समाज ने हमें सिखाया है कि खुश रहना चाहिए। इस सीख को हमने इतना सोख लिया है कि यह बात बिल्कुल अंदर तक पैठ गई है। और जो जितना प्रकट करे कि वह प्रसन्न है, उसके बारे में जान लीजिएगा कि वह आनंदित तो नहीं ही है, वह वास्तव में भीतर से दुखी है। प्रकृति में सुख का अर्थ होता है 'भोग'। तो जो आपको सिखा रहे हैं कि हमेशा हैप्पी नज़र आओ, वे वही लोग हैं जो आपको भोग की तरफ़ प्रेरित कर रहे हैं।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं अपने भीतर लगातार एक बेचैनी अनुभव करती हूँ और उस बेचैनी के मूल में मैंने एक पैटर्न (ढ़ाँचे) को ऑब्ज़र्व (निरीक्षण) किया है। वह पैटर्न (ढ़ाँचा) इस प्रकार है — मैं चेतन रूप से, कॉन्शियसली, जानबूझकर खुश और अच्छा अनुभव करने की कोशिश करती हूँ जबकि हक़ीक़त में, अवचेतन में, अनकॉन्शियसली, मैं उतनी खुश या अच्छी नहीं हूँ। मैं यह समझना चाहती हूँ कि यह प्रयास मैं सतत-लगातार आखिर क्यों कर रही हूँ?
आचार्य प्रशांत: क्योंकि समाज ने हमको सिखा दिया है कि खुश रहना चाहिए, "हैप्पी फेसबुक फेस"। तो बाहर की इस सीख को हमने इतना सोख लिया है कि ये बात बिल्कुल अंदर तक पैठ गई है। "खुश रहो, हैप्पी रहो," एकदम चेतना की गहराई में पहुँच गई है ये बात। बहुत लोगों ने तो इतना अपने-आपको प्रशिक्षित कर लिया है कि वो सोते समय भी मुस्कुराते रहते हैं। "क्या पता, कोई सोते समय फोटो खींच ले? उसमें कहीं दिख ना जाए कि हम मुस्कुरा नहीं रहे थे। तैयारी पूरी रखो।" कोई पूछे, "क्या हाल है?" तुरंत बोलो, “आई एम हैप्पी” (मैं खुश हूँ)।
और जो जितना प्रकट करे कि वो प्रसन्न है, उसके बारे में जान लीजिएगा कि वो आनंदित तो नहीं ही है, प्रसन्न भी नहीं है। वो वास्तव में भीतर से दुखी है।




