मुझ से तुम्हारा परिचय,
सिमट कर रह गया
बस एक क्षण तक का,
और बसी है मेरी आँखों में,
बस उसी क्षण की,
एक,
छवि तुम्हारी ।
और,
संतुष्ट हूँ मैं।
उस एक क्षण से
आगे जाना भी नहीं चाहता
मुझ से तुम्हारा परिचय,
सिमट कर रह गया
बस एक क्षण तक का,
और बसी है मेरी आँखों में,
बस उसी क्षण की,
एक,
छवि तुम्हारी ।
और,
संतुष्ट हूँ मैं।
उस एक क्षण से
आगे जाना भी नहीं चाहता
आगे जाने में
छिन न जाए मुझ से,
सलोनी वही
छवि तुम्हारी।
~ प्रशान्त (३ अक्टूबर, ९६)
पर आज सुबह से व्यस्त रहा रेतीले मसले ये गिनती वो घाटा
साँझ अब जब तट पर आया समुद्र लहराता बोला मुस्कुराता
रेत के कणों में मन फँस जाता रेत गिनते सूरज ढ़ल जाता
रेत का कण विशाल…