
Acharya Prashant: Chandogya Upanishad — Chapter 3, part 11, verses 2 and 3:
न वै तत्र न निम्लोच नोदियाय कदाचन । देवास्तेनाहंसत्येन मा विराधिषि ब्रह्मणेति ॥ ३.११.२ ॥
na vai tatra na nimloca nodiyāya kadācana | devāstenāhaṃsatyena mā virādhiṣi Brahmaṇeti || 3.11.2 ||
Never does this happen there; never did…



प्रश्नकर्ता: आम लोगों में अध्यात्म की जो बातें चलती हैं वहाँ ‘अल्प' की भाषा उपयोग की जाती है, और आजकल जैसे कि नए आध्यात्मिक केंद्रों में




The mind of a sage is continuously sensing a reality beyond appearances, a reality beyond limits. There is a constant realization that all the diversities share commonalities and there is something beyond the diversities that contain all the diversities. This feeling is being given a poetic manifestation in this particular verse. What matters here is the sense that there is something definitely beyond; that which is perceivable, all that which can be experienced between the Earth and the sky is of little importance compared to that.
प्रश्नकर्ता: सर, जैसे कि अभी दशहरा आ रहा है और हर साल दशहरा मनाते भी हैं, लेकिन दशहरे का वास्तविक अर्थ क्या है?
आचार्य प्रशांत: जिसके दस सिर वही रावण। रावण वो नहीं जिसके दस सिर थे, जिसके ही दस सिर हैं वही रावण है। और हममें से कोई ऐसा…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। 'निर्वाण षटकम्' की एक पंक्ति है —
'न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम्।'
तो इसमें जो मोक्ष के विषय में कहा गया है कि मैं मोक्ष भी नहीं हूँ, तो क्या शिव को मोक्ष भी नहीं चाहिए?
आचार्य प्रशांत: हाँ,…
आचार्य प्रशांत: 'अल्प'…
1. अहं ब्रह्मास्मि — "मैं ब्रह्म हूँ" (बृहदारण्यक उपनिषद्, प्रथम अध्याय, चतुर्थ ब्राह्मण, श्लोक क्रमांक १०)
2. तत्त्वमसि — "वह ब्रह्म तू है" (छान्दोग्य उपनिषद्, अध्याय ६, अष्टम खण्ड, श्लोक क्रमांक ७)
3. अयम् आत्मा ब्रह्म — "यह आत्मा ब्रह्म है" (माण्डूक्य उपनिषद्, अध्याय १, श्लोक २)
4. प्रज्ञानं ब्रह्म…
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिद सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच॥
‘वह जो यह अणिमा है, एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है। और हे श्वेतकेतो! वही तू है। ऐसा कहे जाने पर श्वेतकेतु बोला – ‘भगवन्! आप मुझे फिर…
This is a trick question!
Whether you are “meditating” one hour per day or six, you are not truly meditating. This is because meditation is not something you do to escape life. Meditation is a way of life.
Meditation is to…

Questioner: Would you please be able to explain to us the difference between the mind, the soul, the spirit, and consciousness?
Acharya Prashant: There is just consciousness; that consciousness requires physical support. That consciousness requires a physical support, right? That physical support is called: the man.
When we say consciousness,…

संसार में तुम जिस भी चीज़ को शांति का,तृप्ति का साधन बनाओगे वो चीज़ बेचारी असफल हो जाएगी। तुम उसे भोगकर के कुछ और कर देते हो। तो फिर कौन है जो तुम्हें सन्तुष्टि दे सकता है? सिर्फ़ वो जो तुम्हारे स्पर्श से कहीं आगे का हो। तुम्हारा स्पर्श उस पर कोई दाग ही न लगा पाये, जो अस्पर्श्य हो। ऐसे किसी को ही सत्य कहा गया है, परमात्मा कहा गया है। वो तुम्हारे काम का है क्योंकि तुम उस पर हावी नहीं हो सकते। वो तुम्हारे काम का है क्योंकि तुम उसे बदल नहीं सकते।

Questioner: Namskar Acharya ji. Pardon me for not remembering exactly but in one of the shivirs where we had read ‘Gospel of Sri Ramakrishna’ to come to terms with this expression called ‘Adhikar Bhed.’
So therein Ramakrishna was saying that, “now in modern times there cannot be any Adhikar Bhed,…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अष्टावक्र कहते हैं कि ध्यान की विधियाँ बंधन हैं। मेरी जिज्ञासा यह है कि इतनी सारी ध्यान की विधियाँ क्यों हैं?
आचार्य प्रशांत: विधियाँ उनके लिए हैं जिन्हें सत्य को तो पाना है और अपनी ज़िद को भी बचाना है। ख़ुदा को भी पाना है ख़ुद को…

प्रश्नकर्ता: एक चीज़ होती है मेंटल एजिलिटी (मानसिक चपलता), जैसे कि मैं कहीं बाइक से जा रहा हूँ और अचानक कोई मोड़ आ गया या एक कुत्ता बीच सड़क पर आ गया, तो मुझे एकदम से ब्रेक लगाने की आवश्यकता पड़ी। तो ये जो स्किल (कौशल) होती है एकदम से …

प्रश्नकर्ता: मन क्यों हमेशा सुरक्षा की तलाश में लगा रहता है? क्या हैं मन के सदा असुरक्षित अनुभव करने के कारण? मैं तो अध्यात्म में, आप में और शिविर इत्यादि में भी सुरक्षा की तलाश कर रहा हूँ कि संसार में सुरक्षा न मिली तो सत्य में मिल जाए। मैं…

जीवन में जो भी तुम्हें ऊँचे-से-ऊँचे अनुभव हों, उनको एक सीमा से ज़्यादा गम्भीरता से नहीं लेना चाहिए। और जो लोग सच्चाई के रास्ते पर आगे बढ़ते हैं उनको थोड़े अलग तरह के अनुभव होने शुरू हो जाते हैं, इससे मैं सहमत हूँ। और वो अनुभव आपको तभी नहीं होते…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, आपने कहा था कि ग़लती ‘मैं’ भाव से आती है। तो इसके साथ ही अक्सर हम अपनेआप को ये तर्क देते हैं कि मुझसे ये ग़लती हो गयी, ये मैं नहीं थी। तो ये ‘मैं’ भाव क्या है? और ग़लती किसको कहा जा रहा है तब?…

प्रश्नकर्ता: नमस्कार सर, हाल ही में मैंने अपने आदर्श स्टीव जॉब्स और विराट कोहली द्वारा सुझाई गयी लोकप्रिय किताब ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी’ पढ़ी, तो जीवन का अलग ही आयाम खुल गया।
उस किताब के लेखक और उनके गुरु ने, न केवल अपने पूर्व जन्मों के बारे में विस्तार से…

प्रश्नकर्ता: स्त्री की सुंदरता से उसकी कोमलता का जो एहसास होता है, क्या वो परमात्मा की कोमलता जैसा होता है?
आचार्य प्रशांत: रोमेंटिक उपन्यास पढ़ रहे हो? हमें तो पता था सत्यम-शिवम्-सुंदरम, स्त्री कब से सुन्दर होने लग गई? सत्य सुन्दर होता है। स्त्री-पुरुष कब से सुन्दर हुए? कोमलता माने…

आचार्य प्रशांत: ध्यान की एक विधि। उत्सुकता आयी थी कि ध्यान की एक विधि दी जाए। तो आपमें से जो लोग उसके बारे में जानना चाहें, वो समझें।
शून्य-स्मरण। शून्य-स्मरण – जो कुछ भी बहुत आवश्यक और ज़रूरी लगता हो, जो कुछ भी नितांत क़रीबी, आवश्यक प्रतीत होता हो, उसको…

Acharya Prashant: The spiritual soldier, the religious warrior has to be extremely intelligent. You could go to the extent of saying that he has to be cunning in the service of Truth; I’m choosing this word with all deliberation.
He has to be cunning in the service of the Truth;…

प्रश्नकर्ता: सबको प्रणाम। आज की इस धर्म चर्चा में आपका स्वागत है। आज हमारे बीच में एक ऐसी विभूति या कहें शख्सियत आचार्य प्रशांत जी हैं। आपके बारे में मैं थोड़ा सा बताना चाहूँगा। आप बहुत ही ज्ञानी और पढ़े-लिखे एक आचार्य हैं। इन्होंने आइआइटी से इंजीनियरिंग की, आइआइएम से…

प्रश्नकर्ता: साक्षी भाव के लिए ध्यान की आवश्यकता है?
आचार्य प्रशांत: साक्षी भाव और ध्यान एक ही बात है। ध्यान साक्षित्व का माध्यम नहीं है। थोड़ा समझेंगे, ध्याता हम सब सदा हैं, ऐसा नहीं कि जब आप कुछ विशिष्ट पलों में ध्यान लगाने बैठते हो तभी आप ध्यानी होते हो।…

प्रश्नकर्ता: कई लोग जैसा बोलते हैं कि तुम संसार को छोड़कर यदि कुछ और तरफ जा रहे हो, तो वो पलायनवादिता है। असली स्पिरिचुअलिटी (आध्यात्मिकता) वो है जब तुम सब चीज़ों के बीच में रहते हुए, वो हो सको। तो इस बारे में थोड़ा सा प्रकाश डालें प्लीज़।
आचार्य प्रशांत:…

Acharya Prashant: It has been told to us that there exist two centers. I suppose it has been very freshly told to you right? Very recently. He says, “How do I know that I am living out of the right center? How does a young man know whether he’s not…

प्रश्नकर्ता: जो अभी जिज्ञासा है मेरी आचार्य जी, यूट्यूब पर एक शॉर्ट्स देखा था, उसके सम्बन्ध में है। तो एक बहुत सुप्रसिद्ध व्यक्ति जो श्रीमद्भगवद्गीता पर बोलते हैं उनका वह शॉर्ट्स देखा था; काफ़ी चल रहा है, बार-बार मेरे फीड पर आया। तो वो निष्काम कर्म पर बोल रहे थे…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। आचार्य जी, पिछले एक साल से आपको सुन रहा हूँ और आपकी अनुकम्पा से ग्रन्थ भी पढ़ने शुरू किये हैं तो अभी प्रतिदिन कुछ नया सीखने को मिलता है, मन बिलकुल लगा रहता है और जैसा पहले चला करता था, उससे बिलकुल बदल गया है जीवन।…

प्रश्नकर्ता: सर नमस्ते। आपसे मैं सर्वप्रथम शास्त्र-कौमुदी नामक कोर्स (पाठ्यक्रम) के जरिए जुड़ा था, तब से मुझे वेदांत और ग्रंथों का मूल्य पता चला। मैंने प्रस्थानत्रयी का पाठ शुरू किया है, तीन महीने हो गए हैं। मुश्किल हो रही है समझने में, पर आनंद आता है। कोरोना के कारण घर…

आचार्य प्रशांत: केला तक तो खाते हो तो छिलका उतारकर खाते हो और बातें किसी की यूँही समूची निगल लेते हो, बिना देखे कि इसमें क्या लगा है। डॉक्टर हैं, बच्चों को समझाते होंगे सब्जी भी पहले रगड़-रगड़ कर धोना, छिलका उतारना, फिर पकाना और बातें कीचड़ मेंं लथपथ हो…

द सॉन्ग ऑफ द टवेल्व डिसेप्शंस। वर्ल्डली अफेयर्स आर ऑल डिसेप्टिव; सो आई सीक द ट्रुथ डिवाइन।
"संसार के सभी क्रियाकलाप तो मायारूपी हैं, अतः मैं सत्य की शरण में जाता हूँ।"
आचार्य प्रशांत: शुरुआत हमेशा वहीं से होती है—जो तुमने कहा न मैं जानवर हूँ—ये जानने से। शुरुआत वहीं…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। सवाल ये है कि मन हर चीज़ को अंकित क्यों करता है, कि किसी ने किस नज़र से देखा, क्यों हँसा, क्यों आवाज़ हुई। कहीं तो मन में भी कुछ हो जाता है।
आचार्य प्रशांत: हर चीज़ को नहीं अंकित करता मन। इतनी सामर्थ्य ही नहीं…

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पांडव। न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन।।
~ श्रीमद्भगवद्गीता, छठा अध्याय, दूसरा श्लोक।
जिसको संन्यास कहते हैं उसको तू योग जान क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी व्यक्ति योगी नहीं होता।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। मैं संकल्पों के त्याग का तात्पर्य समझना चाहता…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कई बार स्थिति ऐसी हो जाती है कि एक ही चीज़ का लम्बे समय तक सॉल्यूशन (हल) नहीं मिल पाता। जैसे मान लीजिए कि कोई मानसिक समस्या है, उसमें काफ़ी समय बीत गया और उस पर मनन-मंथन भी काफ़ी हुआ, लेकिन उससे उबर नहीं पाये हम, उससे…

Acharya Prashant (AP) All the diversities that you see are the world. And these diversities are what make the mind suffer and here the sages have picked up all the diversities and have said that all these diversities are actually one. The distinctions are merely apparent. Actually, there is an…

प्रश्नकर्ता: सत्य और अध्यात्म की बात पर। व्हाट इस द डिफरेंस बिटवीन बींग स्पिरिचुअल एंड हैविंग अ स्पिरिचुअल एक्सपीरिएंस (आध्यात्मिक होने में और आध्यात्मिक अनुभव होने में क्या अंतर है) ?
आचार्य प्रशांत: आध्यात्मिक अनुभव जैसा कुछ नहीं होता। आप अगर आध्यात्मिक हैं तो आपके सब अनुभवों में एक सच्चाई…

Acharya Prashant: A quiver full of the best of arrows but no bow, how do you fight the battle of life? Can you imagine the amusing as well as tragic situation of the person who has a great arrow without a bow? He will be sharpening and sharpening his weapon,…

Acharya Prashant (AP): The mind has been continuously lying to you. What has it been telling? It's been telling you that there exists no reality outside of itself; that it's not possible to 'be' without being the mind. That's what the mind has been telling you in its own selfish…

प्रश्नकर्ता: भगवान श्री प्रणाम। अपनी तरफ़ देखता हूँ, तो समझ में तो आ रहा है कि कंडिशनिंग (संस्कारों) से अहम् का निर्माण है, अगर इसको, कुछ-कुछ हल्की सी झलक भी आने लगी है कि मानसिक स्तर पर नहीं हूँ।
आचार्य प्रशांत: कंडिशनिंग से अहम् का निर्माण नहीं है, कंडिशनिंग से…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, भारतीय दर्शन में वेदों के आधार पर आस्तिक और नास्तिक का विभाजन किया गया। उसमें बौद्ध, जैन और चार्वाक दर्शन को नास्तिक बोल दिया गया; जिसमें से मुख्यत: बौद्ध और जैन धर्म ने वेदों की सत्ता को माना नहीं, इस वजह से उसमें वर्गीकरण किया गया।
तो…

प्रश्नकर्ता: विशुद्ध चक्र की साधना करता था और एक दिन ऐसा लगा जैसे पार जा ही रहा हूँ, पर मन ने डराकर वापस कर दिया। फिर हिम्मत बाँधकर कोशिश की लेकिन वो मौक़ा दोबारा नहीं मिला। फिर शादी हुई और बाद में कोई दुर्घटना भी हुई जिसकी वजह से घुटने…

Questioner: Why think so much about decisions? Shouldn’t our decisions be spontaneous? I like to decide in a free flow.
Acharya Prashant: So the questioner is stressing on the spontaneity of decisions. He says that he likes to decide in a flow. It's a good thing, your intention is good.…

आचार्य प्रशांत: खिंचाव है, आकर्षण है, किधर को जाने की इच्छा, बदल जाने का मन; कुछ अनजाना, कुछ नया पा लेने की अभीप्सा। कोई ऐसा है जिसको ये न होता हो? कोई ऐसा है जो किधर को खिंचता न हो? कोई है जिसको कुछ-न-कुछ आकर्षित न करता हो? सब हैं…

प्रश्नकर्ता: जो अद्वैत बोधस्थल में आप लोग बंधनों की बात करते हैं और उनके सॉल्यूशंस (समाधान) की बात करते हैं…
आचार्य प्रशांत: बंधनों की बेटा, बात नहीं करनी पड़ती। बंधन में तो सब हैं ही न! तो जो यथार्थ है उसकी बात होती है। यथार्थ ऐसा नहीं है कि अलग…

प्रश्नकर्ता: सुबह ध्यान करने के लिए जाते हैं पहाड़ी पर, अच्छा रहता है, सुबह ध्यान होता है। शाम को भी जाते हैं। फिर बीच में ऑफिस से आने के बाद, दोपहर में एक घंटा घर पर बैठे तो उस तरह का नहीं हो पाता।
आचार्य: तुम कह रहे हो कि…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, दीक्षा में पढ़ते हुए जो पहला श्लोक था, “ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते,” तो इसमें पूर्ण का क्या मतलब है?
आचार्य प्रशांत: जिसकी तुम्हें तलाश है।
प्र: पूर्ण किससे पूर्ण है?
आचार्य: पूर्ण किसी से पूर्ण नहीं होता। पूर्ण मात्र पूर्ण होता है।
प्र: क्या उसमें संसार…

प्रश्नकर्ता मेरे को पता है कि मैं नशा करता हूँ और वो एक सर्टेन टाइम (निश्चित समय) पर आता है। शाम हो जाती है तब मन उधर को पूरा खिंचा चला आता है। वो जो मज़ा देता है मैं उसको छोड़ भी नहीं पाता और मैं कहीं भी कोई भी…

प्रश्नकर्ता: पानीपत से व्यवसायी हैं, उनका प्रश्न है। आचार्य जी, हमारे सारे कर्मों के पीछे मोक्ष की गहरी इच्छा होती है। परन्तु जैसे हम वैसे ही हमारे तरीके इसीलिए हम यूँही भटकते रहते हैं। लेकिन कर्म तो हम करते ही हैं, अब कर्म की गुणवत्ता का पैमाना स्वयं को तो…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैंने देखा पिछले कुछ सालों में, तो मैं थोड़ा सा रिलेशनशिप को लेकर थोड़ा ब्लंटली (दो टूक) अपनी चीज़ें शेयर करना किसी भी टॉपिक को लेकर डिस्कशन हो रहा है। तो रिलेटिव्स भी मुझसे कतराने लगे फिर बात करने से।
आचार्य प्रशांत: नहीं, तो उनसे आप…