स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिद सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच॥
‘वह जो यह अणिमा है, एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है। और हे श्वेतकेतो! वही तू है। ऐसा कहे जाने पर श्वेतकेतु बोला – ‘भगवन्! आप मुझे फिर समझाइए’। तब आरुणि ने ‘अच्छा सोम्य!’ ऐसा कहा।‘
~ छान्दोग्योपनिषद्, षष्ठोऽध्यायः, अष्टमः खण्डः, श्लोक ७
आचार्य प्रशांत: ‘तत्सत्यं स आत्मा।‘ वेदान्त का जो बड़े-से-बड़ा योगदान रहा है मानवता को, वो ये बताने में है कि सत्य न तो संसार में है, न ही संसार के पार किसी ईश्वरीय ताक़त में है।
देखिए, दो तरह के लोग होते हैं आमतौर पर; एक जिनको हम कह देते हैं पदार्थवादी, भौतिकता से ग्रस्त, मटीरियलिस्ट (भौतिकवादी), उनका सत्य संसार में होता है। वो कहते हैं, ‘फ़लानी चीज़ सत्य है, ढिकानी चीज़ सत्य है, और इन चीज़ों को पा लेंगे तो ज़िंदगी बच जाएगी।‘ या कई बार वो कहते हैं कि दुनिया में ही कुछ चीज़ें हैं जो गड़बड़ हैं, उनसे अगर हम अपनी रक्षा कर लेंगे तो भी जीवन सफल हो जाएगा – ये सब भौतिकतावादी लोग हैं, मटीरियलिस्ट हैं। इन्होंने सत्य को संसार में बैठा रखा है।
सत्य किसको कहते हैं?







