दो करोड़ साल पुरानी एक इच्छा || आचार्य प्रशांत, दिल्ली विश्वविद्यालय सत्र (2021)

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, आचार्य जी मेरा क्वेश्चन (सवाल) बहुत सामान्य सा है। मैं अध्यात्म से दो साल से जुड़ी हुई हूँ, मेरा प्रमुख जो इंस्पिरेशन (प्रेरणा) है वो श्रीमदभगवद्गीता ही है। तो श्रीमदभगवद्गीता में श्री कृष्ण जी ने बार-बार ये बात बोली है कि इंद्रियों पर कंट्रोल (नियन्त्रण) रखो, डिज़ायर (कामना) और जो नीड (जरुरत) है उसको अलग रखो और आपने भी अभी अपने वक्तव्य में बोला कि हमें ये जानना बहुत जरूरी है कि बॉडी क्या चाहता है और मन क्या चाहता है और हमें क्या करना है उन दोनों के बीच। तो प्रैक्टिकली ये चीज कैसे कर सकते हैं हम ? अभी जैसे पूरी यूथ जनरेशन (युवा पीढ़ी) जो है मोस्ट ऑफ देम (उनमे से ज़्यादातर) बहुत ज्यादा भटके हुए हैं मार्ग से, सब लालच के पीछे भाग रहे हैं । तो सर, मैं जानना चाहूँगी कि इसका रीज़न (कारण) क्या है और इसका सॉल्यूशन (समाधान) क्या है?
आचार्य प्रशांत: सबसे पहले तो ये कि आपने कहा कि आप अध्यात्म से पिछले दो साल से जुड़ी हुई हैं, आप अध्यात्म से दो साल से नहीं आप अध्यात्म से दो करोड़ साल से जुड़ी हुई हैं। बस आपको पता नहीं था, दो साल से आपको कुछ ख़बर लगनी शायद शुरू हुई है। बिना अध्यात्म से जुड़े हमारी हस्ती ही नहीं हो सकती है तो ऐसा कैसे हो जाएगा कि दो साल से पहले हम अध्यात्म से जुड़े हुए नहीं थे? ठीक है। बस हमें पता नहीं होगा, जैसा कि अगर कोई थोडा थोड़ा बेहोशी में है या नशे में है तो उसको पता ही ना हो कि उसकी जेब में हीरा पड़ा हुआ है। आपको पता भले नहीं है, पर वो चीज आपकी ही है आपसे जुड़ी हुई है, आपसे बिलकुल अविछिन्न रूप से जुड़ी हुई है, हीरा तो फिर भी कोई जेब से निकाल के फेंक सकता है। आत्मा ऐसी चीज़ है जो हमारी हस्ती का आधार है, ठीक है, उससे तो हम अलग हो ही नहीं सकते।
इसी से फिर आप ये भी समझ जाइए कि जो लोग इधर-उधर की, भटकी-बहकी दिशाएँ लेते हैं, वो क्यों लेते हैं? वो इसलिए लेते हैं क्योंकि उनको उस चीज़ की तलाश है जो, जिसका पता वो जानते नहीं है। कोई बहुत क़ीमती चीज़ है जो हम सब खोज रहे हैं, हमें पता नहीं है कि मिलेगी कहाँ। तो हम इधर-उधर की पचास तरह की बहकी हुई राहें चुनते रहते हैं। हर इंसान को चैन चाहिए, शान्ति सबको प्यारी है, सच्चाई के बिना कोई जी नहीं सकता, झूठ में सब का दम घुटता है, बन्धन में कौन जीना चाहता है, मुक्ति की प्यास हम सबको है। लेकिन हमें ये पता नहीं होता कि जो चीज़ हम माँग रहे हैं वो कहाँ मिलेगी। इतना ही नहीं उस चीज़ की झूठी दुकानें दुनिया में चारों ओर खुली हुई है वो हमें ललचाती रहती हैं, पर जवान लोगों को । तो फिर लोग उन राहों कि ओर आकर्षित हो जाते हैं ।



