प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, अभी तक उपनिषद पढ़ते समय जो मैंने सीखा है वो ये है कि जैसे सुख है या दुःख है, अगर आपका अटेंशन (ध्यान) वहाँ जाता है तो आप उसका थोड़ा अन्वेषण करें, देखें कि ये कहाँ से आ रहा है? केंद्र क्या है उसका? तो करती हूं, थोड़े स्थूल कारण होते हैं फिर सूक्ष्म में जाती हूँ, अन्ततः ये होता है कि अहम के केंद्र से आ रहा है और इट्स नॉट गुड ।(ये अच्छा नहीं है)
लेकिन जो छोटी-छोटी चीजें होती हैं, जो बहुत ज़्यादा होती हैं, पूरे दिनभर में चलती रहती हैं, उनके प्रति जो मेरी प्रतिक्रिया होती है, जब उसपर ध्यान जाता है तो देखती हूँ सारे के सारे अहम से ही आ रहे हैं, चाहे सुख दें या दुःख दें। तो वो जो साइक्लिक नेचर है (चक्रीय प्रकृति), वो भी दिखता है। औऱ एक युक्ति भी आपने बताई है कि महत्व नहीं देना है, कि ये तो चलता ही रहता है, तो उसका भी प्रयास करती हूँ। पर महत्व कैसे नहीं देना है, ये समझ नहीं आता है?
आचार्य प्रशांत: दुःख प्रकट हुआ, सुख प्रकट हुआ, उससे पहले आप क्या कर रहे थे? मैंने नहीं कहा कि दुःख आया, सुख आया क्योंकि दुःख और सुख अगर पहले से ही मौजूद न हो तो अचानक आ नहीं सकते। दुःख और सुख के कारण हम में पहले से मौजूद होते हैं फिर दुःख-सुख प्रकट होते हैं। दोपहर तीन बजे आपको दुःख या सुख प्रकट हुआ, दोपहर तीन बजे, आपके जीवन में दोपहर तीन बजे। आप सुबहा से लेकर दोपहर तीन बजे तक क्या कर रहे थे? दुःख-सुख थे तो सुबहा से तीन बजे तक भी, बस छुपे हुए थे। छुपे हुए थे तभी तीन बजे फिर बाहरी घटनाओं का संयोग पाकर के वो प्रकट हो गए। ठीक है न! पर थे तो वो सुबहा से तीन बजे तक भी।
मैं जानना चाहता हूँ सुबहा से तीन बजे तक आप क्या कर रहे थे? क्योंकि आपका प्रश्न ये है, कि दुःख-सुख प्रकट हो जाएं फिर क्या करें, उन्हें महत्व कैसे न दें? वग़ैरहा। तो उनके प्रकट होने के बाद क्या करना है, वो इससे स्पष्ट होगा कि उनके प्रकट होने से पहले आप क्या कर रहे थे। तो सुबहा से तीन बजे तक आप क्या कर रहे थे? आप ये नहीं कह सकती कि मैं कुछ नहीं कर रही थी। क्योंकि अगर आप कुछ नहीं कर रही थी तो आप बस दुःख या सुख के प्रकट होने की प्रतीक्षा कर रहीं थी।




