क्लाइमेट चेंज की समस्या इंसान की आबादी और इंसान के उपभोग के कारण है। और इन दोनों समस्याओं के केंद्र में आदमी की पाश्विक वृत्ति है। उस वृत्ति को न सरकारें हटा सकती हैं, न वैज्ञानिक हटा सकते हैं, उस वृत्ति को सिर्फ़ अध्यात्म हटा सकता है। इसलिए जब तक आध्यात्मिक तल पर इस समस्या को संबोधित नहीं किया जाएगा, तब तक संपूर्ण पृथ्वी और मानव जाति के बचने की कोई संभावना नहीं है।
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आचार्य प्रशांत: क्लाइमेट चेंज की बात तो मैं दस साल से कर रहा हूँ लगातार। ऐसा नहीं है कि अचानक अभी ये मुद्दा हमारे सामने आ गया है। आमतौर पर मीडिया इत्यादि में तुम जो पढ़ते हो — ग्लोबल वार्मिंग, वैश्विक तापन के बारे में, उसमें वैज्ञानिक तथ्य होते हैं, संख्याएँ होती हैं, ग्राफ होते हैं। कोई बताता है कि समुद्र का जल स्तर कितने मिलीमीटर या सेंटीमीटर बढ़ चुका है, बढ़ जाएगा। कोई बताता है कि तापमान कितना बढ़ चुका है और आगे बढ़ जाएगा। तो इस तरह की ख़बरें पढ़ते होंगे या फिर क्लाइमेट चेंज के इर्द-गिर्द जो राजनीति होती है उसकी ख़बरें पढ़ते होंगे।
2009 में कोपेनहेगन में ओबामा ने क्या किया? 2015 में फ्राँस में क्या हुआ? क्लाइमेट पर जो संधि हुई है, उसको कितने देशों की सरकारों ने अभी तक भी रेक्टिफिकेशन मान्यता नहीं दी, इस तरह की ख़बरें पढ़ लेते हो। लेकिन ये जो देख रहे हो अपने आसपास होते हुए, वो कोई हमसे बाहर की घटना नहीं है। बात भले ही ये की जा रही हो कि आर्कटिक की बर्फ़ पिघल रही है, समुद्रों का स्तर बढ़ रहा है, इत्यादि-इत्यादि। पर जो हो रहा है वो सबसे पहले आदमी के अन्दर की घटना है जो बाहर पृथ्वी पर, ज़मीन पर दिखाई दे रही है, परिलक्षित हो रही है, एक्सप्रेस हो रही है। समझ रहे हैं? ग्लोबल-वार्मिंग को आदमी के मन की स्थिति के आईने में देखना बहुत ज़रूरी है। मैं कहा करता हूँ — कि बाहर जो ये तापमान बढ़ रहा है, ये भीतर के बुखार से संबंधित है।




