अरे होगा कोई आमरण अनशन कर रहा होगा, हमें क्या लेना-देना?” तुम्हें ये लेना-देना कि तुम भूखे मरने वाले हो क्लाइमेट चेंज से। खेतों में फसलें उगनी बंद होने वाली हैं, और जिनकी वजह से खेतों में फसलें उगनी बंद होंगी, उन्हें फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। उनके पास बहुत पैसा है। अपनी आमदनी का वो खाने पर एक या दो प्रतिशत खर्च करते हैं बस, उनके पास इतना पैसा है। वो दो प्रतिशत पहले खाने पर खर्च करते थे, अब तीन प्रतिशत खर्च कर लेंगे, उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर, मेरा प्रश्न लद्दाख से है। सोनम वांगचुक जी क्लाइमेट चेंज के ऊपर एक क्लाइमेट फास्ट कर रहे हैं, और ये मुद्दा इतना महत्त्वपूर्ण है, जहाँ पर वो पृथ्वी के साथ जो भी कुछ हो रहा है, उसको लेकर जागरूकता बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। पर मैं देख रहा हूँ, कि उनके सारे एफ़र्ट्स के बाद भी उन्हें आम आदमी से इतना समर्थन नहीं मिल रहा है। तो ऐसा क्यों है?
आचार्य प्रशांत: आम आदमी को पहले पता तो होना चाहिए न कि क्लाइमेट क्राइसिस पूरी है क्या? तब समर्थन देगा न। वो जो कर रहे हैं सोनम वांगचुक जी, वो तो एक मुद्दे पर कर रहे हैं। उस मुद्दे से जब इस देश के आम आदमी का कोई रिश्ता ही नहीं है, तो लोगों की नज़र में ये एक छोटी-सी बात है।
वैसे भी लद्दाख दूर-दराज़ का इलाका है, आबादी भी वहाँ बहुत कम है, एक छोटे शहर जितनी पूरे लद्दाख के विस्तार की आबादी है। आम आदमी को अगर पता हो कि दुनिया में अगर अभी लगभग आठ-सौ करोड़ लोग हैं, और उसमें से तीन-सौ करोड़ लोग हैं वर्तमान में ही, जिनको ठीक खाना नहीं मिल पाता है। दो-सौ-चालीस करोड़ लोग ऐसे हैं जिनको खाना मिल भी पाएगा, कुछ निश्चित नहीं होता है, मिल गया तो ठीक है, नहीं मिला तो नहीं। और लगभग अस्सी-नब्बे करोड़ लोग ऐसे हैं जो अनिवार्यतः भूखे सोते हैं।




