दिए का हवाओं से जूझना
प्रेरणास्पद लगा,
मुझे भी, तुम्हें भी ।
चींटी का अथक परिश्रम,
मन भाया,
मेरे भी, तुम्हारे भी ।
तिनके का डूबते को सहारा देना,
हौसला बँधा गया,
मेरा भी, तुम्हारा भी ।
दिए का हवाओं से जूझना
प्रेरणास्पद लगा,
मुझे भी, तुम्हें भी ।
चींटी का अथक परिश्रम,
मन भाया,
मेरे भी, तुम्हारे भी ।
तिनके का डूबते को सहारा देना,
हौसला बँधा गया,
मेरा भी, तुम्हारा भी ।
संघर्षों की गौरवशाली गाथाएँ,
पिघला गईं,
मुझे भी, तुम्हें भी।
पर,
जब हम दिए के जीवट की प्रशंसा कर रहे थे,
चींटी को देखकर आश्चर्य प्रकट कर रहे थे,
तिनके के प्रति आभार व्यक्त कर रहे थे,
इतिहासपुरूषों के समक्ष सर झुका रहे थे,
ठीक उसी वक्त,
कहीं कोई दिया दम तोड़ रहा था,
चींटी हज़ारवीं बार ज़मीन पर गिर रही थी,
तिनका स्वयं भी डूब चुका था
और,
कहीं कोई अकेला, अपनी अकेली लड़ाई,
हार रहा था ।
~ प्रशान्त (मई 4, ’97, रात्रि 12:45)</p

समुद्र के लिए ही यहाँ आया समुद्र से ही मेरा आखिरी नाता
पर आज सुबह से व्यस्त रहा रेतीले मसले ये गिनती वो घाटा
साँझ अब जब तट पर आया समुद्र लहराता बोला मुस्कुराता
रेत के कणों में मन फँस जाता रेत गिनते सूरज ढ़ल जाता
रेत का कण विशाल…

आचार्य प्रशांत: जो बातें मैं कह रहा हूँ अगर उनमें कुछ दम, कुछ फ़ौलाद समझ में आता है तो उसको अपनी ज़िंदगी में उतार लें, मेरा उद्देश्य पूरा हो जाएगा। और अगर वो फ़ौलाद आप ज़िंदगी में नहीं उतार रहे हो और बस “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु” कर रहे हो, तो करते…