प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे दफ़्तर का काम तो हम करते ही हैं, लेकिन अपनी जो ख़ुद की इच्छा है, चैन या शांति की, उसके लिए अलग से समय कैसे निकालें?
आचार्य प्रशांत: ऑफिस (दफ़्तर) कोई प्रथम मूल्य तो नहीं हो सकता न, कि ऑफिस जाना ही जाना है। ऑफिस में अगर चैन मिलता है तो जाओ, नहीं तो मत जाओ भाई, बदल दो। तुम नौकरी के हो या नौकरी तुम्हारी है? तुम क्या बोलते हो ‘नौकरी मुझे कर रही है’, ये वक्तव्य है तुम्हारा? हम जीते लेकिन ऐसे ही हैं। हम नौकरी नहीं करते, नौकरी हमें करती है। तो क्यों नौकरी से ‘करवा’ रहे हो? (सभी हँसते हैं)
प्र: अगर नौकरी नहीं करूँगा तो पैसे कहाँ से आएँगे?
आचार्य: तुम्हें अंततः क्या चाहिए था?
प्र: हैप्पीनेस (खुशी)।
आचार्य: वो अगर सीधे-सीधे मिलती हो तो? इतना लम्बा घूम कर न मिले तो?
प्र: ऐसा तो है ही नहीं।




