सुणिऐ सिध पीर सुरि नाथ ।। सुणिऐ धरति धवल आकास ।। सुणिऐ दीप लोअ पाताल ।। सुणिऐ पोहि न सकै कालु ।। नानक भगता सदा विगासु ।। सुणिऐ दूख पाप का नासु ।।८।।
सुणिऐ ईसरु बरमा इंदु ।। सुणिऐ मुखि सालाहण मंदु ।। सुणिऐ जोग जुगति तनि भेद ।। सुणिऐ सासत सिम्रिति वेद ।। नानक भगता सदा विगासु ।। सुणिऐ दूख पाप का नासु ।।९।।
सुणिऐ सतु संतोखु गिआनु ।। सुणिऐ अठसठि का इसनानु ।। सुणिऐ पड़ि पड़ि पावहि मानु ।। सुणिऐ लागै सहजि धिआनु ।। नानक भगता सदा विगासु ।। सुणिऐ दुख पाप का नासु ।।१०।।
सुणिऐ सरा गुणा के गाह ।। सुणिऐ सेख पीर पातिशाह ।। सुणिऐ अंधे पावही राहु ।। सुणिऐ हाथ होवै असगाहु ।। नानक भगता सदा विगासु ।। सुणिऐ दुख पाप का नासु ।।११।।
~ जपजी साहिब (पौड़ी ८)
आचार्य प्रशांत: "सुणिऐ दुख पाप का नासु" — सुनना काफ़ी है। हज़ार प्रक्रियाएँ हो सकती हैं उस एक स्थिति को पाने की जिसे कभी मन की शान्ति कहते हैं, कभी परम की प्राप्ति कहते हैं, कभी बोध कहते हैं, कभी प्रेम कहते हैं, कभी आनन्द और कभी मुक्ति कहते हैं। वहाँ तक जाने की इंसान की सदा से इच्छा रही है।






