
प्रश्नकर्ता: सर, जैसे कि अभी दशहरा आ रहा है और हर साल दशहरा मनाते भी हैं, लेकिन दशहरे का वास्तविक अर्थ क्या है?
आचार्य प्रशांत: जिसके दस सिर वही रावण। रावण वो नहीं जिसके दस सिर थे, जिसके ही दस सिर हैं वही रावण है। और हममें से कोई ऐसा…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम गुरुजी, मेरा प्रश्न हैप्पीनेस (खुशी) के बारे में है कि व्हाट एग्ज़ेक्टली हैप्पीनेस इज़? (खुशी वास्तव में क्या है?) और हमें खुशी चहिए क्यों होती है। जैसे कि बचपन से ही जब हम किसी के पैर छूते हैं अपने से बड़ों का, तो सभी लोग बोलते हैं, "खुश

प्रश्नकर्ता: आम लोगों में अध्यात्म की जो बातें चलती हैं वहाँ ‘अल्प' की भाषा उपयोग की जाती है, और आजकल जैसे कि नए आध्यात्मिक केंद्रों में मिनिमलिज़्म (न्यूनतमवाद), अल्प की भाषा का प्रयोग हो रहा है। तो आचार्य जी, अध्यात्म में इस 'अल्प' का अर्थ क्या है?


प्रश्नकर्ता: आपसे प्रेरणा मिली है कि अध्यात्म, गीता, उपनिषद् का जीवन में बहुत महत्व है और जितनी जल्दी हो सके ज़िन्दगी में उतनी जल्दी इन ग्रंथों से परिचय हो जाना चाहिए। अब मेरा चौदह साल का बेटा है, उसे बहकते देख रहा हूँ। उपनिषद् इत्यादि उसे बताता हूँ तो उसे



आत्मज्ञान के बिना समाज, पर्यावरण या किसी भी बाहरी समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं, क्योंकि हर संकट की जड़ मनुष्य की चेतना में है। बाहरी सुधार, नीतियाँ या अभियानों की अपनी भूमिका है, लेकिन वे मूल कारण को नहीं बदलते। इसलिए सबसे आवश्यक कार्य है स्वयं को बदलना और सत्य के प्रति गंभीर होना। जो व्यक्ति सत्य के प्रति उदासीन है, उससे स्वीकृति या मान्यता की अपेक्षा करना भी व्यर्थ है।


प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। 'निर्वाण षटकम्' की एक पंक्ति है —
'न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम्।'
तो इसमें जो मोक्ष के विषय में कहा गया है कि मैं मोक्ष भी नहीं हूँ, तो क्या शिव को मोक्ष भी नहीं चाहिए?
आचार्य प्रशांत: हाँ,…
आचार्य प्रशांत: 'अल्प'…
1. अहं ब्रह्मास्मि — "मैं ब्रह्म हूँ" (बृहदारण्यक उपनिषद्, प्रथम अध्याय, चतुर्थ ब्राह्मण, श्लोक क्रमांक १०)
2. तत्त्वमसि — "वह ब्रह्म तू है" (छान्दोग्य उपनिषद्, अध्याय ६, अष्टम खण्ड, श्लोक क्रमांक ७)
3. अयम् आत्मा ब्रह्म — "यह आत्मा ब्रह्म है" (माण्डूक्य उपनिषद्, अध्याय १, श्लोक २)
4. प्रज्ञानं ब्रह्म…
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिद सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच॥
‘वह जो यह अणिमा है, एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है। और हे श्वेतकेतो! वही तू है। ऐसा कहे जाने पर श्वेतकेतु बोला – ‘भगवन्! आप मुझे फिर…
लोग अपनी राय की रक्षा इसलिए नहीं करते कि वह सत्य है, बल्कि इसलिए क्योंकि भीतर से उन्हें उसकी कमजोरी का पता होता है। झूठ सबसे जल्दी आहत होता है और सच से डरता है। इसलिए सत्य बोलने पर यदि कोई टूटता है, तो उसके झूठ के लिए स्वयं को दोषी नहीं मानना चाहिए। जहाँ वास्तव में गलती हो, वहाँ विनम्र बनें; लेकिन सत्य के पक्ष में खड़े होने के लिए अपराधबोध या दूसरों की नाराज़गी का बोझ उठाना आवश्यक नहीं है।
समुद्र के लिए ही यहाँ आया समुद्र से ही मेरा आखिरी नाता
पर आज सुबह से व्यस्त रहा रेतीले मसले ये गिनती वो घाटा
साँझ अब जब तट पर आया समुद्र लहराता बोला मुस्कुराता
रेत के कणों में मन फँस जाता रेत गिनते सूरज ढ़ल जाता
रेत का कण विशाल…

क्या आपके विचार भी आपको सच जैसे लगते हैं? यही भ्रम है। विचार कभी सत्य नहीं होते, वे सिर्फ़ मन की गतिविधि हैं। जब तक “मैं हूँ” का भाव है, तब तक वस्तु, व्यक्ति और विचार रहेंगे ही। उनसे भागना नहीं, उन पर विवेक लगाना है। जो अहंकार को पोषित करे उसे छोड़ो, जो उससे टकराए वही सही दिशा है। यही चुनाव जीवन को बंधन या मुक्ति की ओर ले जाता है।

अहंकार मनुष्य की मूल समस्या है। हम ज्ञान समझते हैं पर उस पर चल नहीं पाते क्योंकि अहंकार को अपनी पहचान के लिए दूसरों की आवश्यकता है। परिवार, समाज, विचारधारा से हम सौदा करते हैं - अपनी स्वतंत्रता बेचते हैं। सच्चा प्रेम स्वयं को और दूसरों को मुक्त करना है, न कि बंधन में रखना। ईमानदारी से अपने झूठ को देखना ही सत्य है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे मैं पहले ओशो जी और जिद्दू कृष्णमूर्ति जी के रंग में रंगा हुआ था और अब आपके रंग में रंगा हुआ हूँ। मुझे ये समझ नहीं आता कि यह मेरी जिज्ञासा मात्र है, प्रेम है या पागलपन?
आचार्य प्रशांत: जैसे आपने कहा था कि मन में…

मुक्ति का मतलब ये नहीं है कि किसी को छूना नहीं है; नदी से कहना है, दूर हट, मैं पुरुष हूँ, तू प्रकृति है। आ गई भ्रष्ट करने बार-बार चली आती है। तू भी आ जाती है। न जाने कितनी सारी तो तुम हो; कोई इधर से घुस रही, कोई उधर से घुस रही। छोटी, बड़ी, लंबी, चौड़ी, हरी, काली, नीली, पीली, हर रंग की होती हैं, आ जाती हैं। किसी को मना नहीं कर रहा, वो सबको आलिंगन में ले रहा है और कह रहा है, तुम सब भी आ जाओ, तो भी मैं तो रहूँगा सागर ही।

दुनिया ऐसी हो जाए और ज़िंदगी ऐसी हो जाए कि किसी विरोध की ज़रूरत ही न पड़े। पर आज ऐसा नहीं है, आज बहुत कुछ ऐसा है जिसे विरोध की ज़रूरत है। तो मैं वो विरोध कर रहा हूँ ताकि जो कुछ हटाया जाना है, मैं उसको हटा दूँ और मेरे बाद, मेरे अलावा कम ज़रूरत पड़े किसी को उतना जूझने की। लेकिन मान लो, मैं काम नहीं कर पाता पूरा, जिसकी बहुत संभावना है, तो जूझने से डरना मत। याद रखना कि संघर्ष इसीलिए है ताकि एक दिन संघर्ष न करना पड़े।

कभी भी आपके साथ ऐसा हो रहा हो कि कोई चीज़ बाद में समझ में आ रही हो, तो ये याद रख लीजिए, जो चीज़ आपको बाद में समझ में आ रही है, वो आपको हमेशा से ही समझ में आ रही थी। बाद में कुछ नया नहीं समझ में आया। बाद में आपने बस उसको एकनॉलेज करा है। बाद में आपने उसको बस अभिस्वीकृति दी है। पता पहले से था, पर हम उसको एक्सेप्ट नहीं कर रहे थे। हम में यह क्षमता होती है, नोइंग बट नॉट एक्सेप्टिंग। पता पहले से था पर उसको एक्सेप्ट नहीं कर रहे थे, क्योंकि उम्मीद थी कि क्या पता मज़े आ ही जाएँ आगे। अब जब मज़े नहीं आए, उम्मीद टूट गई, तो हम एकनॉलेज कर लेते हैं कि हाँ, गड़बड़ हो गई। गड़बड़ हो रही है, ये शुरू से ही पता था।

मेरे साथ चलने का ये मतलब है कि आप कहीं नहीं पहुँचने वाले, आप बस मिटने वाले हो। कौन चलेगा मेरे साथ, न आप चल सकते हो, न मैं आपसे उम्मीद रखता हूँ कि आप अंत तक मेरे साथ चल सकते हो, क्योंकि वो अंत यात्रा का अंत नहीं होगा, वो अंत आपका अंत होगा। कौन ऐसा पागल है जो अपना अंत कराने के लिए मेरे साथ चले? कभी-न-कभी तो आप टपकोगे ही। और जो जितने ज़्यादा अवधि तक मेरे साथ रहकर टपकता है, वो उतना ज़्यादा ज़हरीला होकर फिर डसता है।

आप तो किसी को समर्पित नहीं हो, न सच को, न झूठ को। आप दोनों को आधे-आधे हो, झूठा आदमी आपसे हमेशा जीतेगा।

हम अपने आराध्यों की कथा, चरित्र, मूर्ति, छवि अपने ही हिसाब से बना देते हैं। हम अपनी सहूलियत, मान्यता और स्वार्थ के अनुसार कालातीत को भी बदल डालते हैं। यह समस्या राम के निर्गुण–निराकार रूप के साथ बिल्कुल नहीं है क्योंकि जो निर्गुण और निराकार है, उसकी कोई मूर्ति ही नहीं, कोई छवि ही नहीं; तुम उसको कैसे ख़राब कर लोगे? इसलिए ज्ञानियों ने कहा कि उनको तो ब्रह्मस्वरूप ही मानना — “राम ब्रह्म परमारथ रूपा, अबिगत अलख अनादि अनूपा।” मात्र वही राम हैं जो कालातीत हैं।

सब देवताओं ने अपनी-अपनी शक्ति एकीकृत कर दी, तो देवी प्रकट हो गईं। आपके पास जो भी सद्गुण हैं — बुद्धि, धैर्य, बल, जो कुछ भी है — उसको बस सत्य की जीत के लिए अभियान करना है, तब देवी प्रकट होती हैं। सत्य की सेवा में नियुक्त रहो। जब आप अपनी सारी शक्तियों को बस एक लक्ष्य के लिए तैनात कर देते हैं, तो देवी का जन्म हो जाता है।

गीता आपको यह बताने के लिए है कि आपकी सब चिन्ताओं के साथ-साथ जो आपकी चिन्ताओं को नष्ट कर सकता है, वो भी आपको उपलब्ध है। आपको चुनाव करना है और मूल्य चुकाने को तैयार रहना है। अर्जुन के एक ओर माँ प्रकृति हैं जो कह रही हैं, ‘मेरे बहाव में बहो,’ और दूसरी ओर श्रीकृष्ण हैं जो कह रहे हैं, ‘मेरी ओर बढ़ो और रास्ते में जो भी आता है, उसे सहो।’ सही काम में जो पीड़ा मिले अगर उसे प्रेम का उपहार मान कर सीने से नहीं लगा सकते, तो उसे दवाई का कड़वा घूँट ही मानकर बस सह लो। सच्चाई के मार्ग पर जो तमाम अनुभवों में अडिग रहता है, वो आनन्द का अधिकारी है।

प्रश्नकर्ता: सर, नमस्कार। सर, बारह तारीख को स्वामी विवेकानन्द जी की अभी जयंती आने वाली है। तो बचपन से काफ़ी उनको पढ़ा है, उनकी जीवनी के बारे में। हमेशा काफ़ी अट्रैक्टिव(आकर्षक) रहा है उनको पढ़ना, उनको जानना। हालाँकि जितना मैंने उनकी जीवनी पढ़ी तो उनके बारे में पता लगा…

पारमार्थिक तल पर — “सत्यमेव जयते” — सत्य ही जीता हुआ है। लेकिन हम जिस दुनिया में हैं, वहाँ सत्य को जिताने के लिए कमर तोड़ मेहनत करनी पड़ती है; असत्य को हराने के लिए बहुत जान लगानी पड़ती है। “सत्यमेव जयते” हमें यह बताने के लिए है कि सच जीत नहीं रहा है, उसे जिताओ। सत्य हमारे लिए एक छोटे बच्चे और नन्हे पौधे जैसा है। उसको हम जिताएँगे या हरवाएँगे, वह हमारे ऊपर है।

उपनिषदों के दर्शन ने आदिकाल से ही भारत और पूरे विश्व में श्रेष्ठतम चिंतकों को प्रेरित किया है। पॉल ड्यूसेन ने कहा, “वेदांत मानव चेतना की सबसे उत्कृष्ट कृतियों में है।” भारत की सुधारवादी धाराओं के मूल में भी उपनिषदों का ही चिंतन है। राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, रमण महर्षि, जिद्दू कृष्णमूर्ति, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गाँधी इत्यादि उपनिषदों से गहराई से प्रभावित थे। पश्चिम पहुँचने के दो सौ वर्षों के भीतर ही उपनिषदों ने पाश्चात्य दार्शनिकों, विचारकों, लेखकों व कलाकारों पर परिवर्तनकारी प्रभाव डाला।

दुनिया भर की कामना हमने पहले से पकड़ रखी है। तो जो तरीक़ा होता है आत्मज्ञान का, वो नकार का होता है। जो कुछ पकड़-पकड़ रखा है, उसका अवलोकन करा जाता है। ये कहाँ से आ गया मेरे पास? कैसे मैंने इसको पकड़ लिया? और पकड़ने पश्चात इससे पाया क्या? ये होता है। सत्य की कामना मत करने लग जाइएगा। झूठ से पिंड छुड़ाना होता है, सत्य की कोई कामना नहीं होती।

कहीं ऐसा तो नहीं कि आपका श्रम बस मोह और ममता की वजह से है। कहीं ऐसा तो नहीं कि जैसा हमने कहा आप पत्थर को ही घिसे जा रही हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि उतना ही श्रम अगर आप ज़्यादा काबिल और तैयार लोगों पर करें, तो ज़्यादा अच्छा परिणाम आएगा। तो निसंदेह हमारे घर वाले हमारे साथ रहते हैं। समझाने की शुरुआत आप अपनों से, परिवार जनों से ही करोगे। उन्हें ही समझाने की कोशिश करोगे। और मैं कह रहा हूँ, पूरी कोशिश, भरपूर प्रयास करिए उन्हें समझाने का। पर अगर दिखाई दे कि नहीं ही समझ रहे हैं, तो अटक मत जाइए, आगे निकलिए।

कोई आदत अच्छी नहीं होती; ‘अच्छी आदत’ जैसा कुछ नहीं होता है। एक आदमी सुबह उठते ही वॉक पर निकल जाता है — न सोचा, न समझा। उसकी मूल आदत वॉकिंग नहीं है, मूल आदत है न सोचना, न समझना। जो कुछ अंधेपन या बेहोशी में किया जाए, वही आदत है। आप जो कुछ कर रहे हो, देखो कि वो आदतवश ही हो रहा है। एक बार यह देख लोगे, तो कर्ता बदल जाता है।

मन में नामों का पूरा एक भंडार है। पूरी एक भीड़ है मन में नामों की। तुम सर्वप्रथम तो अपने लिए एक ऐसा नाम तैयार करो जो उस भीड़ को भगाना जानता हो, जो उस भीड़ का हिस्सा नहीं हो। वो जो पूरी भीड़ है उससे तुम्हारा संबंध अहंकार का है। वो जो पूरी भीड़ है उससे हमने पोषण पाया है, अहंकार उसी के सहारे खड़ा रहता है। कोई ऐसा नाम लेकर के आओ जो उस भीड़ से किसी तरह का रिश्ता न रखता हो। और सिर्फ़ तभी उस नाम को जपने से लाभ है, नहीं तो आप जप-जप के बस अपने अहंकार को ही और दृढ़ कर रहे हो।

तुम जिसको दूसरा बोल रहे हो, तुमने उसकी खोट अगर सही वक़्त पर निकाल ली होती तो तुम वैसे आज नहीं होते जैसे तुम हो। नहीं समझ में आई बात? तुमने उसकी कभी कोई खोट निकाली नहीं, तभी तो तुमने उसको मौका दिया अपने आप को प्रभावित करने का। तुमने सही वक़्त पर उसकी खोट देख ली होती तो तुम आज इतने डरपोक नहीं होते। और अब तुम इतने डरपोक हो गए हो कि कह रहे हो, "मैं उसकी खोट देखना नहीं चाहता।

कहानी कहती है कि नारद जी बड़े चक्कर में पड़े — सोलह हज़ार रानियाँ, और जिसके भी पास जाएँ, उसके साथ श्रीकृष्ण को ही पाएँ। सोलह हज़ार रानियाँ अनंतता का प्रतीक हैं। रानियों की श्रद्धा है, और श्रीकृष्ण ही ऐसे हैं, जिनमें सैकड़ों, हज़ारों, लाखों लोग पूर्ण श्रद्धा रख सकें। स्वयं श्रीकृष्ण भी चाहें तो रानियों से अपने-आप को छीन नहीं सकते। यदि तुम सत्य के प्रेमी हो, तो सत्य तुम्हें पूरा का पूरा उपलब्ध हो जाएगा।

प्रेम विद्रोह होता है। क्योंकि प्राकृतिक स्थिति आपकी — बंधन, माने अप्रेम की होती है। प्रेम जो आपकी प्राकृतिक जन्मजात स्थिति है, उसके खिलाफ़ बड़ा विद्रोह होता है। उसी आग का प्रकाश ज्ञान बनता है। नहीं होगी वो आग, तो कहाँ से लाओगे दम ये कहने का कि, "अगर इसी को ज़िंदगी कहते हैं, तो नहीं जीना! इसी को चाहना जीवन है? नहीं चाहना! यही सब मानना ज़रूरी है? नहीं मानना!" कहाँ से लाओगे साहस?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सत्य के प्रति प्रेम में कैसे पड़ गये?
आचार्य प्रशांत: उसका दुपट्टा हरा था। (श्रोतागण हॅंसते हैं) और चूड़ियाॅं खनक रही थीं और कजरारे नैनों की तीखी धार थी। बिलकुल छुरी चल गयी। ऐसे बताऊँ या ऐसे बताऊँ कि कार्बन टेट्रा-फ्लोराइड और अमोनिया मिले और दस एटमॉस्फेरिक…

‘अप्प दीपो भव’ — ‘अपने प्रकाश स्वयं बनो’ — यह एक बहुमूल्य वक्तव्य है, लेकिन आख़िरी है। उससे पहले बड़ी साधना करनी पड़ती है। ‘कोई गुरु आवश्यक नहीं है’, यह जानने के लिए भी कोई गुरु चाहिए। जब पूरी साधना, पूरी दीक्षा हो जाए और शिष्य की विदाई का समय आए तभी गुरु को कहना चाहिए — ‘अप्प दीपो भव’। और तभी शिष्य के कान में ये शब्द पड़ने चाहिए। भूलना नहीं, ये ‘आख़िरी’ शब्द हैं।

बल सत्य से आता है। जब आपको सत्य पता ही नहीं तो आप में बल कहाँ से आएगा? आपको किसी ने बोल दिया 'धर्म हिंसा तथैव च।' आपने कहा, 'हो सकता है लिखा होगा।' आपको किसी ने बोल दिया गाँधी जी बहुत अच्छे आदमी थे, राष्ट्रपिता थे। आपने मान लिया। आज आपको बोला जा रहा गाँधी जी और नेहरू से ज़्यादा बुरा कोई नहीं था, इन्होंने देश बर्बाद करा। आपने वो भी मान लिया। तो थाली के बैंगन हैं, जो जिधर को लुढ़काना चाहे लुढ़का सकता है।

डॉ. अंबेडकर के काम का कैनवस बड़ा विस्तृत है। वो दिल से कोई राजनीतिक नहीं थे — खरे इंसान थे, दो टूक बात करने वाले। उनकी शुरुआत अर्थशास्त्र से हुई, फिर एडमिनिस्ट्रेशन, एकेडमिक्स, लीगल प्रैक्टिस, इन्वेस्टमेंट कंसल्टिंग — राजनीति में आने से पहले उन्होंने सारे द्वार खटखटाए हैं। अंबेडकर की प्राथमिक लड़ाई धार्मिक रूढ़िवादिता के खिलाफ थी। फिर दलितों, महिलाओं, गरीबों, युवाओं के लिए काम करना — उसी लड़ाई के अलग-अलग मोर्चे हैं।

साक्षी भाव इत्यादि का अनुभव करने की होड़ बिलकुल त्याग दो, साक्षी भाव का कोई अनुभव नहीं होता है। साक्षित्व सर्वप्रथम कोई भाव होता ही नहीं है, ये जुमला ही भ्रामक है — साक्षी भाव। और उससे ज़्यादा घातक है ये आकर्षण, ये लोभ कि मैं साक्षित्व का अनुभव कर लूँगा। साक्षित्व का कोई अनुभव नहीं होता। बेवकूफ़ियों के अनुभव में हम जीते हैं और अपनी बेवकूफ़ियों को हम ही ताकत देते हैं। वो ताकत देना बंद करो, साक्षित्व तो है ही।

जब-जब तुम सच्चाई की ओर नहीं बढ़ते, तब-तब जीवन दुख, दरिद्रता, कष्ट, रोग और बेचैनियों से भर जाता है। अधर्म अपने चरम पर चढ़ जाता है, और विवश होकर तुम्हें आँखें खोलनी पड़ती हैं। तब मानना पड़ता है कि तुम्हारी राह ग़लत थी, और ग़लत राह को छोड़कर तुम्हें सत्य की ओर मुड़ना पड़ता है। अतः जब तुम अंधेरे को पीठ दिखाते हो, तो श्रीकृष्ण को अपने समक्ष पाते हो। यही श्रीकृष्ण का अवतरण है।

हम कभी जीवन के तथ्य को स्वीकार नहीं करते कि हमें सत्य से डर लगता है और हम अपनी क्षुद्रताओं और झूठ पर जीना चाहते हैं। फिर हम बड़ी तिरछी चाल चलते हैं। झूठ को सत्य का नाम दे देते हैं और कहते हैं कि सत्य के समर्थन में हैं। सत्य के खिलाफ़ तो सारा संसार खड़ा है, लेकिन इतनी भी आबरू और हिम्मत नहीं होती कि हम खुलकर कह दें कि हम सत्य के खिलाफ़ हैं। हमने झूठ को ही सत्य का नाम दे रखा है और झूठ का समर्थन कर रहे हैं।

जनमानस में तो शिव और शंकर एक ही हैं, जिनके सहस्रों नाम हैं। सब नाम सुंदर हैं। पर अध्यात्म की सूक्ष्मताओं में जाकर अगर हम इन नामों का अभिप्राय समझें तो उनका सौंदर्य और बढ़ जाएगा। ‘शिव’ अर्थात आत्मा, सत्य मात्र। आप कहते हैं ‘शिवोहम्’, ठीक जैसे उपनिषद कहते हैं,…

*भूले मन..!समझ के लाग लदनियां..!थोड़ा लाद..अधिक मत लादे..टूट जाये तेरी गर्दनिया..!..*
*भूले मन…भूखा हो तो भोजन पा ले..आगे हात न बनिया…!*
*भूले मन….प्यासा हो तो पानी पि ले..आगे घात न पनियां…*
*भूले मन….कहे कबीर सुनो भाई साधो..काल के हाथ कमनियां…*…

मेडिटेशन "करा" नहीं, "जीया" जाता है। "करने" वाला मेडिटेशन तो झुनझुना है, कि गए और तीस मिनट मेडिटेशन करके आ गए। जो तुम्हारी ज़िंदगी चल रही है, उसी में देखो कि तुम्हारे संदर्भ तथा संबंध में ऊँचे-से-ऊँचा लक्ष्य क्या हो सकता है। अपने बंधन पहचानो और देखो कि उनके कारण कितना दुख है। उसे मिटाना ही लक्ष्य बनेगा तुम्हारा। और फिर उसकी प्राप्ति के लिए पूरे जीवन को झोंक दो, यही ध्यान है।

जिसे तुम काबू में रखना चाहते हो, वो तुम्हारी छाया है। तुम जैसे हो, वो वैसी है। तुम उसे काबू में कैसे कर लोगे? मन निर्धारित ही इस बात से होता है कि तुमने अपने-आप को क्या समझ रखा है, क्या बना रखा है। तुम बदल जाओ, मन बदल जाएगा। इसलिए तुमने जो भी अपने-आप को बना रखा है, उसको समझो। ग़ौर से देखो कि क्या बना रखा है! फिर नहीं कहना पड़ेगा कि मन को काबू में कैसे करें।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ध्यान में रहना और वैसे ही अपनी ज़िंदगी बिताना अगर सही तरीका है, तो हम लोग अपने तरीके से, जितना भी हमलोगों को पता है उस हिसाब से या आपको जैसे सुनते हैं, तो कोशिश करते हैं। पर लगता है कि कुछ हो नहीं रहा या हमसे…

प्रश्नकर्ता: मैं एक सर्जन (शल्य चिकित्सक) हूँ। क्या ध्यान में होने से सर्जरी सफल हो सकती है?
आचार्य प्रशांत: ध्यान में होने पर ही सर्जरी सफल हो सकती है। नहीं तो ध्यान का फ़ायदा क्या? ध्यान का अर्थ ही होता है कि मन के पास भटकने के लिए कोई ठिकाना,…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं काफ़ी समय से मेडिटेशन (ध्यान) कर रही हूँ। पिछले कुछ दिनों से कभी-कभी ऐसा होता है कि कुछ समय के लिए टाइमलेसनेस (कालहीनता) का अनुभव होता है। मैं ऐसा क्या करूँ कि ये अनुभव पूरे दिन रहे?
आचार्य प्रशांत: अगर आपको पता न होता कि मेडिटेशन…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप अपनी किताब में कहते हैं कि ध्यान की विधियों से कुछ नहीं होगा, लेकिन क्या कुछ देर बैठ कर अपने विचारों को देखना सही नहीं है? क्या इससे कुछ पलों का चैन नहीं मिलेगा?
आचार्य प्रशांत: सटीक उदाहरण नहीं दे रहा हूँ पर इशारा समझना। चुपचाप…

आचार्य नागार्जुन की जीवन कथा का आंरभिक विवरण चीनी भाषा में उपलब्ध है, जिसे क़रीब 405 ई. में प्रसिद्ध बौद्ध अनुवादक कुमारजीव ने उपलब्ध कराया। यह अन्य चीनी एवं तिब्बती वृत्तांत से सहमत हैं कि नागार्जुन दक्षिण भारत में एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। ऐतिहासिक रूप से बचपन की…

अशान्ति के साथ तुम सौ जन्म बिता लो, अशान्ति के साथ तुम चाहे कितनी कसमें खा लो, तुम्हारे मन के एक बहुत गहरे और पुराने कोने को शान्ति तब भी प्यारी रहेगी। सौ जन्म रहो तुम अशान्ति के साथ, सौ जन्मों बाद भी तुम यही पाओगे कि अशान्ति से पूरी तुम्हारी वफ़ादारी, निष्ठा हो नहीं पायी है, तुम अभी भी शान्ति की ओर आकृष्ट हो रहे हो, थोड़ा-थोड़ा हो रहे हो, लेकिन हो रहे हो। क्यों? क्योंकि शान्ति स्वभाव है तुम्हारा। अशान्ति नहीं स्वभाव है।

संसार में तुम जिस भी चीज़ को शांति का,तृप्ति का साधन बनाओगे वो चीज़ बेचारी असफल हो जाएगी। तुम उसे भोगकर के कुछ और कर देते हो। तो फिर कौन है जो तुम्हें सन्तुष्टि दे सकता है? सिर्फ़ वो जो तुम्हारे स्पर्श से कहीं आगे का हो। तुम्हारा स्पर्श उस पर कोई दाग ही न लगा पाये, जो अस्पर्श्य हो। ऐसे किसी को ही सत्य कहा गया है, परमात्मा कहा गया है। वो तुम्हारे काम का है क्योंकि तुम उस पर हावी नहीं हो सकते। वो तुम्हारे काम का है क्योंकि तुम उसे बदल नहीं सकते।