प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सुख और आनन्द में क्या अन्तर है? कभी-कभी यह आभास होता है कि आनन्द है और कभी-कभी यह आभास होता है कि आनन्द सिर्फ़ क्षण भर था, अब चला गया।
आचार्य प्रशांत: आनन्द आता नहीं, आनन्द होता है। ये आने-जाने वाले सारे काम मन की लहरों के हैं। जो आये, चला जाये, उसको सच्चा नहीं माना जाता। कबीर साहब को ही गाते हो न तुम लोग— “न आवे, न जावे” कौनसा है वो?
श्रोतागण: कहें कबीर सत्य वह पथ है, जहाँ फिर आना और जाना नहीं। ~ कबीर साहब
आचार्य: “जहाँ फिर आना और जाना नहीं” और तुमने क्या बोल दिया? आनन्द आता है, और फिर चला भी जाता है। दो-दो बातें गड़बड़ बोल रहे हो इसमें, पहली बात तो ये कि वो आया और चला गया, दूसरी बात ये कि वो आया और चला गया, और हमें पता लग गया। माने आनन्द को देखने के लिए तुम मौज़ूद थे, कहीं अलग खड़े थे और देख रहे थे कि आनन्द आया और चला गया। कौन है आनन्दवक्षी! कि दरवाज़ा खोलकर अन्दर आएगा और तुम बैठे-बैठे देख रहे हो, थोड़ी देर इधर-उधर घूमेगा, ढूँढेगा जूता नहीं मिल रहा उसका। फिर जब नहीं मिला तो निकल ही जाएगा, या मिल गया तो हाँथ में उठाये जूता चला जाएगा, और तुम कह रहे हो, ‘आनन्द जा रहा है, हमने देखा।‘
दो बातें समझ लेना — न आता है न जाता है, दूसरी बात — जब होता है तो तुम नहीं होते हो। आनन्द भी है, तुम भी हो, तो तुम कोई फर्ज़ी खेल ही खेल रहे हो। आनन्द का मतलब ही है तुम मिटे। तुम अभी हो ये पता करने के लिए, जानकारी करने के लिए, रजिस्टर करने के लिए कि मैं आनन्दित हूँ, तो इसका मतलब कि तुम सिर्फ़ प्रसन्न हो। और ये प्रसन्नता थोड़ी देर के लिए है, थोड़ी देर बाद विदा ही हो जाएगी।







