हम छोटे-मोटे उत्सव करके सोचते हैं कि हमे खुशी मिल गई; काश कि मिली होती। ये बड्डे-गड्डे में ताली बजाने से खुशी नहीं मिलती, एक समस्या ज़रूर खड़ी हो जाती है — आप अपने आप को जता लेते हो कि आपको खुशी मिल गई। इंसान को वरदान ये मिला है कि उसे खुशी मिलेगी तो ऊँची मिलेगी। और अभिशाप ये मिला है कि उस ऊँची खुशी के लिए उसे दाम भी ऊँचा चुकाना पड़ेगा। दाम ये है कि अपनी कमज़ोरियों से जूझ जाओ, उनके विरुद्ध संघर्ष करो।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी! सामान्यतः ये देखा जाता है कि समाज में लोग छोटी-छोटी खुशियों को बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं, चाहे वो किसी का जन्मदिन हो, चाहे शादी हो, चाहे किसी की उन्नति हुई हो। और आपके जब विडियोज़ देखते हैं इन विषयों पर तो थोड़ा-बहुत नकारात्मक-सा लगता है, डिस्करेजमेंट (उत्साहभंग) होता है कि शादी में बुराई है, जन्मदिन मनाने में बुराई है। तो मैं जानना चाहता हूँ कि इन छोटी-छोटी खुशियों का क्या मूल्य है?
आचार्य प्रशांत: सीधा सवाल ये है कि आप हमें खुशियाँ मनाने क्यों नहीं देते, आपको हमारी खुशियों से क्या तकलीफ़ है? 'सर, हम खुशियाँ मना रहे होते हैं तो उसमें आप इतनी आपत्ति क्यों करते हो? चाहे वो शादी की खुशी हो या जन्मदिन वग़ैरा की खुशी हो। तो हमें खुशियाँ मनाने दीजिए। जिन भी चीज़ों में एक आम आदमी को सुख मिलता है, आचार्य जी, आप उनमें खोट-दोष क्यों निकालते हो? हमें खुश हो लेने दो न! हमारी खुशी के मौक़े पर आपको क्या तकलीफ़ है?' ये सवाल है।
आपकी खुशी के मौक़े से मुझे ये तकलीफ़ है कि मैं उसमें आपको कहीं भी खुश नहीं देखता। आप उस उत्सव में, उस समारोह में सेलिब्रेशन में — एनिवर्सरी, बर्थडे जो भी आप कर रहे हो पार्टी —आप खुश हो नहीं न, उसमें। समस्या सारी ये है कि आप बस घोषणा कर रहे हो कि ये खुशी का मौका है, कि इस उत्सव में सब खुश हैं। मुझे दिखाओ वहाँ खुश है कौन। मैं भी इन




