संतों, सो निज देश हमारा। जहाँ जाए फिर हंस न आवे, भवसागर की धारा ।। सूर्य-चन्द्र नहीं तहाँ प्रकाशित, नहीं नभमंडल तारा । उदय न अस्त दिवस नहीं रजनी, बिना ज्योति उजियारा ।। पाँच तत्व गुण तीन तहाँ नहीं, नहीं तहाँ सृष्टि पसारा । तहाँ न मायाकृत प्रपंच यह, लोक कुटुम्ब परिवारा ।। क्षुधा-तृषा नहीं शीत-उष्ण तहाँ, सुख-दुख को संचारा । आधि न व्याधि उपाधि कछु तहाँ, पाप-पुण्य विस्तारा ।। ऊँच-नीच कुल की मर्यादा, आश्रम वर्ण विचारा । धर्म-अधर्म तहाँ कछु नाहीं, संयम नियम आचारा ।। अति अभिराम धाम सर्वोपरि, शोभा जासु अपारा । कहें कबीर सुनो भाई साधो, तीन लोक से न्यारा ।।
~ कबीर साहब
आचार्य प्रशांत: “साधो, सो निज देश हमारा”— देश, घर, वास्तविक स्थान, केन्द्र हमारा। हममें से ऐसा कोई नहीं है जिसको अपनी ओर से ये न पता हो कि उसका घर कहाँ है। पर क्या होता है घर? एक ईंट-पत्थर का मकान? पदार्थ? या क्या होता है घर? एक ऐसी जगह जहाँ आपके नात-रिश्तेदार रहते हों, परिवार रहता हो, समाज के दिये हुए सारे सम्बन्ध रहते हों, ख़ून के रिश्ते, मर्यादा के रिश्ते?
कहने को घर सभी के पास है लेकिन अगर वो वास्तव में घर होता है तो हमें चैन होता। घर की परिभाषा ही यही है कि जहाँ तुम विश्राम में आ जाओ, तुम्हारी वो जगह जो तुम्हारा स्वभावगत आसन है। जहाँ तुम्हें किसी प्रकार की सतर्कता की ज़रूरत न पड़े, जहाँ तुम पूरे तरीक़े से वो हो सकते हो जो तुम हो, वो देश है तुम्हारा, वो घर है तुम्हारा।







