
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आज दीवाली है, मेरे मन में ये प्रश्न आ रहा है कि क्या हम त्योहारों को उनके सही अर्थों में मनाते भी हैं या नहीं?
आचार्य प्रशांत: अगर धर्म वास्तव में ये है - ईमानदार, बोधपूर्ण, एकांत तो ये दिन (त्योहार) हमें और धार्मिक बनाते हैं या…

















लोकोऽपि तावदेव भोजनादि- व्यापारस्त्वाशरी रधारणावधि।।१४


पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम्। इह संसारे बहुदुस्तारे कृपयापारे पाहि मुरारे।।



सेई तुधुनो गावही जो तुधु भावनी रते तेरे भगत रसाले।।

प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल फिर से मृत्यु के ऊपर ही है। आम ज़िन्दगी में जीवन के बारे में बोला जाता है कि जीवन आनन्द है या जीवन यह है, पर इसमें मृत्यु की कोई बात नहीं आती। जैसे आध्यात्मिकता में भी आप देखें तो लोगों ने मृत्यु पर ज़्यादा चर्चा नहीं

कुरबाणु कीता तिसै विटहु, जिनि मोहु मीठा लाइआ ॥ – गुरु नानक

प्रश्नकर्ता: सर नमस्कार! रामायण और महाभारत में जो कहानियाँ हैं, क्या वो सत्य घटनाओं पर आधारित हैं?




प्रश्नकर्ता: मन में हमेशा एक ऐसा विचार आता है, मतलब कई बार; पिछले बार कई बार पढ़ा उसके हिसाब से, कि अगर कहते हैं, "होइहै वही जो राम रचि राखा", तो क्या मतलब ये अध्यात्म में ऐसा मानें कि आत्मा-परमात्मा अलग रहे बहुकाल? तो ये ऐसा होता ही है मतलब

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सांसारिक दृष्टि से, श्रीकृष्ण को सोलह गुणों का धनी माना जाता है और श्रीराम को बारह गुणों का धनी माना जाता है, ऐसा क्यों? उनमें क्या कोई भेद है?






प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, दिवाली के अवसर पर देशभर से लोग यहाँ पर आपके साथ दीवाली मनाने के लिए उपस्थित हैं। उन्होंने अपने प्रश्न भेजे हैं। पहला प्रश्न है- प्रणाम आचार्य जी, कलयुग में रावण के मोक्ष का मार्ग क्या है? त्रेता में हरि के हाथों मृत्यु पाकर रावण पार

प्रश्नकर्ता: पिछले बाईस वर्षों से मैं एक साधना कर रहा था। अब ऐसा लगता है कि मैं ग़लत रास्ते पर साधना कर रहा था। तो इस संबंध में एक चौपाई आयी है कि शिव जी कहते हैं कि,

आचार्य प्रशांत: मन को अगर कुछ भाएगा नहीं तो मन जाने के लिए, हटने के लिए तैयार नहीं होगा। मन हटता ही तभी है जब उसे ऐसा कोई मिल जाता है जो एक सेतु की तरह हो: मन के भीतर भी हो, मन उसे जान भी पाए, मन उसकी प्रशंसा



नाम राम को अंक है, सब साधन है सून।
अंक गए कुछ हाथ नहिं, अंक रहे दस गून।।


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या प्रभु श्रीराम को भी सामान्य व्यक्ति की तरह दुःख का अनुभव होता था?
आचार्य प्रशांत: प्रश्न है कि अनेक कहानियाँ कहती हैं कि राम को भी चोट लगती थी। ख़ास तौर पर सीता के वन-गमन के पश्चात राम भी उदासी में जीने लगे थे। मानने वालों…


हनुमान चालीसा की शुरुआत ही, "जय हनुमान ज्ञान गुन सागर" से होती है। पहला ही शब्द 'ज्ञान' है। जब ज्ञान रहता है, तो ये भूत-प्रेत आदि व्यर्थताएँ दिमाग़ में आती ही नहीं। भूत-पिशाच आदि का कोई अस्तित्व नहीं होता, लेकिन जिसका अंधविश्वास है कि भूत-प्रेत तो होते ही हैं, उसको संतों ने कहा कि हनुमान जी का जाप करोगे तो भूत-प्रेत निकट नहीं आएँगे। हनुमान, श्रीराम तक पहुँचने का साधन हैं। एक बार श्रीराम के निकट आ जाओगे, तो अंधविश्वास से स्वयं ही मुक्त हो जाओगे।
जैसे शरीर को पोषण देते हैं, वैसे ही मन को पोषण दीजिए। फ़िल्म देखने से मन को पोषण नहीं मिल जाना है, मैच देखने से नहीं मिल जाना है। पार्टी करने से, ख़रीददारी करने से भी नहीं मिल जाना है। जहाँ मिलना है, वहाँ जाइए। वो मैंने करा है, इसीलिए आपसे बड़े अधिकार और बड़े विश्वास के साथ कहता हूँ कि आप भी करिए।
मन जिस आयाम को देख सकता है, वो द्वैत का ही आयाम है। वहाँ उसे वो नहीं मिलता जिसकी उसे तलाश है। हमको तलाश तो सत्य की ही है, पर तरीके अनुचित हैं, क्योंकि हम होश में नहीं है। गुरु तुम्हें कुछ देता नहीं है, वो सिर्फ़ इशारा करता है कि गलत जगह खोज रहे हो। तलाश तो तुम्हारी सपना टूटने पर ही बुझेगी।
ये युग, मूल्यों के संक्रमण का युग है। मूल्य संकुचित होते जा रहे हैं और राम जिन मूल्यों के प्रतिनिधि हैं, वो मूल्य हमें नहीं पसंद आने वाले भाई! कदम-कदम पर राम, कर्तव्य पर चलते हैं। वो ये नहीं देखते कि उन्हें लाभ क्या होगा? वो ये नहीं देखते कि उन्हें सुख, खुशी, प्रसन्नता मिलेगी कि नहीं मिलेगी। वो ये देखते हैं कि कर्तव्य क्या है ये बताओ? मैं तो अपने कर्तव्य का पालन करूँगा। आज कौन अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहता है? तुम अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करना चाहते तो राम क्यों अच्छे लगेंगे तुमको?
आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) कह रहे हैं कि आप कहते हैं कि महिलाओं का कमाना उनकी आन्तरिक और भौतिक प्रगति के लिए ज़रूरी है, पर हमारी प्राचीन देवियाँ जैसे माँ सीता, देवी अनुसुइया, यहाँ तक कि साध्वियाँ जैसे मीराबाई भी कभी कमाती तो नहीं थीं, तो क्या वो सब…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मेरा प्रश्न युग के बारे में है। जैसे हम पढ़ते हैं, चार युग होते हैं– सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग। और जो एक युग होता है उसको लगभग लाखों वर्षों का मानते हैं। जबकि एस्ट्रोफिजिक्स (खगोल भौतिकी) के अनुसार जो स्टार्स (तारों) की पोजीशन (स्थिति) है,…
संजोगु विजोगु दुइ कार चलावहि लेखे आवहि भाग। ~ जपुजी साहिब (नितनेम)
आचार्य प्रशांत: फ़्री विल (मुक्त इच्छा) भी एब्सोल्यूट्ली फ़्री (पूर्णत: मुक्त) है। आपकी जो फ़्री विल है, वो भी इस मामले में तो बाउन्डेड (सीमित) है ही कि वो आपकी नहीं है। जो आपकी इच्छा है वो तो…
गुर परसादी हरि मंनि वसिआ पूरबि लिखिआ पाइआ।।
~ नितनेम (अनंदु साहिब)
बाइ गुरुज़ ग्रेस द लॉर्ड अबाइड्स विदिन द माइंड, एंड वंस प्री-ऑर्डेंड डेस्टिनी इज़ फ़ुलफ़िल्ड।
“गुरु के अनुग्रह से ईश्वर मन में बसता है, और व्यक्ति पूर्वनिर्धारित नियति को प्राप्त कर लेता है।”
प्रश्नकर्ता: ग्रेस (अनुग्रह) और प्री-ऑर्डेंड…
वजाइया वाजा पउण नउ दुआरे परगट कीए दसवा गुपतु रखाइआ।। ~ नितनेम (अनंदु साहिब)
आचार्य प्रशांत: ‘आनन्द साहिब’ से है कि उसने शरीर के वाद्य यन्त्र में साँस फूँकी और नौ द्वार खोल दिये लेकिन दसवें को छुपाकर रखा। दसवाँ द्वार कौनसा है? कौनसा हो सकता है दसवाँ द्वार? मन…
विणु गुण कीते भगति न होई। अर्थ: बिना गुण के भक्ति नहीं हो सकती। (जपुजी साहिब)
आचार्य प्रशांत: आप दीवार के पास बैठे हैं और आप ऊँघ जाते हैं और आपके सिर पर दीवार लगती है ज़ोर से। क्या आप दीवार से कहते हो कि कमीनी मेरे ही घर की…
दुख विसारणु सेविआ सदा सदा दातारु ~ शबद हज़ारे (नितनेम)
मैं उसकी सेवा करता हूँ, जो मेरे सारे दुखों को विस्मृत कर देता है और जो सदा-सदा से देने वाला है।
आचार्य प्रशांत: मैं उसकी सेवा करूँगा, करता हूँ, जो मेरे सारे दुखों को विस्मृत कर देता है और जो…
”हुकमी हुकमु चलाये राहु।” ~ जपुजी साहिब
आचार्य प्रशांत: वो अपने हुक्म से राह पर चलता है। राह तो सामने ही है। जहाँ खड़े हो, वहीं से चलती है। हुक्मी स्वभाव ही है, तो कहीं दूर जाना नहीं है पूछने। हुक्म तब भी उल्टा-पुल्टा हो जाता है, क़दम फिर इधर-उधर…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। कई भ्रांतियाँ मैंने देखी है कि फैली हुई हैं। जैसे कि उत्तरकांड को बहुत से लोग रामायण का हिस्सा नहीं मानते। कहते हैं, रामायण युद्धकांड पर समाप्त हो जाती है, वाल्मीकि जी ने उससे आगे उसको नहीं कहा था।
ऐसे ही कुछ सनातन धर्म पर आक्षेप…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। कल का सत्र बहुत अच्छा था और जब सत्र में जुड़ने करने के लिए हम आवेदन करते हैं, मेल भेजते हैं, उसमें सबसे पहला सवाल पूछा जाता है कि आपकी अपेक्षा क्या है सत्र में भाग लेने से? मेरी जो अपेक्षा थी, वो पहले दस मिनट…
आचार्य: हर शब्द का अपना एक माहौल होता है, एक पृष्ठभूमि होती है, वो कहाँ से आ रहा है। तो जब मन में बहुत कुछ भरा रहे, संसार बहुत अर्थपूर्ण लगे तब शून्यता शब्द की प्रासंगिकता है।
जब लगे कि आगे-पीछे जो कुछ है, ऊपर-नीचे जो कुछ है, स्मृतियों में…
प्रश्नकर्ताः तुलसीदास जी ने कहा है : 'नहिं कलि करम न भगति बिबेकू, राम नाम अवलंबन एकू।' आपका भी वीडियो सुना जहाँ कहीं भी राम नाम का शीर्षक मिला कि राम नाम एक ऐसी चीज़ है जो निराकार और साकार दोनों के बीच का है। तो मैं बच्चों को ये…
आचार्य प्रशांत: जी, स्वागत है! बताइए।
प्रश्नकर्ता: नमस्कार, सर। कल मेरी एक ऑनलाइन प्रतिभागी सोमेश जी से बात हो रही थी, तो मैंने पूछा कि आज की कार्यशाला के लिए उनका प्रश्न क्या है। एक अजीब-सी बात उन्होंने कही कि आचार्य जी ने गीता पर जो चर्चा करी है उससे…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते, सर। मैं शायद उत्तर भारत के जो करोड़ों लोग हैं, उनमें से ही एक हूँ जिन्हें बचपन से ही हनुमान चालीसा सुन-सुन कर याद हो जाती है या याद करा दी जाती है। पर मैंने देखा कि हाल ही तक ही मुझे हनुमान चालीसा की जो चौपाइयाँ हैं,…
प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल ये है कि बहुत सारी कहानियों में, जैसे राम और कृष्ण की कहानी हम पढ़ते हैं या कोई और भी। इन अवतारों को बचपन से ही बहुत ऐसे दिखाया जाता है कि इनमें बचपन से ही सारे गुण थे, या ये बचपन से ही अच्छे थे, निपुण…
भिन्न-भिन्न लोकों…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नितनेम साहिब ग्रन्थ को ध्यान में रखते हुए आज का मनुष्य समय में रहते हुए समयातीत को कैसे याद रख सकता है?
आचार्य प्रशांत: कह रहे हो समय में रहते हुए समयातीत को कैसे याद रखें? समय परेशान करेगा इसलिए समयातीत को याद रखना पड़ेगा; समय ही…
हे परमपूज्य परमात्मा! मुझे अपनी शरण में ले लो। मैं इस जन्म और मृत्यु के चक्कर से मुक्ति प्राप्त करना चाहता हूँ। मुझे इस संसार रूपी विशाल समुद्र को पार करने की शक्ति दो ईश्वर।
~ भज…
सोचै सोचि न होवई जे सोची लख वार ॥ चुपै चुप न होवई जे लाइ रहा लिव तार ॥ भुखिआ भुख न उतरी जे बंना पुरीआ भार ॥ सहस सिआणपा लख होहि त इक न चलै नालि ॥ किव सचिआरा होईऐ किव कूड़ै तुटै पालि ॥ हुकमि रजाई चलणा नानक…
आचार्य प्रशांत: केंद्रीय बात क्या है?
श्रोता: हर एक नश्वर चीज़ों से, पदार्थों से, व्यक्तियों से हमारा नाता है, तो मृत्यु का भय तो रहेगा?
आचार्य प्रशांत: वो नाता जो है उसको सिर्फ़ नीति के आधार पर नहीं अनुचित ठहराया जा रहा। वो नाता भूल है। वो नाता होना ही…
सुणिऐ सिध पीर सुरि नाथ ।। सुणिऐ धरति धवल आकास ।। सुणिऐ दीप लोअ पाताल ।। सुणिऐ पोहि न सकै कालु ।। नानक भगता सदा विगासु ।। सुणिऐ दूख पाप का नासु ।।८।।
सुणिऐ ईसरु बरमा इंदु ।। सुणिऐ मुखि सालाहण मंदु ।। सुणिऐ जोग जुगति तनि भेद ।। सुणिऐ…
जो तुझे भाते हैं वही तुझे गाते हैं। तेरे भक्त तेरे रस में डूबे होते हैं।
~ जपुजी साहिब
आचार्य प्रशांत: पहली पंक्ति का अनुवाद ये है, 'जो तुझे भाते हैं वही तुझे गाते हैं।' "रते तेरे भगत रसाले" —…
मोह हमेशा कड़वा होता है। मोह का अर्थ है अपने से बाहर किसी से…
उदाहरण के लिए - कोई एक घर से निकला और सड़क का इस्तेमाल करके आधे किलोमीटर दूर किसी दूसरे…
सभ महि जोति जोति है सोइ
सब में प्रकाश है
~ सोहिला (नितनेम)
आचार्य प्रशांत: कल दोपहर जब हम लौट रहे थे कॉलेज से तो गाड़ी में कृष्ण कुछ बातें कह रहे थे, फिर मैंने सी.डी. प्लेयर बन्द कर दिया। जब तक वो जो कह रहे थे, वो चल रहा…
अपना जान करो प्रतिपारा॥
~ चौपाईसाहब (नितनेम)
अर्थात, हे! अकाल पूरक, अपना हाथ देकर मेरी रक्षा करो। मेरी मन की यह इच्छा आपकी कृपा द्वारा पूरी हो कि मेरा मन सदा आपके चरणों में जुड़ा…
रामहि डरु करु राम सों ममता प्रीति प्रतीति।
तुलसी निरुपधि राम को भएँ हारेहूँ जीति।।
~ संत तुलसीदास
आचार्य प्रशांत: ध्यान देना होगा! कुछ ऐसा है यहाँ पर जो आपको चौंका सकता है।
राम से ही डरो! हो राम से ही ममता-प्रीत और राम ही हों सर्वत्र प्रतीत। तुलसी निरुपधि…
आचार्य प्रशांत: कुछ टूटेगा। या इधर टूटेगा या उधर टूटेगा।
पर हम बड़े होशियार लोग हैं, जैसे स्ट्रैटजी…
प्रश्नकर्ता: ज्योति दिये की दूजे घर को सजाए का क्या अर्थ है?
आचार्य प्रशांत: बिल्कुल सही जगह उंगली रखी है यही सवाल पूछने लायक है। बढ़िया!
गहरा ये भेद कोई मुझको बताए
किसने किया है मुझपर अन्याय
जिसका ही दीप वो बुझ नहीं पाए
ज्योति दिये की दूजे घर को…
तुलसी यह सुनि समुझि हियँ
आनु धरें धनु बान।।
~ संत तुलसीदास
आचार्य प्रशांत: जान कर के जान जाएँगे आप और बिना जाने कौन जानेगा? तुलसी खेल रहे हैं, मानो चुनौती-सी दे रहे हैं। कह रहे हैं- अब ये सुनो और समझो और…
उमा कहूँ मैं अनुभव अपना।
सत हरि भजन जगत सब सपना।।
आचार्य…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं ध्यान नहीं करती। आँखें तो बंद हैं ही, और बंद करके क्या फ़ायदा? कोई साधना भी नहीं करती। साधना और साध्य यदि दो हैं तो गोल-गोल चक्कर काटने से क्या फ़ायदा? बस सत्संग देखना-सुनना, साहित्य पढ़ना, राम कथा, भागवत कथा भाव से सुनना-देखना—इन सब में शांति…
ज्यों जग बैरी मीन को आपु सहित बिनु बारि। त्यों तुलसी रघुबीर बिनु गति आपनी बिचारि।। ~ संत तुलसीदास
आचार्य प्रशांत: तुलसी का अंदाज़ ज़रा नर्म है। वो इतना ही कह रहे हैं कि मीन का समस्त जग बैरी है, यहाँ तक कि वह स्वयं भी अपनी बैरी है। वो…
~ संत तुलसीदास
आचार्य प्रशांत: तुमने अपनी ज़िंदगी में जो इकट्ठा किया है, सब ‘सून' है। अब सून को सूना मानो चाहे शून्य मानो—असल में दोनों एक ही धातु से निकलते हैं।…
~ संत तुलसीदास
आचार्य प्रशांत: विचित्र लीला है। कहीं से आते नहीं हम और न कहीं को चले जाते हैं। मध्य में वो है जिसे हम कहते हैं कि 'हम' हैं। जन्म से पहले तुम…
जद्यपि जनमु कुमातु तें, मैं सठु सदा सदोस।
आपण जानि न त्यागहहिं, मोहि रघुबीर भरोस।।
~ संत तुलसीदास
आचार्य प्रशांत: कोई-कोई ही नहीं होता जिसका जन्म कुमाता से होता है। अगर आप इस श्लोक को सिर्फ प्रकरण के संदर्भ में देखेंगे तो आपको ऐसा लगेगा जैसे कि किसी पात्र-विशेष ने…
आचार्य प्रशांत: इतना तो हम सभी जानते हैं कि राम के स्पर्श ने रामबोला को तुलसीराम और तुलसीराम को तुलसीदास बना दिया। लेकिन याद रखना होगा कि जैसा भक्त होता है, वैसा ही उसका भगवान भी होता है। भगवान तो भक्त को रचता ही है, भक्त के हाथों भी भगवान…