जो अच्छा लगे, उसे करने में क्या बुराई है?

Acharya Prashant

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जो अच्छा लगे, उसे करने में क्या बुराई है?
जिस चीज़ को मज़ा बोलते हो और जिस चीज़ को बेमज़ा बोलते हो, जिसको सुख बोलते हो, जिसको दुख बोलते हो दोनों को समझो कि ये मामला चल क्या रहा है, और इस समझने में जो मौज है, वो आनंद है। तो दुख भी चल रहा है तो उसको समझो — दुख में भी आनंदित रहोगे, और सुख चल रहा है तब तो समझो ही समझो। कुछ भी चल रहा है, जो भी चल रहा है उसको समझो — वो आनंद है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: आइ’एम एक्सपेरिमेंटलिस्ट। वी डू एक्सपेरिमेंट इन सेमिकंडक्टर्स। सो, वी यूज़ टॉक्सिक गैसेज़ देयर। ऐंड नाउ, इंडिया इज़ ऑल्सो कमिंग टू अ सेमिकंडक्टर इंडस्ट्री, ऑल अराउंड गुजरात एंड समव्हेयर एल्स। सो, ऐज़ ऐन एक्सपेरिमेंटलिस्ट, देयर इज़ अ डुअलिटी इन मी व्हेन आइ डू एक्सपेरिमेंट्स। आइ यूज़ टॉक्सिक गैसेज़, आइ’एम हार्मिंग द एनवायरनमेंट, बट आइ लाइक डूइंग इट। सो, इट्स फीडिंग माइ माइंड।

एक मज़ा आता है करने के लिए, इसलिए कर रहे हैं। बट वो डुअलिटी रहती है कि ये हार्म भी कर रहा है। सो,आइ डोंट नो हाउ टू कम आउट ऑफ़ इट? आइ कांट लीव इट।

आचार्य प्रशांत: ऑलराइट, लेट्स गो इंटु हिस्ट्री एंड सी कैसी–कैसी चीज़ों में लोगों को मजा आता था। ये मजा तो क्या है वो भी एक टाइम, प्लेस और सोसायटी की बात है न। कभी किसी को किसी चीज़ से मजा आ रहा है, क्योंकि उसको बता दिया गया है कि मजेदार है।

अभी उस दिन मैं उदाहरण दे रहा था, कि हमको पता है कि हम बार–बार फ्रेंच परफ़्यूम्स की बात क्यों करते हैं, क्योंकि मिडल एजेस में ये माना जाता था कि नहाने से आपके पोर्स खुल जाते हैं और बैक्टीरिया अंदर घुस जाते हैं। तो आदमी–औरतें नहाते ही नहीं थे उम्र भर। जब नहाओगे नहीं, तो तगड़े परफ़्यूम्स की ज़रूरत पड़ेगी न, तो इसीलिए वहाँ बेस्ट परफ़्यूम्स डेवलप हुए। लोगों को मजा आता था, न नहाने में!

लोग इस बात को अपने सीवी पर लिखते थे। देयर इज़ दैट वेरी फेमस क्वीन जो ज़िंदगी में बस दो बार नहाई, जिसमें से एक बार पैदा होने पर। न नहाने में मजा आ रहा है। और जिसके दाँत जितने सड़े होते थे, उसको माना जाता था कि ये उतने अच्छे कुल का और किस्मत का है क्योंकि ब्रशिंग हैबिट्स, ऐसी तो कोई चीज़ थी नहीं कि डेंटल साइंस डेवलप हुई हो। तो जो लोग शक्कर ज़्यादा खाते थे, उन्हीं के दाँत ज़्यादा सड़ते थे। और शक्कर जब इतनी महँगी होती थी कि बस अमीरों को मिलती थी, तो दाँत भी अमीरों के ही सड़े होते थे। तो ये माना गया कि दाँत सड़ा लो, इससे किस्मत अच्छी हो जाएगी। तो गरीब लोग जान-बूझ के अपने दाँत सड़ाते थे, मज़ा आता है दाँत सड़ाने में।

दुनिया में पता नहीं कैसे–कैसे लोगों को किन–किन चीज़ों में मजा आता है। अभी भी ट्राइब्स हैं, जहाँ इतना लंबा ये निचला होठ है, लोअर लिप, उसको इतना बड़ा कर लो। कहते हैं, ये देखो! और उनको देख के बहुतों को ऑर्गैज़्म हो जाता है। बोलते हैं, यही है असली!

कोई अपने कान इतने लंबे कर रहा है, वहाँ पर उसने उसमें भारी वाला झुमका डाल लिया। बोले, जितने लंबे कान होंगे, उतना ज़्यादा खूबसूरत हो जाती है। कोई गर्दन लंबी कर रहा है, छोटी बच्ची है उसके रिंग्स डाल दिए अब वो रिंग उतना ही है बच्ची के गर्दन की जो गर्त है, जो डायमीटर है वो बढ़ रहा है तो गर्दन ऐसे लंबी हो जाती है। कहते हैं, कितनी खूबसूरत है, कितनी लंबी गर्दन है। लोगों को जाने कैसी-कैसी चीज़ों में मज़ा आता है।

मज़ा एक सोशल कंस्ट्रक्ट है। उसमें कुछ आंतरिक नहीं है।

देयर इज़ नथिंग ऑथेंटिक अबाउट योर कॉन्सेप्ट ऑफ़ प्लेज़र। योर प्लेज़र इज़ कमिंग फ्रॉम द सोसाइटी, नॉट जस्ट इन द सेंस दैट इट डिपेंड्स ऑन ऑब्जेक्ट्स इन द सोसाइटी बट इन द सेंस दैट इट डिपेंड्स फॉर इट्स वेरी डेफिनिशन — ऑन द सोसाइटी।

जिसको हम मज़ा कहते हैं – फ़न, प्लेज़र, हैप्पीनेस, ये सब हमारा नहीं है। आपको बता दिया गया ऐसी चीज़ों में मज़ा आए, तो मज़ा आ जाता है। हाँ, बस जो बिल्कुल ही फिज़िकल बात होती है, जैसे टिक्लिंग, गुदगुदी उसको आप बोल सकते हो सोशल नहीं है। गुदगुदी आज भी की जाए तो आप हँसोगे, 100 साल पहले भी की जाए तो आप हँसते ही थे। बाक़ी तो जितनी आपको मज़ेदार चीज़ें लगती हैं वो सोशल बातें हैं, उनमें कुछ ऐसा नहीं है।

शक्कर की बात कर रहे थे, शक्कर हमें कभी अवेलेबल ही नहीं होती थी। तो आपको क्या लग रहा है, लोगों को शक्कर हमेशा से मज़ेदार लगती थी? नहीं लगती थी। हमारे शक्कर का स्वाद चढ़ाया गया है और अब हमें शक्कर में बहुत मज़ा आता है। नहीं तो मानव इतिहास में हमने कभी इतनी शक्कर नहीं खाई, न शक्कर को ज़रूरी माना पर अब शक्कर के बिना मज़ा आता नहीं है। शक्कर लाओ, शक्कर! भले ही उससे आप इंडिया को डायबिटीज़ कैपिटल बना दो, कुछ कर दो।

तो मज़ा कोई अंदरूनी, आंतरिक, पर्सनल, ऑथेंटिक चीज़ नहीं होती है, ये समझना पड़ेगा एक्सेप्ट फॉर द प्योरली फिज़िकल थिंग्स। यू नो, मज़े पर जब आते हैं, आप जवान लोग यहाँ बैठे हुए हो, मजों में एक बहुत बड़ा मज़ा होता है — सेक्शुअल मज़ा।

भारत में तो उतनी रीसर्च ही नहीं होती है, इसमें तो उतना डेटा अवेलेबल नहीं है पर जब आप वेस्ट के डेटा को देखते हो, पर्टिकुलरली यूएस के, तो लीडिंग रीजन बिहाइंड डिवोर्सेज़ इज़ सेक्शुअल डिसैटिस्फैक्शन। कहते हैं, सेक्स में मज़ा नहीं आ रहा है, उस पर लोगों ने रीसर्च की। वहाँ पर सोशियोलॉजी में ये सब चलता है, इस पर भी रीसर्च करो। रीसर्च करी “मामला क्या है? ये सेक्शुअल डिसैटिस्फैक्शन क्या है?” तो पता ये चल रहा है कि मजे की सेक्शुअल डिसैटिस्फैक्शन पोर्न सेट कर रहा है, व्यक्ति नहीं सेट कर रहा, पोर्न सेट कर रहा है। उसने वो पोर्न नहीं देखी होती, तो वो कहता, “मज़ा ठीक है, जितना है उतना ही है, इतना ही चलेगा।” पोर्न देखने के बाद कहता “नहीं, मज़ा ऐसा होना चाहिए,” वैसा मिलता नहीं है तो फिर डिवोर्स होते हैं।

एंड 70% ऑफ़ द डिवोर्सेज़ आर इनिशिएटेड बाय विमेन, क्योंकि वो जो पोर्न में देख रही हैं वो उनको रियल लाइफ़ में मिल ही नहीं रहा है, मिल सकता भी नहीं है। वो जो मजे की डैफ़िनिशन है, वो तो आपके शरीर से भी नहीं आ रही है। एक तो होता है, चलो टिक्लिंग में मेरे शरीर ने कह दिया “मज़ा आ गया,” या कि गर्मी बहुत लग रही थी ठंडा पानी मिल गया, तो शरीर ने कह दिया, “मज़ा आ गया।”

हम जिन चीज़ों को मज़ा बोल रहे हैं वो तो शारीरिक तक नहीं हैं, शारीरिक मज़ा भी सामाजिक बन चुका है। सेक्सुअल प्लेज़र भी सोसाइटी डिटरमिन कर रही है, कि सेक्स में, ऐसे–ऐसे–ऐसे–ऐसे इतनी देर तक होगा तो उसको प्लेज़र मानेंगे नहीं तो नहीं मानेंगे, और वो नहीं हो रहा तो डिवोर्स हो रहा है।

मज़ा माने क्या? तो फिर अध्यात्म कहता है, एक मज़ा ऐसा होता है, जो काल पर, स्थान पर, समाज पर आश्रित नहीं होता, उसको “आनंद” कहते हैं। उसके लिए किसी ऑब्जेक्ट की ज़रूरत नहीं है। उसके लिए कोई नहीं चाहिए जो आकर के बताए कि ऐसी चीज़ मज़ेदार है। वो आनंद किसमें मिलता है? वो कहता है, जिस चीज़ को मज़ा बोलते हो और जिस चीज़ को बेमज़ा बोलते हो, जिसको सुख बोलते हो, जिसको दुख बोलते हो दोनों को समझो कि ये मामला चल क्या रहा है, और इस समझने में जो मौज है, वो आनंद है।

तो दुख भी चल रहा है तो उसको समझो — दुख में भी आनंदित रहोगे, और सुख चल रहा है तब तो समझो ही समझो। कुछ भी चल रहा है, जो भी चल रहा है उसको समझो — वो आनंद है।

दैट्स जॉय बियॉन्ड ऑल काइंड्स ऑफ़ प्लेज़र। सो, इट्स नॉट दैट स्पिरिचुएलिटी विन्स यू अवे फ्रॉम प्लेज़र्स। इट आक्स यू, इन्वाइट्स यू इन्टू हायर प्लेज़र। कह रहे, तुम छोटे–मोटे उस प्लेज़र में फंसे हुए हो, जो तुम्हें इधर–उधर से बता दिया गया है कि ये प्लेज़र की बात है। तुम ज़रा अलग प्लेज़र में जाओ।

आपने फ़ैशन के ट्रेंड्स देखे हैं, ये बहुत ऑब्वियस सी बात है पर हम इसको उस कॉन्टेक्स्ट में रखते नहीं है इसलिए मुझे बोलना पड़ रहा है। एक समय था जब आपके बेल बॉटम्स होते तो आप कहते "वाओ, मेक्स मी हैप्पी!" आपके साइडबर्न्स होते या हैंडलबार मस्टैश होती, तो आप क्या बोलते? आप देख नहीं रहे हो कि हर उस चीज़ को जिसको आप पसंद–नापसंद करते हो समाज से आ रही है। हेयरस्टाइल से लेकर के हर चीज़ समाज से आ रही है तो फिर आप किसको अपना प्लेज़र बोल रहे हो?

द फील्ड ऑफ़ सेल्फ–इन्क्वायरी इज़ टू डिस्कवर योर ओन इनर, नेटिव, इननेट जॉय। एंड दैट रिटर्न्स योर डिग्निटी टू यू। इट्स अबाउट रिक्लेमिंग योर डिग्निटी फ्रॉम द सोसाइटी। अगर मेरे सुख भी, अगर मेरे इंटिमेट प्लेज़र्स भी सोसाइटी डिटरमिन कर रही है, तो उसमें डिग्निटी, गरिमा कहाँ है फिर। अब भारत में, ना तो सुहागरात का कॉन्सेप्ट था, ना हनीमून का था। आज उसके बिना प्लेज़र होगा ही नहीं। तो किसने तय कर दिया कि ये सब होना चाहिए, किसने तय कर दिया?

ट्राइब्स होते हैं, उनके सामने आप लंबी कार ले आकर खड़ी कर दो, उन्हें कोई प्लेज़र नहीं आने वाला। देख नहीं रहे हो, ये मैन-मेड कॉन्सेप्ट है। कल मैं आईआईएम में था यहीं बेंगलुरु में। मैंने पूछा, “आजकल तुम्हारी सैलरी हिसाब का क्या है?” “30–35 लाख का पैकेज तो हो ही जाता है।”

मैंने कहा, "क्या, कैसा रहता?" बोले, “ठीक है।” मैंने कहा, "मेरे टाइम पर 5–10 लाख का होता था, तुम्हारे टाइम पर 30–35 लाख का हो गया है।” तुम्हें कैसे पता कि ये 30–35 लाख तुम्हें चाहिए? तुम वो मुझे इक्वेशन बताओ जिसके आउटपुट में तुम्हें ये 30–35 का फिगर मिला है। मुझे वो इक्वेशन दिखाओ, कोई इक्वेशन नहीं है सिर्फ़ एक सोशल हवा है “ऐसा होता है, ऐसा होना चाहिए।”

बट दिस इज़ व्हाट हैपन्स। डोंट यू सी, इट्स ऑब्वियस्ली! ये जो ऑब्वियसनेस है, ये जो कॉमन सेंस है, “नहीं, बट ये तो कॉमन सेंस है न, इतना तो होना ही चाहिए।” नहीं मेरे कॉमन सेंस है ही नहीं। मैं बेवकूफ हूँ, मुझे समझा दो। तुम्हें कैसे पता कि तुम्हें 30–35 लाख के पैकेज के बिना सुख नहीं मिलेगा? तुम्हें कैसे पता?

और अगर रैंडम फिगर है, तो मैं कहता हूँ, 55 लाख क्यों नहीं? मैं तुम्हें नीचे नहीं खींच रहा, मैं नहीं कह रहा, 15, मैं कह रहा हूँ, 65। तुम बेटा 65 से नीचे सुख मत मानना, तुम दुखी रहो।

तो किसी भी चीज़ को ना अपनी लाइक, अपनी डिस्लाइक बोलने से पहले, बहुत सँभल जाइए। क्योंकि जिसको हमने अपनी लाइक -डिस्लाइक कर दिया, अब हम उसमें अपनी टाइम, एनर्जी, पैसा, सब इनवेस्ट करते हैं। करते हैं ना? किसी चीज़ को बोल दिया, "आई लाइक इट।" "नाऊ आइ विल इनवेस्ट माइसेल्फ इन्टू इट इन ऑल वेज़ पॉसिबल।"

उससे पहले ये तो देख लो वो ‘लाइक’ तुम्हारी ‘लाइक’ है भी कि नहीं है? वो कहीं ऐसा तो नहीं कि वो *इम्पोर्टेड लाइक * है। इम्पोर्टेड में भी ऐसा लगता है मैंने इम्पोर्ट किया, इम्पोर्टेड भी नहीं, इम्प्लान्टेड लाइक तो नहीं है? किसी और ने तुम्हारे दिमाग़ में कुछ घुसेड़ दिया और तुम उसके पीछे अपनी ज़िंदगी, पैसा, रुपया, समय, ऊर्जा, सब लगा रहे हो। पागलपन है ना? फिर मर जाएँगे, ख़त्म।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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