हमारा खौफ़नाक भविष्य - ऐसी होती है प्रलय

Acharya Prashant

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हमारा खौफ़नाक भविष्य - ऐसी होती है प्रलय
प्रलय जैसी स्थिति जब बनेगी, तो बाक़ी प्राणी किसी तरह अपना गुजारा कर लेंगे। आपका क्या होगा? और अगर वो मरेंगे भी, विलुप्त भी होंगे, तो दर्द सहकर मरेंगे, दुख सहकर नहीं। आपका क्या होगा? ना तो हमारा शरीर इस लायक है कि कुछ सह सके, ना हमारा मन इस लायक है कि कुछ सह सके। हम पृथ्वी की सबसे कमजोर प्रजाति हैं। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, आप अक्सर कहते हैं कि अहम् हर एक चीज़ को भोगना चाहता है, अहम् बाहर छलांगे मांरता है, तो प्रकृति उसे रोक देती है। तो क्या आचार्य जी, प्रकृति के इस दंड से हम सुधरेंगे?

आचार्य प्रशांत: एक तरह से ये प्रकृति का दंड भी नहीं है। प्रकृति, सच पूछो तो, बड़ी निरपेक्ष होती है। वो इतनी बड़ी है, इतनी स्वायत्त है, इतनी स्वतंत्र है कि उसको अहम् जैसी छोटी चीज़ को, जो उसी का अपना एक नन्हा-सा मुन्ना है, उसको दंड देने की ज़रूरत भी नहीं है। होता बस ये है कि अहम् अपनी कामना के अनुसार प्रकृति से छेड़छाड़ करता है और प्रकृति को अपनी कामना के अनुसार एक रूप देना चाहता है। प्रकृति ने कोई ठेका नहीं ले रखा है कामना पूरी करने का। वो तो वही करती है जो उसके नियमों के अंतर्गत होना है। और उसके नियम अगर कहते हैं कि तुम उसे छेड़छाड़ करोगे तो ऐसी प्रतिक्रिया होगी, तो प्रतिक्रिया हो जाती है।

और प्रकृति इतनी बड़ी है कि प्रकृति की छोटी-सी प्रतिक्रिया भी नुन्नू अहंकार के झेले झेलनी नहीं है। आप अगर प्रकृति को लोगे, पूरा ब्रह्मांड प्रकृति के अधीन है। ज़ीरो केल्विन समझते हो? शून्य से 273 डिग्री नीचे, लगभग उतना तापमान भी प्रकृति में देखा जाता है आउटर स्पेस में। और 10,000 डिग्री, लाखों डिग्री, वो सब तापमान भी देखा जाता है सुपरनोवास में। तो प्रकृति में तो ये सब कुछ है।

प्रकृति, लेकिन अगर जो पूरी रेंज है उसमें तापमान की, उसको मनुष्य के लिए 0.000001% भी बदल दे, तो हम सब या तो जम जाएँगे या भाप हो जाएँगे। प्रकृति -273 से करोड़ों डिग्री तापमान तक जाती है। ठीक है? सूरज की सतह पर कितना तापमान होगा, सोचो। और उसमें एक बहुत छोटी-सी रेंज है, जिसमें हम झुन्नू लोग अपना कूदफाँद मचाते हैं।

हम कौन-सी रेंज में जी सकते हैं? मान लो, शून्य से 20-30° नीचे से लेके शून्य से 60° ऊपर। कुल मिलाकर 100 डिग्री की भी रेंज नहीं है जिसमें हम बच सकते हों। और वो भी तब जब हमारे पास हीटिंग है और कपड़े हैं और तमाम तरीक़े के औज़ार हैं और व्यवस्थाएँ। अगर ये सब कपड़े-वपड़े न हों, तो हम अधिक से अधिक 5 डिग्री से लेकर 25 या 35 डिग्री तक में बच पाएँ। रेंज और छोटी हो जाएगी। तो प्रकृति को क्या करना है? जो वो पूरी रेंज है उसकी अपनी, उसको ज़रा-सा ऐसे आगे-पीछे कर देगी हमारे लिए, हमारे लिए तो हम कहीं के नहीं रहेंगे।

तो ये भी सोचना कि मनुष्य ने प्रकृति के साथ बुरा करा तो प्रकृति दंड दे रही है, ये भी अपने आप को बहुत बड़ा मानने वाली बात है। प्रकृति इतनी बड़ी है कि उसे हमें दंड देने की भी ज़रूरत नहीं है। हम उसके सामने ऐसे हैं कि जैसे हम बैठे हैं और कोई ऐसे मच्छर मार दिया। ये दंड थोड़ी दिया!

आप बैठे थे, बात कर रहे थे, यहाँ खुजली हुई, पता नहीं था क्यों खुजली हुई तो आपने ऐसे कर दिया, वो मच्छर मरा आपको पता भी नहीं। हुआ है कभी, कि आप उठो और पाओ कि ऐसे मच्छर मरा हुआ है वहाँ पर। क्योंकि जब आपका खून पी रहा था तभी आपने करवट ले ली और वो मर गया। हम प्रकृति के सामने ऐसे हैं। मच्छर बहुत बड़ा होता है इंसान के सामने। हम प्रकृति के सामने धूल के एक कण का शतांश भी नहीं हैं। वो करवट क्या लेगी! वो इतनी-सी गति कर दे, इंसान क्या चीज़ है उसके सामने! बात समझ में आ रही है?

फिर इंसान भूल क्या करता है? इंसान ये बात समझता नहीं है कि तुम्हारा काम प्रकृति को भोगना नहीं है। भोगा किसी छोटी चीज़ को जाता है। आप कुछ खाते हो जो चीज़ आप खाते हो, वो आपके मुँह के आकार से छोटी होती है, तभी खाते हो। प्रकृति बहुत बड़ी है, उसको भोगा नहीं जा सकता। मूर्खता है। लेकिन फिर भी हम उसे भोगना चाहते हैं। क्यों भोगना चाहते हैं? क्योंकि हम स्वयं को नहीं जानते। हमें पता ही नहीं है, दो बातें — पहला, तुम जो चाह रहे हो वो प्रकृति को भोग के मिलेगा नहीं। और दूसरी बात — जिसको तुम भोगने जा रहे हो, वो बड़ी माँ है तुम्हारी। तुम कोशिश भी कर लो तो तुम उसको भोग सकते नहीं।

अरे, तुम क्या कर लोगे? तुम अधिक से अधिक ये पृथ्वी ग्रह बर्बाद कर दोगे, इससे तुम्हारी ही प्रजाति मिट जाएगी। पूरे ब्रह्मांड को देख लो तो उसमें पृथ्वी ग्रह की हैसियत क्या है? समूचे ब्रह्मांड के सामने पृथ्वी ग्रह कितना है, बताऊँ? शुरू करो, गंगोत्री से ही शुरू कर दो और सीधे बंगाल की खाड़ी तक चले जाओ। ठीक है? और गंगा में जितनी बूँदें हों, उनमें से एक बूँद के बराबर है ब्रह्मांड में पृथ्वी की हस्ती। समझ में आ रही है बातें?

भारत का पूरा पश्चिमी तट ले लो, गुजरात से शुरू करो केरल तक चले जाओ। उसमें बीच-बीच में रेतीली बीचेज़ आती है। रेत वाले तट, बीच आती हैं। कितने उस में धूल के कण होंगे? कितने होंगे? या थार का रेगिस्तान ले लो, उसमें कितने रेत के कण होंगे? तो पृथ्वी की हैसियत ब्रह्मांड में पूरे थार के रेगिस्तान में जितनी बालू है, रेत, उसके एक कण से भी कम है। तुम प्रकृति को क्या नुकसान पहुँचा लोगे?

एक बार मैंने कहा था — लोगों ने कहा था, “द अर्थ इज़ हीटिंग अप, द अर्थ इज़ सिक।” लोग बोलते हैं ना “ग्लोबल वॉर्मिंग इज़ द फीवर ऑफ़ द प्लैनेट। मैंने कहा था, “द अर्थ इज़ नॉट सिक, द अर्थ इज़ जस्ट अजस्टिंग इटसेल्फ टू एलिमिनेट मैन।” अर्थ का कुछ नहीं जाता, तुम्हारा सब कुछ जाता है। इसमें तेरा घाटा, मम्मी का कुछ नहीं जाता। तू अभी 2 सेकंड पहले पैदा हुआ है, एवोल्यूशनरी टाइम स्केल में तू 2 सेकंड पहले — उस दिन मैं आई.टी. में भी यही बोल रहा था न।

एवोल्यूशन की दृष्टि से तू 2 सेकंड पहले पैदा हुआ है और मम्मी अरबों साल पुरानी है। और तेरे जैसे वो एक सेकंड में लाख पैदा करती हैं, उनका क्या जाएगा? तू मिट जाएगा। ये भी कहना, “लेट्स सेव द प्लैनेट, लेट्स सेव द प्लैनेट।” अहंकार की बात है। हम इतने बड़े हैं कि हम? वो तुम्हारे आने से पहले भी थी और वो तुम्हारे जाने के बाद भी है। बेटा, तू अपनी बचा।

और मनुष्य है, जो इन छोटी टेम्परेचर रेंजेज़ में सर्वाइव कर सकता है। प्रकृति बढ़े हुए तापमानों पर भी जो प्राणी मौज में बचे रह जाएँ, ऐसों को विकसित कर देगी। हाँ, ऐसों को विकसित करने में हो सकता है 10 लाख वर्ष लगें। प्रकृति के लिए 10 लाख वर्ष क्या है? समय तो उसकी जेब में है। प्रकृति को कोई प्रतीक्षा करनी पड़ती है? जैसे तुम प्रकृति के बच्चे हो झुन्नू, वैसे ही समय भी क्या है? प्रकृति का बच्चा। किसी चीज़ में 10 करोड़ साल लग रहे हैं तो प्रकृति को कोई आपत्ति नहीं है। उसके लिए 10 करोड़ वर्ष क्या है? जैसे पलक झपकी। समझ में आ रही है बात?

वो इतनी बड़ी है कि वो पलक भी झपके, तो हमारे लिए महाप्रलय है। ये क्या है? माँ ने बस साँस ली है और हमारे लिए चक्रवात आ गया। वो कुछ नहीं है, क्या है? ज़रा-सी माँ ने साँस ली है। जिसको आप सूरज बोलते हो, सूर्य देवता बोल के उपासना करते हो, आपको मालूम है वो एक — दुनिया है आधे तारे उस सूरज से बड़े हैं। हम चीज़ क्या हैं?

लेकिन जिसको नमन करना चाहिए, जिसके साथ हमारा रिश्ता बस हो सकता है कि उसको देखें, साक्षी होकर के हम निकल पड़ें हैं उसको भोगने के लिए! जैसे कोई देवी खड़ी हो पूर्ण अपने विकसित आकार में, अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित। और कोई मच्छर आकर बोल रहा हो, "मैं इनको भोगूँगा क्योंकि मैं बहुत कामुक आदमी हूँ, मैं देवी को भोगूँगा।" और देवी माने देवी, और मच्छर क्या बोल रहा है? "मुझे भोगना है!" कुछ नहीं करना उसको बस ऐसे देख लेना है, देखने भर से भस्म हो जाएगा।

भस्म माने क्या? माने जल नहीं जाएगा, दिल का दौरा पड़ जाएगा उसको! सैक्रीडनेस — ये शब्द हमारे व्याकरण से लुप्त हो गया है। सैक्रीड माने वो जो इतना बड़ा है कि उसको छूने का प्रयास भी नहीं करना चाहिए। उन्होंने भी सैक्रीड नहीं माना प्रकृति को जिन्होंने कंज़म्प्शन करा। और सैक्रीड तो वो भी नहीं मान रहे हैं जो एक्टिविज़्म कर रहे हैं। सैक्रीड माने, बहुत बड़ा मानना।

अगर आप कह रहे हो, "मैं तुझे आके बचा लूँगा" तो जिसको बचा रहे हो, उसको बड़ा मान रहे हो क्या? तो एक्टिविज़्म में भी सैक्रीडनेस कहाँ है? सैक्रीडनेस आती है तब, जब कुछ बहुत बड़ा लगता है। तो फिर प्रश्न उठता है, किसके लिए बड़ा? मेरे लिए बड़ा ना। सैक्रीडनेस सिर्फ़ तब आती है जब आत्मज्ञान होता है, अपना पता होता है — हम कितने छोटे हैं। हमारी पूरी शिक्षा में कहीं आत्मज्ञान नहीं है। हम नहीं जानते हम कौन हैं। तो हमें पता ही नहीं हम छोटे कितने हैं।

तापमान बदल जाता है, तुम्हारा सब कुछ बदल जाता है। मनुष्य क्या है? मनुष्य अपनी एक सोच है, धारणा है, मन है। प्रयोग हो चुके हैं, शोध हैं और उन शोधों की कोई ज़रूरत भी नहीं, ये बात आपके आम अनुभव की है। अभी इस कमरे में जितना तापमान है वो बदल जाए, आपका विचार बदल जाएगा। इंसान ही बदल जाएगा। और बस खाल की बात है — तापमान, नमी, दबाव, एट्मॉस्फेरिक प्रेशर, ये बदल जाएँ आप पूरे बदल जाओगे। इंसान ही दूसरा हो जाएगा। आप पूरी तरह से प्रकृति के उत्पाद हो।

अभी इस कमरे में उमस बढ़ जाए — नमी, आर्द्रता, आपके विचार बदल जाएँगे कि नहीं? प्रयोग हो चुके हैं, लोगों को अलग-अलग तरीक़े के माहौल में सुलाया गया उनको सपने ही अलग-अलग लगे। माहौल माने कहीं कोई सो रहा है वहाँ एक तरह की आवाज़ है, कहीं दूसरे तरह की आवाज़ है। कहीं कोई सो रहा है वहाँ बिल्कुल अंधेरा है, कोई सो रहा है वहाँ थोड़ी रोशनी बीच-बीच में। रोशनी भी अलग-अलग तरीक़े की है। तापमान अलग-अलग करके देखे गए, उनकी सबकी ब्रेन वेव्स ही अलग-अलग हो गई सोते-सोते।

प्रकृति को कुछ करना थोड़ी है हमें सज़ा देने के लिए। आप जो कर रहे हो, आप उसके अधीन हो। आप जिससे छेड़छाड़ कर रहे हो, आप उसके अधीन हो। जिसको आप छेड़ रहे हो वो बदल गया, तो आप नहीं बचोगे। नहीं समझे? तुम इस कमरे में बैठे हो, मान लो तुम्हारे पास यहाँ पर कोई व्यवस्था है जो यहाँ तापमान निश्चित करती है, जो यहाँ पर कितना प्रेशर होगा ये निश्चित करती है। ठीक है? यहाँ पर कितनी धूल होगी हवा में, ये निश्चित करती है। तुमने उसे छेड़छाड़ कर दी। तुमने उसे छेड़छाड़ कर दी, तो तुमने व्यवस्था ख़राब कर दी या ख़ुद को मार डाला?

श्रोता: ख़ुद को मार डाला।

आचार्य प्रशांत: तुम उसी की पैदाइश हो। जब एक ख़ास एट्मॉस्फेरिक प्रेशर हुआ, एक ख़ास टेम्परेचर हुआ, तो उससे इंसान खड़ा हुआ। तुम प्रकृति पर कहीं से भेजे नहीं गए हो। लोग इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करते हैं, "जब मैं इस दुनिया में आया," कोई मर जाता है तो बोलते हैं, "अब वो दुनिया छोड़ के चला गया"। कहाँ?

तुम इस दुनिया में कहीं से आए नहीं हो। तुम इसी मिट्टी से उठे हो, और तुम इस मिट्टी से उठे हो क्योंकि यहाँ पर कुछ विशेष परिस्थितियाँ थीं। तुम उन्हीं परिस्थितियों से छेड़छाड़ कर रहे हो। तुम दोबारा मिट्टी हो जाओगे।

तुम जिन परिस्थितियों की पैदाइश हो, तुम उन्हीं परिस्थितियों को ऑल्टर कर रहे हो, बदल रहे हो। कोई वजह है न कि पृथ्वी ग्रह पर जीवन है मंगल पर नहीं है। क्या वजह है? कंडीशन्स। कोई ऐसा थोड़ी है कि कोई परमात्मा बैठा है जिसने कहा "प्रकृति मेरी फेवरिट है, पृथ्वी मेरी पसंदीदा है, पृथ्वी पर ही जीवन होगा!" ऐसा है क्या? कि किसी दूसरे लोक से कोई दिव्य गुलेल से परमात्मा ने मनुष्य को खींच के फेंका, और कहा कि "इसमें जो मेरा सबसे प्रिय ग्रह है — वो पृथ्वी है — पृथ्वी पर ही जाकर लैंड करे ये!" ऐसा तो कुछ नहीं है।

यहाँ कुछ परिस्थितियाँ हैं, जिनसे इंसान निर्मित हुआ। तुम उन परिस्थितियों को बदल रहे हो। अच्छा, यहाँ धूल ही धूल होती तो इंसान होता? होता? जब इंसान यहाँ हुआ तो धूल कितनी थी? ए.क्यू.आई. कितना रहा होगा? कुछ भी नहीं। किसी बहुत शांत जगह पर चले जाओ तो वहाँ पर ए.क्यू.आई. 1 से भी नीचे होता है। जब ए.क्यू.आई. इतना कम था, तब जाकर के इंसान पृथ्वी पर निर्मित हुआ। अब अगर ए.क्यू.आई. तुमने 500 का कर लिया है, तो वो हवा इंसान को अब जीने देगी क्या? जाहिर-सी बात है, नहीं। क्योंकि तुम्हारा सिस्टम ही डिज़ाइन्ड है ए.क्यू.आई. < 1 के लिए। और उस सिस्टम को तुम ए.क्यू.आई. > 500 दे रहे हो, वो सिस्टम तो ख़त्म होना ही है।

आपको मालूम है, ये आँखें? क्योंकि इंसान सबसे पहले अफ्रीका में खड़ा हुआ था, आपकी आँखों को वृक्ष देखने ज़रूरी हैं। क्योंकि आप जंगल से अभी दो दिन पहले निकले हो। अगर इंसान 100 साल पुराना है, तो जंगल से वो बस अभी-अभी निकला है।

अगर आप मानो कि इंसान की पृथ्वी पर कुल अवधि 100 वर्ष की है, तो जंगल से वो बस अभी-अभी निकला है। उससे पहले वो जंगल में रहता था। जंगल में रहता, तो आँखें क्या देखती थीं? आपकी आँखों को हरितिमा देखनी ज़रूरी है और आपकी आँखें पढ़ने के लिए निर्मित भी नहीं हैं। बात समझ रहे हो? और आपकी आँखें 150 की स्पीड पर कुछ देखने के लिए बनी भी नहीं हैं।

आप जो गाड़ी चलाते हो, वो आँखों के साथ अन्याय है क्योंकि आँखें ऐसी हैं ही नहीं कि वो कुछ समझ पाएँ कि चल क्या रहा है। आँखें कभी नहीं चलीं। आपकी टाँगे कितना दौड़ सकती हैं? 20-30 अधिकतम गति। आँखें उतने में तो पता लगा लेती हैं कि क्या चल रहा है। उसके आगे फिर आँखें जवाब देना शुरू कर देती हैं। टीवी देखने के लिए आपकी आँखें बनी ही नहीं हैं। समझ में आ रही है बात?

इसमें से कुछ चीज़ें ऐसी हैं जिनकी हम कुछ व्यवस्था कर सकते हैं, जैसे चश्मा लगा लिया। क्योंकि आप देखोगे टीवी, मोबाइल, आप किताब पढ़ोगे, तो ठीक है चलो चश्मा लगा लो। लेकिन तापमान का क्या करोगे? बारिश का क्या करोगे? आप जलचर तो हो नहीं। पानी बढ़ेगा, क्या करोगे?

मनुष्य को तो प्राकृतिक रूप से तैरना भी नहीं आता। प्रकृति में जानवर होते हैं जो तैरते हैं, वो ख़ुद-ब-ख़ुद तैरते हैं। उनका छोटा-सा बच्चा डाल दो, तैर जाएगा। और जानवर होते हैं जो नहीं तैरते हैं, वो पानी के आसपास भी नहीं होते। ज़्यादातर जानवर जो होते हैं प्रकृति में, जंगल वाले वो सब तैर जाते हैं। आपको पता है भैंस तैरती है? आपको पता है हाथी तैरता है? ये सब मस्त तैरते हैं। सोचो, हाथी तैरता है। पानी बढ़ आएगा, आप तैर लोगे? और वो थोड़ा बहुत नहीं तैरते कि स्विमिंग पूल है। हाथी तैर कर अमेज़न पार कर जाता है। आप जो कर रहे हो, उससे समुद्रों का जल स्तर बढ़ेगा, ग्लेशियर पिघलेंगे, नदियों में भी बाढ़ आएगी पहले तो। आप क्या करोगे?

एक चीज़ और आख़िरी इसमें — दुनिया में जितने जीव हैं, उनमें से मनुष्य प्राकृतिक रूप से सबसे असुरक्षित है शारीरिक तल पर । हमारी खाल पर तो अब बाल भी नहीं होते। अगर मनुष्य द्वारा निर्मित व्यवस्था टूटती है चरमरा के, तो किसी भी अन्य प्रजाति से ज़्यादा मनुष्य को दुख होना है। बाक़ियों ने प्रकृति के ही भीतर अपने लिए व्यवस्था बना रखी है। इंसान अकेला है जो प्रकृति निर्मित नहीं, स्वरचित व्यवस्था पर अब आश्रित है।

आप नंगे पाँव चल सकते हो? दुनिया का एक-एक प्राणी नंगे पाँव चलता है। आप नंगे पाँव नहीं चल सकते। अब तो आप बिना ब्रश किए ना जी पाओ, सिर में दर्द हो जाएगा। दुनिया का कोई प्राणी दाँत नहीं माजता। आपके लिए प्रतिदिन नहाना ज़रूरी हो गया है, दुनिया में कोई प्राणी नहीं प्रतिदिन नहाता। आपको कहाँ से मिलेगा नहाने को पानी जब पीने को पानी नहीं है? नहाने को कहाँ से पाओगे?

प्रकृति से दूर होकर हम शारीरिक रूप से सबसे असुरक्षित जीव बन गए हैं और मानसिक रूप से भी। दुनिया की किसी प्रजाति में अवसाद (डिप्रेशन), मेंटल हेल्थ की उतनी बड़ी समस्या नहीं है जितनी मनुष्य में है। आपने देखा है, आपको थोड़ी धूप लग जाए, आपकी खाल जल जाती है। और भैंस तो दिन भर धूप में रहती हैं, वो तो नहीं जलती।

दुनिया के सब प्राणी अभी भी ऐसे हैं कि वो भूख बर्दाश्त कर लेते हैं। आपके लिए एक दिन का व्रत (उपवास) इतनी बड़ी बात हो जाती है कि आप उसको भगवान से जोड़ देते हो। एक दिन नहीं खाया तो अब मुझे भगवत प्राप्ति हो जाएगी! दुनिया के जितने जीव हैं, सबकी जिंदगी ऐसे ही चलती है — कि एक दिन खाया, दो दिन नहीं खाया, उनका चलता रहता है। आप कैसे जिओगे, बताओ? थोड़ी ऊँच-नीच हो जाए जिंदगी में, तो हमें डिप्रेशन हो जाता है। बंदर को कभी देखा है डिप्रेशन में?

प्रलय जैसी स्थिति जब बनेगी, तो बाक़ी प्राणी किसी तरह अपना गुजारा कर लेंगे। आपका क्या होगा? और अगर वो मरेंगे भी, विलुप्त भी होंगे, तो दर्द सहकर मरेंगे, दुख सहकर नहीं। मर जाएँगे, ख़त्म हो जाएँगे। पर उनको ये नहीं होने वाला — एंग्ज़ायटी, डिप्रेशन। आपका क्या होगा? ना तो हमारा शरीर इस लायक है कि कुछ सह सके, ना हमारा मन इस लायक है कि कुछ सह सके। हम पृथ्वी की सबसे कमजोर प्रजाति हैं, मोस्ट वल्नरेबल।

पृथ्वी की एक चौथाई आबादी ऐसी है, जो आंशिक रूप से, अपूर्ण रूप से मनुष्य द्वारा निर्मित दवाओं पर आश्रित है। एक चौथाई ऐसे हैं, जो या तो एकदम ही ऐसे हैं कि दवाई ना मिली तो उसी दिन मर जाएँगे या ऐसे हैं कि दवाई नहीं मिली, तो धीरे-धीरे मर जाएँगे। ये आपकी फैक्ट्रियाँ अगर बाधित होनी शुरू हुईं दवाइयों की, फार्मेसीज़, आप जी लोगे? दुनिया का कोई प्राणी दवाइयों पर इतना आश्रित नहीं है, जितना मनुष्य। आप क्या करोगे?

कोविड के दिनों में एक मामला आया था, एक आदमी पागल हो गया अपने बाल नोच-नोच के। क्योंकि उसने जिंदगी में कभी बाल नहीं बढ़ाए थे, दाढ़ी नहीं रखी थी। उसके बाल बहुत बढ़ गए उसने नोचने शुरू कर दिए। कितना नोचेगा? वो सचमुच पागल हो गया। छोटी-सी बात है पर सोच लो। प्रकृति से दूर जा-जा के हमने अपने आप को बहुत कमजोर कर लिया है। और अब तुर्रा ये है कि हम बिना अपनी कमजोरी को जाने, प्रकृति से और खिलवाड़ कर रहे हैं।

खाना तो हमको ऐसा लगता है जैसे बाजार में मिलता है। फसलें वैसे ही उगती रहेंगी। अगर तापमान ऊपर-नीचे हो गया तो? उत्तर भारत में आप फरवरी, मार्च, अप्रैल, मई में बारिश करोगे, तो खाने को क्या पाओगे? पर हमें लगता है नहीं ये तो फैक्ट्री-प्रोड्यूस्ड है, आटा। किसी बच्चे से पूछो, आटा कहाँ से आता है? बोलेगा, फैक्ट्री से आता है। उसको पूछो खेत क्या होता है? बोलेगा, जहाँ फार्म हाउस होता है। फसल उगलेगी? तापमान ऊपर-नीचे हो गया, तापमान ही नहीं होता! ये पहले ग्लोबल वॉर्मिंग बोलते थे, अब क्लाइमेट चेंज बोलते हैं। फिर क्लाइमेट क्राइसिस बोलते हैं।

सिर्फ़ वॉर्मिंग की बात नहीं है उसमें प्रीसिपिटेशन भी है, और उसमें तमाम तरह के एक्सट्रीम वेदर इवेंट्स हैं। सिर्फ़ वॉर्मिंग नहीं है। रेनफॉल का पैटर्न पूरी तरह से बदल रहा है। तुम क्या खाओगे, ये बता दो? हाँ, प्रकृति का कुछ नहीं बिगड़ता। वो दूसरी प्रजातियाँ पैदा कर देगी, जो दूसरी चीज़ें खाती हैं। तिलचट्टे हैं, उनको बोलते हैं कि वो पत्थर भी खा लेते हैं। कहते हैं न्यूक्लियर वॉर भी हो जाए, तो तिलचट्टे नहीं मरेंगे। पर —

इंसान अपनी औकात भूल गया है। ये आत्मज्ञान की कमी से होता है, आत्मज्ञान का मतलब ही है — अपनी औकात परखते रहना।

हम कह रहे हैं, बड़ी माँ का भोग तो हम करते ही रहेंगे, बस भोग करने के हम ज़्यादा चतुर-चालाक तरीक़े निकाल लेंगे, रिन्यूएबल एनर्जी, क्लीन ग्रीन एनर्जी, और ये सब कुछ। इन सबके पीछे धारणा क्या है? भोग कम नहीं करूँगा। हाँ, भोग करने के लिए मैं चालाकीपूर्ण तरीक़े निकाल लूँगा। भोग कम नहीं करूँगा, मैं अपनी एनर्जी रिक्वायरमेंट उतनी ही रखूँगा बस मैं अब एक चालाक तरीक़ा ले कर आ रहा हूँ, जिससे कार्बन एमिशन नहीं होगा। कैसे नहीं होगा? किसको मूर्ख बना रहे हो? जिसको आप ग्रीन एनर्जी बोलते हो, उसकी पूरी ओवर द लाइफ साइकल कॉस्ट लेकर के मुझे दिखा दो कि वो कैसे क्लीन है।

यूएई में और उधर आसपास के जो सब अरब देश हैं, उनमें — आप अभी पढ़िएगा, पिछली गर्मियों की ख़बर है कुछ गाँव, कुछ शहर ऐसे थे जिनको हमेशा के लिए अबैंडन कर दिया गया है। कुछ ऐसे थे जिनमें थ्री डे वर्क वीक करना पड़ा। अब उनमें तापमान इतना हो गया कि उनमें अब रहा नहीं जा सकता, उनको छोड़ दिया गया। वो पूरे श्मशान हो गए। ये दुनिया के बहुत सारे शहरों का भविष्य है। पूरा ही छोड़ देना पड़ेगा।

कोई बहुत गर्म हो जाएगा, कोई बहुत ठंडा हो जाएगा, कोई बर्फ़ के नीचे दब जाएगा, कोई पानी के नीचे आ जाएगा। कहीं हर समय तूफान चल रहे होंगे, कहीं इतना सूखा पड़ रहा होगा कि वहाँ पीने का पानी नहीं मिलेगा, तो वहाँ रहेगा कौन? ये दुनिया के अधिकांश शहरों का भविष्य है।

अमीरों को फ़र्क़ नहीं पड़ता। वो कहते हैं, कोई भी चीज़ कितनी भी कम हो जाए, इतना ही तो होगा ना कि उसके दाम बढ़ जाएँगे। पानी बहुत कम हो जाएगा हम ₹10,000 में एक बोतल खरीद के पी लेंगे। हम अमीर हैं। आप कह रहे हो जो एयरपोर्ट था, वो सी पोर्ट बन गया। अमीरों को फ़र्क़ नहीं पड़ता। उनकी बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएँ हैं, उनकी छत पर हेलीपैड है। वो कह रहे हैं, हमें चलना ही कौन सा पब्लिक कन्वयंस से है?

आप जिसको हवाई जहाज बोलते हो, उनके लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट है। बोलते हैं, हम इस पे कहाँ चलने वाले हैं? हमारे घर की छत पे हेलीपैड है। हम सीधे वहाँ से जाएँगे। वहाँ थोड़ी पानी भरा है। और सही बात है, वहाँ थोड़ी पानी भरा है। और जो उनसे भी ज़्यादा अमीर हैं वो कहते हैं, अर! तुम छोड़ो हेलीकॉप्टर, मेरे पास रॉकेट है। मैं सीधे मार्स में आके रहूँगा। एक मीम चलती थी ना "अरे जल्दी-जल्दी करो, अभी मार्स भी तो तबाह करना है!"

"8-10 बच्चे पैदा करो, दुनिया भर का कंजम्प्शन करो, अभी मार्स भी तो तबाह करना है।"

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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