प्रलय जैसी स्थिति जब बनेगी, तो बाक़ी प्राणी किसी तरह अपना गुजारा कर लेंगे। आपका क्या होगा? और अगर वो मरेंगे भी, विलुप्त भी होंगे, तो दर्द सहकर मरेंगे, दुख सहकर नहीं। आपका क्या होगा? ना तो हमारा शरीर इस लायक है कि कुछ सह सके, ना हमारा मन इस लायक है कि कुछ सह सके। हम पृथ्वी की सबसे कमजोर प्रजाति हैं।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, आप अक्सर कहते हैं कि अहम् हर एक चीज़ को भोगना चाहता है, अहम् बाहर छलांगे मांरता है, तो प्रकृति उसे रोक देती है। तो क्या आचार्य जी, प्रकृति के इस दंड से हम सुधरेंगे?
आचार्य प्रशांत: एक तरह से ये प्रकृति का दंड भी नहीं है। प्रकृति, सच पूछो तो, बड़ी निरपेक्ष होती है। वो इतनी बड़ी है, इतनी स्वायत्त है, इतनी स्वतंत्र है कि उसको अहम् जैसी छोटी चीज़ को, जो उसी का अपना एक नन्हा-सा मुन्ना है, उसको दंड देने की ज़रूरत भी नहीं है। होता बस ये है कि अहम् अपनी कामना के अनुसार प्रकृति से छेड़छाड़ करता है और प्रकृति को अपनी कामना के अनुसार एक रूप देना चाहता है। प्रकृति ने कोई ठेका नहीं ले रखा है कामना पूरी करने का। वो तो वही करती है जो उसके नियमों के अंतर्गत होना है। और उसके नियम अगर कहते हैं कि तुम उसे छेड़छाड़ करोगे तो ऐसी प्रतिक्रिया होगी, तो प्रतिक्रिया हो जाती है।
और प्रकृति इतनी बड़ी है कि प्रकृति की छोटी-सी प्रतिक्रिया भी नुन्नू अहंकार के झेले झेलनी नहीं है। आप अगर प्रकृति को लोगे, पूरा ब्रह्मांड प्रकृति के अधीन है। ज़ीरो केल्विन समझते हो? शून्य से 273 डिग्री नीचे, लगभग उतना तापमान भी प्रकृति में देखा जाता है आउटर स्पेस में। और 10,000 डिग्री, लाखों डिग्री, वो सब तापमान भी देखा जाता है सुपरनोवास में। तो प्रकृति में तो ये सब कुछ है।




