता रहेगा और कहेगा कि हम पर तो ज़्यादा चोट पड़नी नहीं है, तो एमिट करते चलो। पर भारत पर तो सबसे ज़्यादा चोट पड़नी है न। तो हमें तो सबसे आगे होना चाहिए कि दुनिया भर के कार्बन एमिशंस को हम कम करवाएँ, क्योंकि उस सब का भुगतान हमें ही करना पड़ेगा। भारत बहुत-बहुत असुरक्षित देश है, दुनिया के सबसे असुरक्षित देशों में से है जब बात आती है क्लाइमेट चेंज के इंपैक्ट की, असर की।
तो ये तो छोड़ो कि हम बाक़ी देशों से भी आग्रह कर रहे हों, या ऐसी परिस्थितियाँ बना रहे हों, ऐसी लॉबिंग या नेगोसिएशन कर रहे हों कि वो भी अपने एमिशंस कम करें। हम ख़ुद अपने ही एमिशंस बढ़ा रहे हैं।
अमेरिका बढ़ाए तो एक बार को फिर भी समझ में आता है कि भाई, आदमी स्वार्थी होता है। वो कह रहे हैं, हमारा बढ़ाने से अपना तो कोई नुक़सान होगा नहीं, तो बढ़ा लो। पर भारत कैसे एमिशंस बढ़ा सकता है, जब चोट भारत पर ही पड़नी है?
पिछले ही साल 23 राज्यों में हीट वेव चली है ज़बरदस्त (सोर्स: काउंसिल ऑन एनर्जी, एन्वायरनमेंट एंड वॉटर), बिल्कुल ऐसी जो देखी न गई हो, अपूर्व! ग़ज़ब की लू! बाढ़ से करोड़ों लोग प्रभावित हो रहे हैं हर साल और वो संख्या प्रतिवर्ष बढ़ रही है। खेती, जिस पर आधे से ज़्यादा भारत निर्भर है, वह तो पूरी तरह से जलवायु के ही रहमोकरम पर है न।
तो पूछिए ख़ुद से कि सिर्फ़ इंस्टॉल्ड कैपेसिटी पर प्रसन्न होना कहाँ तक बुद्धिमानी की बात है?
चौथी बात — तमाम तरह के लोग जो प्रसन्नता व्यक्त कर रहे हैं और एक-दूसरे को बधाइयाँ दे रहे हैं कि भारत ने रिन्यूएबल इंस्टॉल्ड कैपेसिटी 50% कर ली, वो इसी बात पर खुश हो रहे हैं न कि अब चलो कोयला नहीं जलेगा। क्योंकि ले-दे के बात इतनी-सी थी कि जब हम बिजली बनाते हैं कोयला जला कर के, तो उससे कार्बन डाइऑक्साइड एमिट होती है और ग्रीन एनर्जी में कार्बन डाइऑक्साइड एमिट नहीं होती है।
लेकिन सारी बात ही एकदम ध्वस्त हो जाती है जब हम एक छोटा-सा आँकड़ा देखते हैं, कि भारत में कोयले की खपत बिजली बनाने के लिए कोई कम नहीं हो रही है, बल्कि बढ़ती ही जा रही है (सोर्स: इंडिया क्लाइमेट एंड एनर्जी डैशबोर्ड)। हर साल हम और ज़्यादा कोयला जला रहे हैं। तो माने हम हर साल और ज़्यादा कार्बन एमिशन कर रहे हैं। किसी भी और वर्ष की अपेक्षा, अभी पिछले ही साल भारत ने रिकॉर्ड 1.2 बिलियन टन कोयला जलाया है (सोर्स: इंडिया क्लाइमेट एंड एनर्जी डैशबोर्ड)। और आने वाले सालों में भारत इससे ज़्यादा ही कोयला जलाने जा रहा है, कम नहीं।
क्या आपको पता है, कि 20 गीगावाट से ज़्यादा कैपेसिटी के नए कोल प्लांट्स हम बना रहे हैं आज भी। कोल पर हम अपनी डिपेंडेंस कम नहीं कर रहे हैं, हम तो और नए-नए कोल प्लांट्स बना रहे हैं। 20 गीगावाट के कोल प्लांट्स हम अभी बना रहे हैं।
तो आँकड़ों की बाज़ीगरी करने से ज़मीनी हक़ीक़त थोड़ी बदल जाएगी? हाँ, ठीक है, 50% कैपेसिटी का लक्ष्य हमने सिद्धांततः, थ्योरिटिकली, पहले पूरा कर लिया है। लेकिन असली चुनौती तो वैसी की वैसी ही रखी हुई है। कोयला तो हम आज भी जला रहे हैं और हर साल कोयला हम और ज़्यादा जला रहे हैं।
वही तो चुनौती थी न कि कोयले पर अपनी निर्भरता कम करो ताकि उत्सर्जन घट पाए। यही तो चुनौती थी न कि ख़ुद को उस जलवायु संकट से बचाओ, जो पहले ही हमारी फसलें जला रहा है, हमारे घर डुबो रहा है।
हमें चेतना होगा, ज़मीनी हक़ीक़त को स्वीकारना होगा, तथ्यों को सम्मान देना होगा। वरना हमारे प्यारे देश को प्रकृति की बड़ी कड़ी सज़ा दुर्भाग्यवश भुगतनी पड़ेगी।