तुम कैसे शुद्ध सात्त्विक ज़िंदगी जी लोगे? संभव ही नहीं है। सड़क पर चल रहे हो न? सड़क पर खून है। वो सड़क ऐसे ही नहीं बन गई। सड़क पर ही चलते हो न? भोजन ही खाते हो न? भोजन में खून है। तुम कैसी सात्त्विक ज़िंदगी जी रहे हो? झूठ! हवा में साँस ले रहे हो न? हवा में धुआँ है। और वो धुआँ किस चीज़ का है? वो लाशों का धुआँ है। तुम किस सात्त्विक ज़िंदगी की बात कर रहे हो? लेकिन हमें ये बर्दाश्त करना पड़ेगा, हम गुनाह में शरीक हैं।
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आचार्य प्रशांत: अगर आप लगातार ये याद करे रहें, अगर आपको लगातार ये स्मरण बना रहे, कि मानव-सभ्यता खड़ी ही हिंसा की बुनियाद पर है, कि हमारी एक-एक साँस न जाने कितनों के लिए मौत है, तो फिर आपके कर्म अपने आप बदलेंगे। आपके हाथ में जो आम आता है, वो आम खाकर के बड़े गर्व से घोषित मत कर दीजिएगा कि आप तो शाकाहारी हैं। उस आम के रस में भी खून है। इस बात को अच्छे से समझ लीजिएगा। मैंने भले ही दूध छोड़ दिया हो, जानवरों से संबंधित जितने उत्पाद हो सकते हैं सब छोड़ दिए हों, लेकिन फिर भी मुझे लगातार इस बात का एहसास बना रहता है कि अगर मैं रोटी भी खा रहा हूँ तो उस रोटी में भी खून है।
आश्रम है हमारा, वहाँ हम खरगोशों का बड़ा ख़्याल रखते हैं। आपको पता है, ऑस्ट्रेलिया में खेतों के मालिकों के लिए आवश्यक है कि वो खरगोशों को मारें, सरकार ने नियम बनाया हुआ है। क्योंकि अगर आप खरगोशों को नहीं मारते हो तो वे आपकी फसल खा जाते हैं। आप किसी खेत के मालिक हैं और आपके खेत में बहुत खरगोश देख लिए गए तो आपकी शिकायत कर दी जाएगी, आपको जेल हो जाएगी। तो ये जो आपके पास अन्न भी आता है, ये खून में डूबा हुआ है।
इस पृथ्वी पर वास्तव में इतनी जगह है ही नहीं कि 800 करोड़ लोग रह सकें। ये 800 करोड़ लोग हत्या करके ही जीवित रह सकते हैं और हत्या दिन-रात कर रहे हैं। और ये 800 करोड़ भी अभी और बढ़ेंगे, तब तक बढ़ते रहेंगे जब तक आप और ज़्यादा बच्चों का स्वागत करते ही जाएँगे, करते ही जाएँगे; जब तक आप विवाह को बड़ी बात समझते ही जाएँगे; जब तक आप अपने लड़के-बच्चों के सर पर चढ़ते ही जाएँगे कि अब तुम 25 के हो गए हो, जल्दी शादी करो, उसके बाद जल्दी बच्चे पैदा करो। समझ रहे हो?




