
जाड़े की सुबह को,
बैठा हूँ मैं बाहर धूप में,
जब एक भूरा कुत्ता और काला कौवा
आकर कुछ इस तरह बैठ जाते हैं-
मेरे ठीक सामने तो नहीं-
पर किसी कोण से लगातार दिखाई देते रहते हैं।
भूरा कुत्ता बहुत कुछ सड़क पर पड़ी
गंदगी जैसा लगता है-
जिसे सूँघता है वो खुद
और काला कौवा आकाश पर छाए
उसी काले धुंआ की तरह
जिसमें उड़ता है वह खुद ।
मन ही मन अपनी इस
सोच पर इतराता हूँ जब-
घर के अन्दर से आती एक आवाज़
मुझे कुछ याद दिलाती है
और मैं स्कूटर स्टार्ट कर
उसी गन्दी सड़क पर,
वैसा ही काला धुआँ छोड़ता
निकल पड़ता हूँ, कुछ काम निबटाने ।
काला कौवा और भूरा कुत्ता अब
बहुत पीछे छूट गए हैं ।
~ प्रशान्त (अक्टूबर, ९५)

समुद्र के लिए ही यहाँ आया समुद्र से ही मेरा आखिरी नाता
पर आज सुबह से व्यस्त रहा रेतीले मसले ये गिनती वो घाटा
साँझ अब जब तट पर आया समुद्र लहराता बोला मुस्कुराता
रेत के कणों में मन फँस जाता रेत गिनते सूरज ढ़ल जाता
रेत का कण विशाल…

आचार्य प्रशांत: जो बातें मैं कह रहा हूँ अगर उनमें कुछ दम, कुछ फ़ौलाद समझ में आता है तो उसको अपनी ज़िंदगी में उतार लें, मेरा उद्देश्य पूरा हो जाएगा। और अगर वो फ़ौलाद आप ज़िंदगी में नहीं उतार रहे हो और बस “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु” कर रहे हो, तो करते…