मैं बड़ी लगन से
जतन कर रहा हूँ
खूब छुप-छुप के,
इसीलिए अब
कविता काफी कम लिखता हूँ ।
मैं पैने कर रहा हूँ
चुपके से
अपने हथियार
तुम्हारे ही बीच रह कर
रंग-बिरंगा वेश पहन कर
मैं बड़ी लगन से
जतन कर रहा हूँ
खूब छुप-छुप के,
इसीलिए अब
कविता काफी कम लिखता हूँ ।
मैं पैने कर रहा हूँ
चुपके से
अपने हथियार
तुम्हारे ही बीच रह कर
रंग-बिरंगा वेश पहन कर
(अभी)
सतर्क हूँ मैं
खुद को भी नहीं जानने देता
रंगों के पीछे क्या है
बैल की तरह आ भिड़ने
की साध तो बहुत है
पर, अब छिपाऊँ क्या
थोड़ा सा ….डरता हूँ
यहीं पर जियूँगा
यहीं पर हँसूंगा
अपने हथियार खुरचूँगा
जब भी
साँस लूँगा
या बत्तीसी दिखाऊँगा ।
या तो तुम मुझे बेनकाब कर दो
या फिर
अपने चोले में छिपे
निरंतर पैने होते खंजरों से
मैं खुद ही मारा जाऊँगा ।
~ प्रशान्त (२८.०३.००)
पर आज सुबह से व्यस्त रहा रेतीले मसले ये गिनती वो घाटा
साँझ अब जब तट पर आया समुद्र लहराता बोला मुस्कुराता
रेत के कणों में मन फँस जाता रेत गिनते सूरज ढ़ल जाता
रेत का कण विशाल…