
प्रश्नकर्ता: करप्शन (भ्रष्टाचार) कहाँ पैदा हुई? किस पॉइंट पर?
आचार्य प्रशांत: कहीं भी नहीं।
प्रश्नकर्ता: जो ये गंदगी दिखती है…
आचार्य प्रशांत: कहीं भी नहीं। कहीं कोई करप्शन नहीं है। करप्शन किसको कहना चाहते हो?
प्रश्नकर्ता: मतलब जो आसक्ति है इस चीज़ को लेकर ज़्यादा है कि.....
आचार्य प्रशांत: कहीं कुछ करप्ट नहीं है। इस बात को बिलकुल ढंग से समझना, कहीं कुछ गलत नहीं है। चाहो तो लिख लो, ‘ऑल इज़ ऑल्रेडी ऐंड ऑल्वेज़ परफेक्ट। देयर इज़ नो करप्शन, नो डिफ़िशेन्सी, नो इनकम्प्लीशन। (कहीं कोई भ्रष्टता, कोई कमी, कोई अपूर्णता नहीं है।)
प्रश्नकर्ता: इसको थोड़ा-सा और एक्सप्लेन कीजिए, क्योंकि जैसे मन अगर स्रोत से निकला है और कोई करप्शन नहीं है, तो प्लेज़र (सुख) में फँस जाना, पेन (दुख) में फँस जाना, यह क्यों है?
आचार्य प्रशांत: सुख में क्यों फँसते हो आप? प्लेज़र में क्यों फँसते हो? बिल्कुल बारीकी से जाइएगा। आप क्यों जाते हो सुख की तरफ़?
प्रश्नकर्ता: कुछ इन्कम्प्लीशन (अपूर्णता) है, कुछ कमी है।
आचार्य प्रशांत: मैं यहाँ लिख रहा हूँ बड़ा-बड़ा, 'ऑल इज़ ऑल्रेडी ऐंड ऑल्वेज़ परफेक्ट।' और ये इस कमरे की दीवारों में है, इस कमरे की हवाओं में है, ये बात इस कमरे की रोशनी में है। ये बात यहाँ के रेशे-रेशे में है। सूक्ष्मतम परमाणु में भी ये बात घुसी हुई है। और आप भी इसी कमरे में हो और आप सुख की तरफ़ जा रहे हो। मतलब क्या है इस बात का?
आप जिस आकाश में हो, उस आकाश के रेशे रेशे में, अणु-अणु में ये बात बसी हुई है कि 'ऑल इज़ ऑल्रेडी ऐंड ऑल्वेज़ परफेक्ट।' (सब सदा सर्वथा पूर्ण है), लेकिन आप सुख की तरफ़ भाग रहे हो। उसका अर्थ क्या है?
प्रश्नकर्ता: क्योंकि मैं मान रही हूँ कि सब परफेक्ट नहीं है।
आचार्य प्रशांत: बस,बस बस,बस…तो ये जो तुमने कहा कि करप्शन क्यों है? यही करप्शन है कि तुम मान रहे हो कि करप्शन है। करप्शन है ही नहीं। करप्शन है ही नहीं। पर हमें ये विचार है कि कुछ कमी है और इस कमी को पूरा करने के लिए हम किस तरफ़ को जाते हैं?
प्रश्नकर्ता: सुख की तरफ़।
आचार्य प्रशांत: सुख की तरफ़, प्लेज़र की तरफ़। ये मानना कि कुछ कमी है, यही कमी है।
प्रश्नकर्ता: ये मानना आता कहाँ से है?
आचार्य प्रशांत: ये मानना, मानने से आता है। ये कहीं से नहीं आता। ये आप क्यों मान रहे हो? मत मानो तो नहीं आएगा। या फिर ये सवाल अपने आपसे तब पूछो जब ये मान रहे हो। "ये मानना कहाँ से आता है?" आप पाओगे कि मानना गायब हो गया। तो आपको कम से कम एक बौद्धिक उत्तर मिल जाएगा और बौद्धिक उत्तर ये होगा कि ये मानना ध्यान की कमी से आता है। जहाँ ध्यान दिया, तहाँ ये मानना गायब हो जाता है। पर यह भी कोई बहुत उचित उत्तर नहीं है। हाँ, मन को बहलाने के लिए ठीक है कि ध्यान की कमी से आता है। ये मानना बस मानना है। जहाँ देखा कि मैं मान रहा हूँ, कि कुछ कमी है, वहीं समझ लो माया है।
माया क्या है? कमी का आभास। माया क्या है? वो बस भासती है। प्रतीत होती है। और क्या प्रतीत होता है? कुछ कम है, कुछ कम है।
जबकि हवा में और दीवारों में और रोशनी में, हर जगह लिखा हुआ है कि सब परफेक्ट है, पूरा है। तो जब ये पूछो कि समस्या क्यों है? क्योंकि तुम पूछ रहे हो, विचार उठा है ये, अन्यथा कहाँ है? तुम किसी ऐसी चीज़ की ओर ईशारा करके पूछ रहे हो कि ‘ये क्यों है?,’ जो है ही नहीं।
जैसे तुम यहाँ इशारा करो कि कमरे में बरगद का पेड़ क्यों है? तो मैं क्या बोलूँगा? मैं बोलूँगा कि जाओ उसको ध्यान से देखो और पूछो कि तू क्यों है? और क्या होगा इससे? जैसे ही ध्यान से देखोगे तो क्या दिख जाएगा?
प्रश्नकर्ता: है ही नहीं।
आचार्य प्रशांत: है ही नहीं। तो जो तुम पूछ रहे हो कि कुछ भी भ्रष्ट क्यों हुआ? कुत्सित क्यों हुआ? दूर क्यों हुआ? खंडित क्यों हुआ? हुआ ही नहीं। तुम कह भर रहे हो कि हुआ।
या यूँ कह लो कि इसीलिए हुआ क्योंकि तुम कह रहे हो। जैसे भी बात को घुमाना फिराना है, जैसे भी करना है।