सभ महि जोति जोति है सोइ
सब में प्रकाश है
~ सोहिला (नितनेम)
आचार्य प्रशांत: कल दोपहर जब हम लौट रहे थे कॉलेज से तो गाड़ी में कृष्ण कुछ बातें कह रहे थे, फिर मैंने सी.डी. प्लेयर बन्द कर दिया। जब तक वो जो कह रहे थे, वो चल रहा था, तब तक मेरे पड़ोस की सीट पर लोग सो रहे थे। जब मैंने बन्द कर दिया तो अचकचा कर उठ गये, ‘कुछ बदला? कुछ हुआ क्या?’ मैंने कहा, ‘कुछ नहीं, अभी मौक़ा नहीं है, सो ही लो।’
कृष्ण जो कह रहे थे, वो इतना क़ीमती था कि मैं नहीं चाहता था कि वो बात बीत जाए, इसको रोक दो। कृष्ण कह रहे थे कि तुम जिन देवताओं की उपासना करते हो, मैं ही वो हूँ जो उनमें तुम्हारी श्रद्धा को स्थापित करता हूँ। याद रखना, पूजा तुम देवताओं की कर रहे हो, देवताओं में कोई बात नहीं, देवता नकली हैं। हर देवता नकली है, किसी देवता का सत्य से कोई सम्बन्ध नहीं। लेकिन सत्य हो या असत्य, तुम्हारी यदि उसमें श्रद्धा है, वो अपनेआप में बड़ी बात है।
‘मैं वो हूँ जो मूर्त में भी तुम्हारी श्रद्धा को स्थापित करता हूँ।’
तो तुम कहोगे भले ये कि मैं फ़लाने देवता की पूजा करता हूँ लेकिन वास्तव में तुम पूजन मेरा (कृष्ण का) ही कर रहे हो क्योंकि तुम्हें उस देवता से जोड़ने वाला मैं ही हूँ। जिस किसी ने भी आज तक किसी से भी सच्चा सम्बन्ध जोड़ा है — प्रेम का हो कि सत्य का हो कि श्रद्धा का हो — वो सम्बन्ध एक से ही जोड़ा है। रूप अलग हो सकते हैं, मूर्ति अलग हो सकती है, पर सत्य एक ही होता है। सच्चा सम्बन्ध एक ही होता है।






