एक चेहरा जो भुलाए नहीं भूलता || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2021)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी! लगभग एक साल से ऊपर हो गया आपको सुन रही हूंँ। शुरुआत में बहुत ज़्यादा सबकुछ सकारात्मक मिल रहा था, सकारात्मक बदलाव आ रहे थे उसके बाद फिर अभी ये मार्च दो हज़ार इक्कीस का शिविर भी किया था, ग्राफ ऊपर ही जा रहा था।
लेकिन फिर जो नौकरी मैंने शुरु की जुलाई में, तो उसके बाद बाहरी प्रभाव पड़ा। एक व्यक्ति की तरफ़ आकर्षित हुई, काफ़ी ज़्यादा लगाव हो गया था। उसकी वजह से तब से ग्राफ मेरा नीचे जा रहा है।
वो काफ़ी दर्द भरा रहा। बाद में मुझे महसूस हुआ कि मैं बेहोश थी उस समय पर। अभी मेरे दिमाग में उस व्यक्ति का चेहरा आ जाता है या उसके विचार आते हैं। मैं जितना भूलने की कोशिश करती हूंँ, सोचती हूंँ काम पर ध्यान दूँ, वो नहीं हो पाता है।
तो मुझे लग रहा है ये सब होने की वजह से अभी अब मैं आपको अच्छे से सुन भी नहीं पा रही हूँ। वो सब होने की वजह से शायद। यही है।
आचार्य प्रशांत: जूझते हुए सुनो। जितना सुन सकते हो उतना सुनो। छटपटाते हुए सुनो। कोई और विकल्प नहीं है। आपको कोई बहाना, कोई झुनझुना थमाने का मेरा काम नहीं है। दो बातें आपने बतायीं कि एक तो नौकरी और दूसरा संगति। मैं बिलकुल समझता हूँ कि पेट चलाने के लिए नौकरियाँ करनी पड़ती हैं, बिलकुल व्यर्थ की नौकरियाँ। होती हैं भौतिक मजबूरियाँ। सभी को करनी पड़ती हैं शायद।
मैं कोई ऐसा तरीका नहीं बताऊँगा कि घटिया नौकरी करते हुए भी कैसे शांति और आनंद से तनाव-मुक्त रहा जा सकता है। मैं कहूँगा जितने दिन वो घटिया नौकरी करनी पड़ रही है उतने दिन छटपटाओ और एक क्षण को भी भूलो मत कि तुम घटिया नौकरी कर रहे हो।






