हनुमान चालीसा की शुरुआत ही, "जय हनुमान ज्ञान गुन सागर" से होती है। पहला ही शब्द 'ज्ञान' है। जब ज्ञान रहता है, तो ये भूत-प्रेत आदि व्यर्थताएँ दिमाग़ में आती ही नहीं। भूत-पिशाच आदि का कोई अस्तित्व नहीं होता, लेकिन जिसका अंधविश्वास है कि भूत-प्रेत तो होते ही हैं, उसको संतों ने कहा कि हनुमान जी का जाप करोगे तो भूत-प्रेत निकट नहीं आएँगे। हनुमान, श्रीराम तक पहुँचने का साधन हैं। एक बार श्रीराम के निकट आ जाओगे, तो अंधविश्वास से स्वयं ही मुक्त हो जाओगे।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरा नाम शांतनु है और इसी सत्र के दौरान किन्हीं ने चर्चा की थी हनुमान चालीसा के ऊपर कि उन्होंने हनुमान चालीसा पढ़ी है बचपन में। मैंने भी हनुमान चालीसा पढ़ी है और बहुत सारे लोग होंगे जिन्होंने पंक्ति-दर-पंक्ति हनुमान चालीसा को एकदम याद कर लिया है।
तो उसमें एक पंक्ति है: "भूत पिसाच निकट नहिं आवै, महाबीर जब नाम सुनावै।" तो आपने तो भूत-पिशाचों का खंडन किया है कि ये तो नहीं होते हैं। तो यहाँ पर तुलसीदास जी क्या कहना चाहते हैं कि कौन से भूत-पिशाच हैं?
आचार्य प्रशांत: नहीं, भूत-पिशाच आपके पास निकट कैसे आते हैं? जहाँ भूत-पिशाच आपके पास निकट आते हैं, जिस जगह पर निकट आते हैं, उस जगह पर वो नहीं आएँगे जब महावीर का नाम आप सुमिरन करेंगे तो। भूत-पिशाच आपके पास कहाँ पर आते हैं? मन में आते हैं। वहाँ नहीं आएँगे।
भूलिएगा नहीं कि शुरुआत ही होती है, "जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।" पहला शब्द क्या है — ज्ञान। जब ज्ञान रहता है तो ये भूत-प्रेत और इस तरह की व्यर्थताएँ दिमाग़ में आती ही नहीं। इनका कोई अस्तित्व तो होता ही नहीं है न। फिर भी ये आपको बड़ा परेशान करते हैं।







