वह
हँसने की चाह में कितना रोता है
वह
समझता है कि
हँसा जा सकता है
हर बात पर और हमेशा
कुछ यही बात
समझाता है
वह सब को
लोग नहीं समझते
पर वह
वह
हँसने की चाह में कितना रोता है
वह
समझता है कि
हँसा जा सकता है
हर बात पर और हमेशा
कुछ यही बात
समझाता है
वह सब को
लोग नहीं समझते
पर वह
तब तक
जब तक
या तो लोग हँस नहीं देते
या
वह
वह रो नहीं पड़ता
फूट-फूट कर रोता है
सब के न हँसने पर
पर फिर
चुप हो जाता है
क्योंकि
उसे हँसना जो है ।
~ प्रशान्त (जून १२, १९९६)</p

समुद्र के लिए ही यहाँ आया समुद्र से ही मेरा आखिरी नाता
पर आज सुबह से व्यस्त रहा रेतीले मसले ये गिनती वो घाटा
साँझ अब जब तट पर आया समुद्र लहराता बोला मुस्कुराता
रेत के कणों में मन फँस जाता रेत गिनते सूरज ढ़ल जाता
रेत का कण विशाल…

आचार्य प्रशांत: जो बातें मैं कह रहा हूँ अगर उनमें कुछ दम, कुछ फ़ौलाद समझ में आता है तो उसको अपनी ज़िंदगी में उतार लें, मेरा उद्देश्य पूरा हो जाएगा। और अगर वो फ़ौलाद आप ज़िंदगी में नहीं उतार रहे हो और बस “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु” कर रहे हो, तो करते…