माँ के गर्भ को, और जन्म लेने को, दुःख क्यों माना गया? || आचार्य प्रशांत, आचार्य शंकर पर (2019)

पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम्। इह संसारे बहुदुस्तारे कृपयापारे पाहि मुरारे।।
हे परमपूज्य परमात्मा! मुझे अपनी शरण में ले लो। मैं इस जन्म और मृत्यु के चक्कर से मुक्ति प्राप्त करना चाहता हूँ। मुझे इस संसार रूपी विशाल समुद्र को पार करने की शक्ति दो ईश्वर।
~ भज गोविंदम, श्लोक संख्या २१
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, भज गोविन्दम में ही एक और श्लोक है जिसमें कहते हैं
आचार्य प्रशान्त: है यहाँ पर?
प्र: हाँ, इक्कीसवाँ श्लोक है पेज नौ पर। "पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम्" तो यह जननी, जो वॉम्ब (गर्भ) की बात कर रहे हैं वो काव्यात्मक रूप से बता रहे हैं या?
आचार्य प्रशांत: दोनों तरीक़े से; अगर व्यक्तिगत तौर पर देखो तो माँ के गर्भ की बात हो रही है और अगर जीव के तौर पर देखो तो प्रकृति की बात हो रही है, माया की बात हो रही है।






