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सर, हमारी खुशियों से आपको क्या तकलीफ है? हमें खुशी-खुशी जीने क्यों नहीं देते?|| आचार्य प्रशांत(2023)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी! सामान्यता ये देखा जाता है कि समाज में लोग छोटी-छोटी खुशियों को बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं, चाहे वो किसी का जन्मदिन हो, चाहे शादी हो, चाहे किसी की उन्नति हुई हो। और आपके जब विडियोज़ देखते हैं इन विषयों पर तो थोड़ा-बहुत नकारात्मक-सा लगता है, डिस्करेजमेंट (उत्साहभंग) होता है कि शादी में बुराई है, जन्मदिन मनाने में बुराई है। तो मैं जानना चाहता हूँ कि इन छोटी-छोटी खुशियों का क्या मूल्य है?

आचार्य प्रशांत: सीधा सवाल ये है कि आप हमें ख़ुशियाँ मनाने क्यों नहीं देते, आपको हमारी खुशियों से क्या तकलीफ़ है? 'सर, हम ख़ुशियाँ मना रहे होते हैं तो उसमें आप इतनी आपत्ति क्यों करते हो? चाहे वो शादी की खुशी हो या जन्मदिन वग़ैरा की खुशी हो। तो हमें ख़ुशियाँ मनाने दीजिये। जिन भी चीज़ों में एक आम आदमी को सुख मिलता है, आचार्य जी, आप उनमें खोट-दोष क्यों निकालते हो? हमें खुश हो लेने दो न! हमारी खुशी के मौक़े पर आपको क्या तकलीफ़ है?' ये सवाल है।

आपकी खुशी के मौक़े से मुझे ये तकलीफ़ है कि मैं उसमें आपको कहीं भी खुश नहीं देखता। काश कि आप उस उत्सव में, उस समारोह में सेलिब्रेशन में— एनिवर्सरी, बर्थडे जो भी आप कर रहे हो पार्टी—आप खुश हो नहीं न, उसमें।

समस्या सारी ये है कि आप बस घोषणा कर रहे हो कि ये खुशी का मौका है, कि इस उत्सव में सब खुश हैं। मुझे दिखाओ वहाँ खुश है कौन। मैं भी इन सेलिब्रेशन्स में, पार्टीज़ में शुरू में ख़ूब गया हूँ और चाव से जाता था यही सोचकर कि यहाँ पर खुशी देखने को मिलेगी। लेकिन ताज्जुब होता था, अचरज के साथ लौटना पड़ता था क्योंकि वहाँ पर कहीं खुशी दिखती नहीं थी।

मैं देख रहा हूँ कि बोला तो ये गया था कि सेलिब्रेशन्स है यहाँ पर। सेलिब्रेशन्स है कहाँ? कौन सेलिब्रेट कर रहा है? सेलिब्रेशन्स का तो मतलब होता है प्रसन्नता, आनन्द, आमोद। उत्सव जैसा तो यहाँ कुछ दिख ही नहीं रहा। नाटक है ज़रूर। और एक बँधी-बँधाई स्क्रिप्ट है, सब जिसके अनुसार अभिनय कर रहे हैं। एक केक रख दो। उस पर मोमबत्ती जला दो। एक आएगा, उसको फूँकेगा, मोमबत्ती बुझ जाएगी, फिर सब गाएँगे वही घिसी-पिटी पुरानी धुन पर— हैप्पी बर्थडे टू यू! गाते-गाते बीच में एक-आध जम्हाई भी ले लेगा (जम्हाई लेने का स्वांग करते हुए)— 'हैप्पी बर्थडे!

कौन खुश है? खुशी दिखाओ न! मैं भी इन सबमें ख़ूब रुचि ले लूँगा—पहले ली भी है—अगर उसमें कहीं वास्तविक आनन्द दिखाई पड़ रहा हो। आप अपनी आँखों से ये पर्दा हटा दीजिये, आप ये ज़बर्दस्ती की मान्यता हटा दीजिये कि वहाँ पर लोग खुशी के लिए जाते हैं। थोड़ा सा निष्पक्ष होकर के ऐसी जगहों पर जो लोग इकट्ठा होते हैं उनके चेहरों का ईमानदारी से परीक्षण करिये, फिर बताइये वहाँ खुश कौन है।

चाहे वो शादी-ब्याह के लिए इकट्ठा हुई भीड़ हो, एनिवर्सरी हो, बर्थडे हो या अन्य किसी क़िस्म की पार्टी हो। वहाँ जो लोग इकट्ठा हुए हैं, उनके आप चेहरे देखकर बताइये न कि वहाँ सचमुच कोई लग रहा है खुश? कौन खुश है? खुशी इतनी सस्ती चीज़ होती है केक काटकर मिल जाएगी? ताली बजाकर मिल जाएगी? कैलेंडर के हिसाब से मिल जाएगी? ‘एक साल पूरा हुआ! चलो, खुशी आ गयी!’

खुशी उस दिन तो आयी नहीं थी जिस दिन शुरुआत हुई थी, एक साल बाद कैसे आएगी? दस साल बाद कैसे आएगी? खुशी ऐसी चीज़ नहीं होती है। जानवरों के लिए खुशी सस्ती हो सकती है। घास मिल गयी खुश हो गये, सोने को मिल गया खुश हो गया, पानी मिल गया खुश हो गये। कुत्ते को खुश करने के लिए क्या चाहिए? थोड़ा सामने उसके दो रोटी डाल दो; देखो, कैसे दुम हिलाता है! खुश हो गया। ये काम जानवरों के हैं। उन्हें सस्ती खुशी से काम चल जाता है।

इंसान को वरदान ये मिला है कि उसे खुशी मिलेगी तो ऊँची मिलेगी। और उसे अभिशाप ये मिला है कि उस ऊँची खुशी के लिए उसे दाम भी ऊँचा चुकाना पड़ेगा। जानवरों वाली सुविधा हमें उपलब्ध है ही नहीं। जानवर को खुश करना कितना आसान है! और उसे दुखी करना भी कितना आसान है!

जो इंसान सस्ते में खुश हो जाए कि आज रोटी स्वादिष्ट है, खुश हो गया, उसमें और दुम हिलाते कुत्ते में मुझे बताइएगा ज़्यादा अन्तर कैसे है? कुत्ते को भी तो दो रोटी दिखायी थी, क्या दुम हिलाई उसने! तो इंसान को आनन्द मिल सकता है और आनन्द, जॉय छोटी-मोटी खुशियों से बहुत आगे का होता है।

ये इंसान को हम कह रहे हैं वरदान है कि आपको बहुत ऊँची खुशी मिलेगी। लेकिन ऊँची चीज़ के दाम भी ऊँचे होते हैं। और उसी चीज़ का ऊँचा दाम ये होता है कि जो अपनी कमज़ोरियाँ हैं उनसे जूझ जाओ, सच्चाई के साथ रहो, झूठ को नकारो। तुम्हारे ही वो हिस्से जो झूठ का साथ दे रहे हों उनके विरुद्ध संघर्ष करो। और फिर ये जो सच्चाई होती है यही आनन्द बनती है। सत्य ही आनन्द है। यही वेदान्त की शिक्षा है – सत्य ही आनन्द है। आनन्द और कहीं है ही नहीं।

सच्चाई के अलावा बंधनों, झूठ के बंधनों से मुक्ति के अलावा आनन्द कहीं नहीं है। और आपने उन बंधनों को काटने की ताक़त तो दिखायी नहीं, इरादा भी नहीं दिखाया, दाम भी नहीं चुकाया तो पार्टी कर लेने से आनन्द आपको कहाँ से मिल जाएगा? ये समस्या है मुझे उत्सवों से।

आप ये छोटे-मोटे उत्सव करके सोचते हो कि आपको खुशी मिल गयी; मिली है नहीं, काश कि मिली होती। आपको अगर मिली होती इन्ही सब चीज़ों से खुशी तो मैं भी पहुँच जाता और हैप्पी बड्डे, हैप्पी बड्डे करके ताली बजा देता।

ये बड्डे-गड्डे में ताली बजाने से खुशी नहीं मिलती, भाई! हाँ, एक समस्या ज़रूर खड़ी हो जाती है। आप अपनेआप को ये जता लेते हो कि आपको खुशी मिल गयी। और झूठी खुशी पाने का जब भ्रम पैदा हो जाता है तो आदमी सच्ची खुशी से और दूर हो जाता है।

जब आदमी झूठी चीज़ से ही तृप्त हो जाएगा तो सच्ची की तलाश क्यों करेगा? अगर झूठी मिठाई को ही आपने कह दिया कि यही सही है, बढ़िया है, मीठी है, स्वादिष्ट; तो फिर सच्चे अमृत की आप तलाश क्यों करोगे? एक-एक आदमी पका बैठा है, ऊबा बैठा है।

आप किसी रेस्तराँ में देखिएगा, जहाँ बड्डे पार्टी हो रही है। वहाँ पर एक बड़ी टेबल लगी होगी, पूरी ज्वाइंट फैमिली आयी है, दो-चार दोस्त-वोस्त आये हैं। बच्चे का वहाँ पर जन्मदिन मना रहे हैं; वो पंद्रह-बीस लोगों का एक दल हो सकता है, झुंड, पंद्रह-बीस लोगों का। और वो जो रेस्तराँ है, बड़ा है; उसमें दस-बीस और भी टेबल्स हैं उसमें और दूसरे लोग बैठकर अपना साधारण खाना-पीना कर रहे हैं। ये जो बड़ा वाला टेबल है ये बीचों-बीच लगा है।

यहाँ ये सारे इकट्ठे हो जाएँगे और बड़ा केक रख दिया जाएगा और ये उसके साथ अपना कुछ करेंगे। फिर देखिएगा कि इनमें से—ये जो भीड़ है पंद्रह-बीस लोगों की बर्थडे वाली—इनमें से किसी की नज़र जब वहाँ मौजूद अन्य लोगों पर पड़ती है, अन्य लोग कौन? जो इनसे सम्बन्धित नहीं हैं, जो अपना यूँही रेस्तराँ में अलग से चाय-पानी करने आये हैं; जब इनकी नज़र उन दूसरे अजनबियों पर पड़ती है तो ये कैसे तत्काल सकुचाकर के अपनी नज़र वापस खींच लेते हैं! जैसे कि इनका फरेब पकड़ा गया हो, जैसे इनका झूठ पकड़ा गया हो।

आप स्थिति समझ रहे हैं मैं क्या बोल रहा हूँ? मान लीजिए ये जो है ये पूरा एक रेस्तराँ का हॉल है यही। तो इसमें जो सेंटर टेबल है उस पर क्या चल रहा है? पार्टी रही है। कौनसी? वो अलग ही दिख रहा है उसमें ऊँचा केक रखा है और पंद्रह-बीस लोग खड़े हो गये हैं। और जो छोटा नुन्नू है उसको खड़ा कर दिया गया है। और उसको समझ में नहीं आ रहा है मेरे साथ क्यों हो रहा है ये सब, लेकिन अब यही प्रथा है तो यही करना है। तो खड़ा हुआ देख रहा है सब खड़े हैं।

अब इर्द-गिर्द और भी दस-बीस टेबल लगी हुई हैं, उन पर दूसरे लोग बैठे हुए हैं अजनबी परिचित। वो भी अचकचा के देख रहे हैं बीच में कि ये क्या फालतू का जलसा। फिर कहते हैं फालतू का क्या, यही तो हम भी करते हैं तो उसको झेल जाते हैं कहते हैं चलो आज तुम्हारी बारी है कल उस सेंटर टेबल पर हम भी तो आने वाले हैं।

और जो सेंटर वाले लोग होते हैं, जब इनकी नज़र इधर-उधर पड़ती है तो ये तुरन्त अपनी नज़र वापस खींचते हैं जैसे कि ये झूठ हो जो बस उस झुंड के लोग ही आपस में एक-दूसरे को बोल रहे हैं। बाहर वाला उस झुंड में शरीक नहीं होगा; न तो बाहर वाले को आप देखेंगे, उसकी नज़र पोल खोल देगी। आपने उसको देखा, उसने आपको देखा; अब बाहर वाले पर तो कोई बंधन है नहीं कि वो दिखाए कि वो भी खुश है। ये जो पंद्रह लोग हैं, इनमें आपस में झूठ का समझौता हुआ है। पंद्रह लोग कौनसे हैं? ये बर्थडे पार्टी वाले। इन सब ने आपस में एक अनुबंध, करार, एक कॉन्ट्रेक्ट करा है; झूठ का समझौता करा है। क्या? तुम भी दिखाओगे कि तुम खुश हो और मैं भी दिखाऊँगा कि मैं?

श्रोतागण: खुश हूँ।

आचार्य: तो ये तो आपस में एक-दूसरे को दिखा लेते हैं अपने खुश चेहरे क्योंकि इनका तो आपस में कॉन्ट्रैक्ट हुआ कि भाई, ऐसा करना होता है। तुम भी ऐसे करना, हम भी ऐसे करेंगे।

तो दोनों का झूठ चल जाएगा फिर आपस में, परस्पर। लेकिन वो जो बगल की कुर्सी में बैठे हैं सब, वो तो इस समझौते में शामिल नहीं हैं। तो आप ऐसे करते हो –हे-हे (हँसने का व्यंग्य), दाँत फाड़ते हो, उनकी ओर देखते हो और वो आपको ऐसे देखते हैं (गाल पर हाथ रखकर रूचि न होना दर्शाते हुए)। तो पोल कतई खुल जाती है। तो ये लोग ज़्यादा देर उधर देखेंगे ही नहीं उसकी तरफ़। ये आपस में ही अपना ऐसे रहेंगे। नज़र उधर चली गयी तो जल्दी से ऐसे करेंगे।

हम जिसको सुख कहते हैं उसमें हमारे लिए सुख नहीं है। और ख़तरनाक बात ये है कि हम जिसको दुख कहते हैं उसमें हमारे लिए दुख भी नहीं है। मैंने शव यात्राएँ देखी हैं जहाँ पर आगे लाश चल रही होती है और पीछे दोस्त-यार, रिश्तेदार स्टॉक मार्केट के आँकड़ों पर बात कर रहे होते हैं। सामने चिता जल रही होती है और दो-चार वहीं इधर खड़े होते हैं और बात कर रहे होते हैं – ‘अच्छा, जो आपकी बैंगलोर वाली प्रॉपर्टी (सम्पत्ति) है उसका एप्रीसिएशन (मूल्यवृद्धि) कितना हुआ?’

दुखी भी नहीं हो पाते हम। न हम सुखी हो सकते हैं, न हम दुखी हो सकते हैं। हमारा सुख भी ओछा, हमारा दुख भी ओछा। ऊँचा दुख भी उसी के हिस्से की चीज़ है जिसके हिस्से की चीज़ है ऊँचा सुख। जैसे जानवर को—मैंने कहा कि—छोटा सुख मिलता है, जानवर को दुख भी छोटा मिलता है। वैसे ही हम जानवर हैं। हमारा दुख भी छोटा है, हमारा सुख भी छोटा है। हम टूटकर कभी रो भी नहीं पाते। आनन्द भी तोड़ता है अहम् को और गहरा दुख भी तोड़ता है अहम् को।

हम ऐसे मिथ्याचारी लोग हैं, अहंकारी लोग हैं, न हम आनन्दित होते हैं और न कभी हम टूटकर दुखी हो पाते हैं। हम जीवन की, जैसे एक ग्रे ज़ोन में जीते हैं; न इधर, न उधर, न काला, न सफ़ेद; बीच में— ग्रे ज़ोन।

आम आदमी बहुत दुखी नहीं हो पाता क्योंकि जो बहुत दुखी हो जाएगा उसे बदलना पड़ेगा। जो बहुत दुखी हो गया उसे अपने जीवन की व्यर्थता दिख जाएगी। आम आदमी बहुत दुखी भी नहीं होता; न वो बहुत सुखी होता है। मुझे इसलिए तुम्हारे उत्सवों से समस्या है। और समस्या मुझे सिर्फ़ उन उत्सवों से नहीं है जिनमें सुख का प्रदर्शन होता है। मैं तो कह रहा हूँ कि हमारी तो शोक सभाएँ भी नकली होती हैं। हम उत्सव करते हैं वो भी नकली और हम शोक सभा करते हैं वो भी नकली। न असली सुख है, न असली दुख है।

जीवन आनन्द के लिए है। जीवन तो है ही सुख के लिए। जीवन का तो मतलब ही है बड़ी से बड़ी, ऊँची-से-ऊँची पार्टी; जाओ, मौज करो। जीवन इसीलिए है। पर मौज कैसे हो पाएगी अगर इसी बात को सुख मान लिया गया कि आज से आठ साल पहले हमने आग के इर्द-गिर्द करा था वो मेरी गो राउंड? ये क्या है!

तुम सच बताओ, तुम दिल से बताओ, तुम आह्लादित हो आज इस बात पर? तुम नहीं हो। लेकिन तुमको रस्म निभानी है, तुमको झूठ निभाना है। फिर तुम चाहते हो कि मैं भी उसमें शामिल हो जाऊँ। फिर तुम चाहते हो मैं बोलूँ कांग्रेचुलेशंस ! मैं कैसे बोल दूँ? बधाई कैसे दे दूँ? किस बात की बधाई दे दूँ? मैं आतुर हूँ बधाई देने के लिए, मैं तो तलाश रहा हूँ कहीं कोई ऐसा मिले जो बधाई देने लायक़ हो।

मैं सचमुच बड़ी उत्सुकता, बडी व्यग्रता, बड़ी आकुलता से तलाश रहा हूँ कि कहीं कुछ होता दिखे जिस पर बधाई दी जा सके। ऐसा कोई दिखता नहीं है और झूठ-मूठ की बधाई देना मुझे आता नहीं।

आपको कैसा लगेगा, आपके नंबर आये—मान लीजिये कोई कॉलेज का, बोर्ड का कोई परीक्षा फल आया—आपके नंबर आए पैंसठ प्रतिशत। कितने? पैंसठ प्रतिशत। न बहुत कम, न बहुत ज़्यादा। ये साठ-पैंसठ प्रतिशत जो है ये वही है थोड़ा सा सुख, थोड़ा सा दुख वाला इलाका है ये। आपके साथ तो ऐसा भी नहीं होता न, कि पंद्रह प्रतिशत आए। वो करने के लिए भी कोई सूरमा चाहिए। न हमारा सुख बड़ा, न हमारा दुख बड़ा है।

न हमारे निन्यानवे प्रतिशत आते हैं, न हमारे नौ प्रतिशत आते हैं। हमारे कितने आते हैं? साठ-पैंसठ प्रतिशत आते हैं। अब आपके आये हैं साठ-पैंसठ परसेंट (प्रतिशत) नंबर और कोई आपके चारों-ओर कूद-कूद कर बोल रहा है – ‘बधाई हो! कांग्रेचुलेशन ! कॉन्ग्रेट्स ! बधाई हो! बधाई हो!’ तो आपको कैसा लगेगा? कैसा लगेगा? अगर आप बहुत बेईमान आदमी होंगे तो ही आपको अच्छा लगेगा।

नंबर आपके कितने आये हैं? साठ-पैंसठ परसेंट आपके नंबर आये हैं और कोई बिलकुल बावला हुआ जा रहा है आपको बधाई देने में, कह रहा है ‘बधाई हो! पठ्ठे ने फोड़ दिया बिलकुल। आसमान में तीर मारा है सीधे।‘ जब कुछ हुआ ही नहीं बधाई देने लायक़ और कोई बधाई दे तो ये बात एब्सर्ड (निरर्थक) है न? एबसर्ड; इसी को एबसर्डिटी बोलते हैं न? बेतुकी बात है ये, अतार्किक बात है ये, झूठी बात है ये, मिथ्या है।

तो जहाँ सुख है ही नहीं वहाँ मैं सुख की बधाई दूँ! कैसे दूँ? और ये कोई दार्शनिक आधार पर नहीं कह रहा कि वहाँ सुख नहीं है; काश कि वहाँ किसी के लिए सुख होता। मान लो, मेरे लिए नहीं है, आपके लिए होता। पर मैं तो आपके भी चेहरे देखता हूँ तो मुझे चेहरों पर बस रूखापन, बंजर, रिक्त रेत दिखायी देती है बस। और आप चाह रहे हो कि मैं आपको हरी फसल की बधाइयाँ दूँ। मैं कैसे दूँ? मुझे दिख क्या रहा है वहाँ पर? सूखी रेत, शुष्क!

आप कह रहे हैं मैं आपसे बोलूँ – 'क्या बारिश हुई है! क्या हरियाली छायी है!' बारिश हुई होती, हरियाली छाई होती तो तुम्हारा चेहरा यूँ सूखा और रेतीला क्यों होता? क्यों होता?

खुशी बहुत अच्छी बात है। मुझे खुशी से कोई समस्या नहीं है। मैं तो खुशी की तलाश में हूँ। मैं चाहता हूँ सबको मिले खुशी। उसी का दिन-रात प्रयत्न कर रहा हूँ। लेकिन खुशी न पाने से भी एक बदतर काम होता है; क्या? झूठी खुशी पाना। क्योंकि अगर आपने खुशी नहीं पायी है तो आप कम-से-कम खुशी की कोशिश तो करोगे। पायी नहीं है तो प्रयत्न करोगे, तलाशोगे। है न? लेकिन जिसको मिली नहीं है और बोल दे मिल गयी, उसकी तो तलाश का भी गला घोंट दिया गया। बोलो, हाँ या ना? मिला भी नहीं है और कह रहे हो, 'आइ एम द‌ हैप्पिएस्ट पर्सन इन द वर्ल्ड '(मैं संसार में सबसे खुश व्यक्ति हूँ)।

और ये जो हाइपरलेटिव है ये बहुत चलने लगा है। किसी को भी बोलोगे तो डिअर भी नहीं बोलते, अब डियरेस्ट बोलते हैं। कोई छोटी-मोटी चीज़ों को बोलेंगे – आइ एम द हैप्पीएस्ट परसन (मैं सबसे ज़्यादा सुखी व्यक्ति हूँ)। या आइ एम द लकिएस्ट परसन (मैं सबसे ज़्यादा सौभाग्यशाली हूँ)। वैसा कुछ हुआ तो है नहीं, तुम भी जानते हो, पर आदमी बेईमान हो; पता है शब्द मुफ़्त के होते हैं तो कुछ भी शब्द उछाल देते हो। किसी को भी डियरेस्ट बोल देते हो। किसी भी मौक़े को बोल देते हो इट्स एन ऑकेज़न ऑफ़ माई हाइएस्ट हैपिनेस (ये मेरी उच्चतम खुशी का अवसर है)। सिर्फ़ इसलिए क्योंकि शब्द सस्ते होते हैं और मुफ़्त के होते हैं। तुम्हें लगता होगा ये तुम्हारी हाइएस्ट हैप्पीनेस है – दिस इज़ द हैप्पीएस्ट डे ऑफ़ माई लाइफ (ये मेरे जीवन की उच्चतम खुशी का दिन है)!

मुझे तो पता है न, तुम झूठ बोल रहे हो, तुम्हें भी पता तुम झूठ बोल रहे हो। बताओ, मैं तुम्हारे झूठ में भागीदार हो जाऊँ क्या? तुम तो चाहते होगे कि हो जाऊँ। नहीं होता तो आपको असुविधा हो जाती है। दस लोग हँस रहे हैं और बीच में एक यूँ खड़ा हो जाए और ऐसे देखे तो इन दस लोगों का मुँह उतर जाता है बिलकुल।

होना तो ये चाहिए था कि दस लोग हँस रहे हैं और उनकी खुशी सच्ची है तो इस ग्यारहवें को भी कुछ खुशी मिल जाए। है न? पर ऐसा कैसे हो जाता है कि दस लोग हँस रहे हैं और वहाँ मैं बस ऐसे जिज्ञासा भरी आँखों से आपको देख लेता हूँ तो सबकी हँसी उतर जाती है। खुशी पुछ जाती है। ऐसा कैसे हो जाता है?

आनन्द बोध के साथ आता है, समझदारी के साथ आता है। परिपक्कता, मुक्ति – ये सब एक परिवार के हैं। ये एक समूह है जो एक साथ ही रहता है, क्या? सत्य, आनन्द, बोध, मुक्ति, समझदारी, परिपक्कता। ये सब एक साथ चलते हैं। ये छः, आठ—जितने भी, आप गिनिए, या दस इन्हें चलना एक साथ है। दस में से नौ आपके पास हैं नहीं, ये दसवाँ आपको अकेले कैसे मिल गया? कैसे मिल गया? हो सकता है क्या कि मिल जाए? बोलो।

आनन्द तो आप कह लीजिए ऐसा है जैसे हाथी की पूँछ। जब पूरा हाथी मिलता है तब उसकी पूँछ होती है। पूँछ तो छोटी-सी है हाथी की, हाथी तो बड़ा है न? तो अगर वो हाथी की आपको छोटी सी पूँछ भी चाहिए तो आपको पूरे हाथी के दाम चुकाने पड़ेंगे, है न? अगर आप कहो कि मुझे हाथी की पूँछ देखनी है तो उसके लिए आपको पूरा हाथी देखना पड़ेगा न? या हाथी की पूँछ कहीं अलग से मिलेगी? वैसे ही आनन्द अलग से नहीं मिलता, आनन्द मिलता है बहुत बड़े वाले हाथी के साथ। उस हाथी का क्या नाम है? मुक्ति, बोध, समझदारी, साहस, करुणा, त्याग, प्रेम। जब इन सबका हाथी होता है तो उसके पीछे-पीछे आनन्द की पूँछ आती है।

ये जो नौ शर्ते हैं आनन्द पाने की, जो इतना बड़ा हाथी है, ये तो आपने शर्तें पूरी करी नहीं और आप कह रहे हैं पूँछ मिल गयी! ऐसा कैसे हुआ – हाथी नहीं मिला और पूँछ मिल गयी? झूठ बोल रहे हो न? और बस तुम्हारी पोल खुल जाती है जब मैं वहाँ आकर के इनकार कर देता हूँ झूठी खुशी में शामिल होने से। तो फिर बड़ा बुरा लग जाता है कि आप हमारी खुशियों पर आपत्ति क्यों करते हैं?

मैं वादा कर रहा हूँ, आप सच्ची खुशी दिखाइये; ये तो छोड़िए कि मैं उस पर आपत्ति करूँगा, मैं उसमें शामिल हो जाऊँगा, मैं उसको और बढ़ाऊँगा। कोई सचमुच आनन्दित आदमी मिले, मैं तो जान लगा दूँगा कि इसका आनन्द क़ायम रहे और फले-फूले। पर जो लोग आनन्द का ढोंग कर रहे हैं उनके साथ मैं क्या सहानुभूति रखूँ!

आमतौर पर हम जो उत्सव वगैरह करते हैं न, उनकी ज़रूरत भी इसीलिए पड़ती है क्योंकि ज़िन्दगी है एकदम बेकार। तो उस बेकार ज़िन्दगी को किसी तरह झेलते रहने के लिए करनी पड़ती है पार्टी। ठीक बोल रहा हूँ?

‘भाई, टेंशन बहुत हो गया है। आज पार्टी करेंगे।’ और टेंशन बहुत क्यों हो गया? घटिया ज़िन्दगी जी रहे हो। दफ़्तर में जो स्थितियाँ हैं वो भी झेले जाने लायक़ नहीं हैं, घर में जो है स्थितियाँ वो भी अपने ग़लत चुनावों के कारण बेकार हैं। तो फिर कहते हो आज पार्टी करनी है किसी तरीक़े से। 'भागो! आज पार्टी करेंगे यारों के साथ।'

तो आपकी जो खुशी आती है वो किन चीज़ों के साथ आती है? वो झूठ के साथ आती है। झूठ है इसलिए झूठी खुशी चाहिए। तनाव है इसलिए पार्टी करनी है। हम कह रहे हैं पार्टी आनी चाहिए किसके साथ? ऊँची-से-ऊँची चीज़ों के साथ। जब ऊँचा-से-ऊँचा जीवन में मौजूद हो तब इंसान को पार्टी करनी चाहिए। उसके साथ पार्टी अपनेआप आती है। हाथी होगा तो पूछ भी होगी। लेकिन आपकी पार्टी आती है छोटी-से-छोटी, क्षुद्र-से-क्षुद्र और गिरी-से-गिरी चीज़ों के साथ। उस पार्टी में कैसे कोई शामिल होगा?

जिसकी ज़िन्दगी में ऊँचाई नहीं, वो पार्टी के दिन भरसक कोशिश भी करेगा न तो खुश नहीं हो पाएगा। करिए आपको जितनी कोशिश करनी हो। तैयार होकर आइए; कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा उससे।

विज्ञापन में बोलते हैं न? 'शादी है।' क्या? 'तैयार होकर आइये!' जितनी तुम्हें, जितने लाख के घाघरे डालने हैं, जितने हज़ार के सूट डालने हैं, हीरे-मोती जड़ने हैं, सब पूरी तैयारी करके जाओ पार्टी में। खुश तब भी नहीं हो पाओगे। हो भी नहीं पाते न? दिल से बताना। नहीं हो पाते न? बस नाटक करना है। ऐसा करना होता है, यू आर सपोज़्ड टू बी हैप्पी

ये क्या है? 'यू आर सपोज़्ड टू बी हैप्पी!' वहाँ पर आप जाओ किसी जगह पर जहाँ पार्टी है, बड़ी वाली। फूफी की पिंकी की शादी है। और वहाँ पर जाकर के साधारण, गम्भीर चेहरा लेकर खड़े हो जाओ। तो कोई आकर आपको ऐसे टोकेगा – ' नो राज्जू! यू आर सपोज़्ड टू बी हैप्पी। कम ऑन, ग्रिन! ' और फिर आपसे उम्मीद की जाती है कि आप ऐसे हो जाएँ (झूठी मुस्कान दिखाते हुए)। क्यों हो जाएँ ऐसे?

मेरी माँ को पुराने गानों का बड़ा शौक था। तो घर में लगाया करती थीं। तो एक गाना है, “या दिल की सुनो दुनिया वालों या मुझको अभी चुप रहने दो। मैं ग़म को खुशी कैसे कह दूँ, जो कहते हैं उनको कहने दो।“ तुम्हारी पार्टियों में ग़म-ही-ग़म बिखरा पड़ा होता है। फिर तुम चाहते हो उस ग़म को खुशी कह दें। कैसे कह दें?

सुना है गाना ये? मूवी याद है बताता हूँ अभी, हेमंत कुमार का गाया हुआ ये है। धर्मेन्द्र पर अभिनीत है।

श्रोतागण: 'अनुपमा'।

आचार्य: 'अनुपमा' 'अनुपमा'। "माँगा हुआ तो तुम कुछ दे न सके, जो तुमने दिया वो सहने दो।" कुछ इस पर किसी को? (श्रोताओं के प्रश्न से सम्बन्धित)

हाँ, गाइए (गाने वाले सदस्यों से)।

झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद । जगत चबैना काल का, कुछ मुठी कुछ गोद ।।

सुखिया सब संसार है, खाए और सोवै । दुखिया दास कबीर है, जागे और रोवे ।।

~ कबीर साहब

जो सच्चाई से डरते हैं, आनन्द उनके लिए नहीं है। आनन्द का रास्ता दुख की गहराइयों से होकर जाता है – "दुखिया दास कबीर है, जागे और रोवै।" जो जागेगा, वो रोएगा। पर अगर रोने में खारापन है तो वही आनन्द दे देगा। गहराइयाँ सब आपस में जुड़ी होती हैं। दुख की गहराई ही आनन्द की गहराई बन जाती है। कारण सीधा है – दुख की गहराई अहम् की तोड़ाई बनती है न? और जहाँ अहम् टूटता है फिर आनन्द है।

छोटे-मोटे दुख को तो अहम् पचा जाता है। छोटा-मोटा दुख अहम् की खुराक़ बन जाता है। छोटे दुख से तो अहम् पोषण पाता है बिलकुल। और सच्चाई बहुत बड़ा दुख होती है। इसीलिए तो आम आदमी सच्चाई से इतना मुँह चुराता है। जो सच में जीने लगेगा उसका अहम् टूटेगा और अहम् का टूटना ही आनन्द है। लेकिन जब अहम् टूटेगा तो अनुभूति होगी दुख की।

साहब का ये है कि "हँस हँस कंत न पाया, जिन पाया तिन रोये।" —कि हँसते-हँसते नहीं मिलता किसी को, जिसको मिलता है रोकर ही मिलता है।

"हासे खेले हरी मिले, तो सब दोहागन होए ।"

अगर हँसी-ठिठोली से हरि मिलते होते तो फिर तो सभी का योग हो जाता। हरि तक का रास्ता सच्चाई और संघर्ष का रास्ता है। जिन्हें झूठी ज़िन्दगी में जीना हो, झूठी ख़ुशियाँ मनानी हो, उनके लिए सत्य तो नहीं ही है; वो संसार में भी बस बेवकूफ़ बनते हैं।

देखिए, बात बाँध लीजिए बिलकुल। झूठी खुशी से कहीं बेहतर है सच्चा दुख। पकड़ लीजिये अच्छे से। और संसार आतुर रहता है आपको झूठी खुशी देने के लिए, है न? बाज़ार का सिद्धांत ही यही है – छोटी-छोटी और झूठी-झूठी ख़ुशियाँ दे दो, लोग खिंचे चले आएँगे।

चेतना को बाज़ारू मत बनने दीजिये। आ रही है बात समझ में? सच्चा दुख बेहतर है। सच्चा दुख आनन्द के द्वार खोलेगा। कोई वजह ही है कि सब जानने वालों ने दुख की अपेक्षा सुख से सतर्क रहने की चेतावनी दी है। किसी ने भी आपसे ये नहीं कहा कि अरे, दुख आये तो बिलकुल सतर्क हो जाना! ख़तरा है! किसी ने नहीं कहा।

लेकिन ये चेतावनी आपको बार-बार दी गयी है कि सुख जब आए तो होश मत खो देना, देखना कि क्या चीज़ है ये। सावधान!

"जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होय।"

सुख है गड़बड़। सारी गड़बड़ सुख में होती है, सारी गड़बड़ ओछे सुख में होती है। सुख यदि आनन्द का दूसरा नाम है तो सुख पूजनीय है। सुख के अलावा जीवन का कोई लक्ष्य ही नहीं है। अगर सुख माने आनन्द तो। अगर सुख माने वो जो मन को मिलता है सच की संगत में, तो सुख से ऊँचा लक्ष्य कोई जीवन का हो ही नहीं सकता। बिलकुल मानते हैं हम ये। अगर सुख की परिभाषा है वो जो मन को मिलता है जब वो सच के सम्मुख आ जाता है, तो हम कह रहे हैं सबको सुख का ग्राहक और खोजी होना चाहिए।

पर हमारे लिए सुख वो नहीं होता न जो सत्य के साथ मिलता है। हमारे लिए सुख वो होता है जो छोटी-मोटी कामना की पूर्ति पर मिलता है। ऐसा सुख ख़तरनाक है। ऐसे ही सुख के लिए कहा फिर कि "जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होए।"

झूठे सुख से सावधान!

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