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सीधे चल कर भी वहीं पहुँचोगे, और ठोकरें खा-खा कर भी || आचार्य प्रशांत, गुरु नानक पर (2014)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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सेई तुधुनो गावही जो तुधु भावनी रते तेरे भगत रसाले।।

जो तुझे भाते हैं वही तुझे गाते हैं। तेरे भक्त तेरे रस में डूबे होते हैं।

~ जपुजी साहिब

आचार्य प्रशांत: पहली पंक्ति का अनुवाद ये है, 'जो तुझे भाते हैं वही तुझे गाते हैं।' "रते तेरे भगत रसाले" — तेरे भक्त तेरे रस में डूबे रहते हैं। प्रतीत तो कुछ ऐसा हो रहा है ज्यों अस्तित्व भेद करता हो, कि चुनता हो, कि कहता हो कि कौन मुझे भाता है और कौन मुझे नहीं भाता है। और यदि शाब्दिक अर्थ पर अटक गये तो ऐसा ही लगेगा, जो नानक कह रहे हैं, कि जो तुझे भाते हैं वही तुझे गाते हैं।

बात ऐसी नहीं है, बात उल्टी है। उसको सब भाते हैं। उसको सब भाते हैं, उसकी ओर से भेद नहीं है। फिर प्रश्न ये उठता है कि उसकी ओर से भेद नहीं है तो दुनिया में इतना भेद क्यों है। फिर कोई आनन्द में और कोई कष्ट में क्यों हैं? फिर कोई होश में और कोई बेहोश क्यों है? यदि उसकी अनुकम्पा सब पर है तो दुनिया में इतना वैविध्य कहाँ से आ गया?

वो परम मुक्त है। परम मुक्ति में मात्र खेल होता है और खेल भी उसका पूरा-पूरा मुक्त है। हम भी मुक्त हैं, उससे अलग तो हैं नहीं। जो मुक्त से आ रहे हैं तो हमारा भी मुक्त होना पक्का। हम भी इतने मुक्त हैं, इतने मुक्त हैं कि बेहोश रहने के लिए भी मुक्त हैं (मुस्कुराते हुए)। हमें पूरी आज़ादी है मूर्खताएँ करते रहने की। मुक्त की औलाद हैं, मुक्ति हमारा स्वभाव है। उसी मुक्ति, उसी असीमित मुक्ति का एक अनिवार्य हिस्सा ये भी है कि हम अपनेआप को बन्धक अनुभव करते रहने के लिए भी मुक्त हैं। हम ये मानते रहने के लिए भी मुक्त हैं कि हम बन्धन में हैं।

ये हमारे तमाम बन्धन हमारी मुक्ति का प्रमाण हैं। ठीक वैसे ही जैसे कि अन्धेरे को देख पाना भी ये बताता है कि तुम्हारी आँखों में रोशनी है। आँखों में रोशनी न होती तो अन्धेरा कैसे देख पाते। दिख रहा है अन्धेरा ही, पर वो प्रमाण तुम्हारी रोशनी का है। दिख रहे हैं तुम्हें बन्धन ही, पर वो प्रमाण हैं तुम्हारी मुक्ति के। कर्मफल का नियम बस साथ चलता रहता है। पूरी तरह मुक्त हो, खेलो, जो चाहे करो, जो चाहे विचारो, मन जिस दिशा में चाहे दौड़े, बस कर्मफल का नियम नहीं तोड़ा जाएगा। मन पर वही एकमात्र नियम है जो लागू होता है। कारणों की रचना करोगे तो कार्य होकर रहेगा।

समय की धारा है, इसमें जो एक स्थान पर डालोगे वो बहते-बहते दूसरे स्थान पर पहुँचेगा। समय धारा है और कर्मफल का नियम यही कहता है कि इस धारा में जो यहाँ डाला वो वहाँ पहुँच कर रहेगा। तुम ये उम्मीद नहीं कर सकते कि यहाँ तो डाल देंगे और वहाँ नहीं पहुँचेगा। डालो, जो डालना चाहते हो डालो, पर याद रखना तुम इसी धारा के साथ संयुक्त हो। इसी धारा को तुमने 'मैं' का नाम दिया है। समय की इसी धारा को तुम 'मैं' बोलते हो, यही जीवन है। जीवन क्या है? समय की पूरी एक धारा। इस धारा में तुम ही डालने वाले हो और तुम ही पीने वाले हो।

आमतौर पर नदियों में आप यहाँ पर डालकर सोचते हो कि अच्छा, अब आगे बह जाएगा, हमें थोड़े ही पीना है। समय की धारा कुछ ऐसी है कि आप ही यहाँ डाल रहे हैं और आप ही उसको आगे पी भी रहे हैं तो सोच-समझकर डालिए कि क्या डाल रहे हैं। पीना पक्का है क्योंकि आपकी ही धारा है, इसी धारा का नाम है मन, इसी धारा का नाम है 'मैं'। यही समय है।

पूर्ण मुक्त से मुक्त ही आता है और हम मुक्त हैं। हमारी ही मुक्ति हमें बख़्शी गयी है हमारे होश के रूप में। होश की क्षमता सबके पास है। जो जब चाहे उसका प्रयोग कर सकता है। पूरी मुक्ति है आपको कि इसी क्षण आप ध्यान में उपस्थित हो जाएँ, ये फ़ैसला है आपका। आप कोई मशीन नहीं हैं। आपकी चेतना का, आपकी मुक्ति का प्रमाण है ध्यान। आप अभी चाहें, आप ध्यानस्थ हो सकते हैं। आप अभी चाहें, आप भटक सकते हैं, आप बहक सकते हैं, आप इधर-उधर का विचार करना शुरू कर सकते हैं।

उसने ध्यान की क्षमता देकर के अपना काम कर दिया है, आगे की कहानी तुम जानो। श्रद्धा यही जानने का नाम है कि वो जो हमें ऊँचे-से-ऊँचा दे सकता था वो उसने दे ही दिया है; वो है होश, वो है मेरी जानने की क़ाबिलियत। वो क़ाबिलियत मेरे पास सदा उपलब्ध है। मैं अभी चाहूँ, मैं अभी सतर्क होकर के ध्यान की प्रक्रिया शुरू कर सकता हूँ। मैं अभी चाहूँ, मैं अभी प्रमादी होकर के पत्थर बन सकता हूँ, सो सकता हूँ।

प्रश्नकर्ता: पर गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि तुम्हारी नियति एक ही है। नियति और कर्मफल में क्या भेद है?

आचार्य: कर्मफल और नियति एक हैं। लेकिन कर्मफल या नियति जिसके ऊपर काम करता है वो बदल सकता है। हमने कहा था, समय की ये जो धारा है यही मन है। फिर हमने ये कहा कि समय की ये जो धारा है यही 'मैं' है। समय की धारा ही 'मैं' रहे या मन रहे ये आवश्यक नहीं है। 'मैं' कुछ और भी हो सकता है।

गीता से ही उद्धरण लेते हैं कि क्या कह रहे हैं कृष्ण। कह रहे हैं कि या तो समय की धारा में क़ैद रहो, और वो धारा भी मेरी ही है, या उस धारा से मुक्त होकर के सीधे तुम मेरे पास आ जाओ। दोनों ही स्थितियों में हो तुम मेरे ही प्रभाव में। दोनों ही स्थितियों में मेरे अतिरिक्त कहीं कुछ और नहीं है। पर तुम्हें पूरी मुक्ति है कि तुम रास्ता कौनसा चुनते हो। एक रास्ता है कि कर्मफल की धारा में क़ैद हूँ। एक रास्ता है कि मैं कर्मफल से ऊपर ही उठ गया, और वही कर्मफल से मुक्ति कहलाती है।

कर्मफल से मुक्ति का अर्थ हुआ कि हम वो हैं ही नहीं जिसने इस बिन्दु पर इस धारा में कुछ डाला था। जिसने डाला था वो उठ गया, वो मर गया, तो फल भुगतने के लिए कौन शेष रहा। ठीक, कोई था जिसने कर्म करा था पर जिसने कर्म करा था वो मर गया तो अब फल कौन भुगतेगा। और ऐसा मरा कि मुक्त ही हो गया तो अब फल भुगतने के लिए कोई शेष नहीं बचा। यही कर्मफल से मुक्ति है। इसके अलावा कर्मफल से बचने का और कोई तरीक़ा नहीं है।

समझ में आ रही है बात?

तो उसे कौन भाते हैं? उसे कौन भाएँगे? नानक कहते हैं, "जो उसे भाते हैं वो उसे गाते हैं।" उसे कौन भाएँगे? उसे सभी भाते हैं, और मैं कह रहा हूँ सभी उसे ही गा रहे हैं क्योंकि उसके अतिरिक्त और कोई है नहीं।

आप उस एक अलख को, आप उस कृष्ण को दो तरीक़े से गाते हो क्योंकि वो है ही दो तरीक़े से मौजूद। जो मन की आँखों से देखते हैं वो उसे संसार के रूप में मौजूद पाते हैं, तो वो संसार को गाते हैं। जो बोध की आँखों से देखते हैं, वो उसका निराकार-निर्गुण रूप देखते हैं तो वो उसके सार को गाते हैं। गा सभी उसी को रहे हैं।

गहरे-से-गहरा संसारी जो पदार्थ को ही पूज रहा है, जो पदार्थ की ही दौड़ में है, वो भी कृष्ण को ही गा रहा है; वो कृष्ण की माया को गा रहा है। बात समझिएगा, कोई ये न सोचे कि इस संसार में किसी और की पूजा होती है। पूज तो हम सभी उसी को रहे हैं, अन्तर रूप का है।

चौथे अध्याय में कृष्ण कहते हैं, "जो मुझे जिस रूप में भजता है, मैं भी उसे उसी रूप में भजता हूँ।" तुम्हें पदार्थ पसन्द है, मैं तुम्हारे सामने पदार्थ बनकर आऊँगा। तुम्हें सोना-चाँदी चाहिए, तुम्हें बैंक बैलेंस चाहिए, तुम्हें अपने लिए एक व्यक्तिगत हवाई जहाज़ ख़रीदना है, तुम हवाई जहाज़ को पूज रहे हो। तुम्हें क्या लगता है, हवाई जहाज़ के रूप में कौन खड़ा है? मैं ही तो खड़ा हूँ। तुम्हें भ्रम होगा कि तुम किसी और को पूज रहे हो। वो हवाई जहाज़ कौन है? वो मैं हूँ। पूजो उसे, पूरी छूट है।

दोनों रास्ते मेरे ही रास्ते हैं, तुम चुन लो तुम्हें कौनसा चाहिए। एक सीधा है कि सीधे मेरे सार तक पहुँच जाओ और मुझे ही पकड़ लो। और दूसरा चक्करदार रास्ता है, "मम् माया" — मेरी माया के फेर में पड़े रहो। पर जिधर को भी जाओगे, हमसे बचकर कहाँ जाओगे? जहाँ जाइएगा हमें पाइएगा। आप क्या सोच रहे हैं कि आप मन्दिर भर आएँगे तो ही हमारे पास आ रहे हैं? आप मन्दिर आयें कि मॉल आयें कि मदिरालय जाएँ, वो हम ही हैं जिसकी आपको कोई भी कामना हो सकती है।

तुम्हारी प्रत्येक कामना मेरी ही कामना है। समझदार हो तो सीधे मेरी कामना करोगे। बेवकूफ़ हो तो घूम-घूमकर, घूम-घूमकर चक्करदार तरीक़े से मेरे पास आओगे। आना तो तुम्हें मेरे ही पास है।

सूत्र कहता है, "जो तुधु भावनि सोई तुधु गावहि।" गा तो हम सभी रहे हैं। भक्त भी गाता है, संसारी भी गाता है। संसारी क्या गाता है? पैसा चाहिए, प्रतिष्ठा चाहिए, योजनाएँ चाहिए। और जो बोधपूर्ण है वो क्या गाता है? मात्र वो चाहिए। दोनों ही एक को ही माँग रहे हैं। एक बेहोशी में माँग रहा है, एक होश में माँग रहा है। और बेहोश हो पाना तुम्हारा चुनाव है, तुम्हारी मुक्ति का हिस्सा है। तुम्हें पूरी छूट है बेहोश रहने की।

तुम्हें छूट है बेहोश रहने की, इसका प्रमाण क्या है? कि तुम जब चाहो होश में आ सकते हो। आप इस कमरे में अभी बैठे हैं, अभी ध्यान में उतर सकते हैं। आप अभी विचार कर लें कि नहीं, मुझे बहकना है, मुझे तो दूसरी बातों का ख़याल करना है, आप बहक सकते हैं। बेहोश होना तुम्हारी छूट का हिस्सा है। लेकिन बेहोश होकर के मुझसे बच नहीं जाओगे। बेहोशी के रास्ते पर भी चलोगे तो जिस-जिस वस्तु की, व्यक्ति की भी कामना करोगे वो मैं ही हूँ। मेरे अतिरिक्त है कौन! तुम्हारी प्रत्येक कामना का विषय मैं हूँ। बाक़ी तुम जानो, सीधे-सीधे मेरी कामना करनी है या उलझ-उलझ कर करनी है।

कभी ये प्रार्थना न करिएगा कि हे परम! मेहरबानी कर, कृपा कर, अनुग्रह कर। वो मौजूद है, वो आपकी चेतना के रूप में मौजूद है। वो मौजूद न होता तो तुम प्रार्थना कैसे करते? तुम क्या बेवकूफ़ी की बात कर रहे हो! ये वैसी सी बात है जैसे कोई दौड़ता हुआ जा रहा है डॉक्टर के पास कि मेरी टाँगों को लकवा मारा हुआ है, डॉक्टर इलाज कर दो। तुम पागल हो!

तुम प्रार्थना कर रहे हो, यही इस बात का प्रमाण है कि ग्रेस (अनुकम्पा) तुम्हें मिली हुई है। अन्यथा प्रार्थना तुम करते कैसे? तुम कोई भी चुनाव कर रहे हो, तुमने चुना न? चुनने के लिए आधी-अधूरी ही सही, विकृत ही सही, आच्छादित ही सही, चेतना मौजूद थी। अन्यथा चुनाव कैसे करते?

तो अब और क्या माँग रहे हो? और क्या माँगने जा रहे हो? वो जो दे सकता था उसने दे दिया। या वो रुका हुआ है तुम्हारे माँगने के लिए? कि अभी वो वाला माँगने नहीं आया तो मत देना। पहले एप्लीकेशन (आवेदन) आएगी, उसके बाद डिस्पैच (भेजना) होगा, कुछ इस तरह का तन्त्र तो नहीं है। वो तो स्वयंभू है, अपनी मर्ज़ी से देता है। या इंतज़ार करता है कि अभी तक प्रार्थनापत्र तो आया नहीं तो इनको कैसे दे दें? या उसका अहंकार प्रबल है कि ये साहब का तो अभी तक सिर नहीं झुका रहे, इन्हें हम कैसे दे दें? उसने दे दिया। वो बैठा नहीं है तुम्हारी विनती के इंतज़ार में।

उसने दे दिया जो देना था, अब तुम जानो तुम्हें कैसे खेलना है। संसार में उलझना है, संसार में उलझो, छूट है, कोई दिक्क़त नहीं है, समय अनन्त है। ये मोरैलिटी (नैतिकता) का क्वेश्चन (सवाल) नहीं है, अच्छे-बुरे का सवाल नहीं है।

जो संसार में उलझे हैं वो भी उसे उतने ही प्यारे हैं। कोइ ये न सोचे कि उन्हें वो नर्क में भेज देगा। संसार किसका है? उसी का है। तो इस संसार में अगर तुम उलझे हो, अगर तुम्हें दिन-रात बस वस्तुएँ और पद-प्रतिष्ठा और सेक्स ही दिखायी देता है तो कोई दिक्क़त नहीं हो गयी। सेक्स क्या किसी और लोक से आ गया है? उसने ही बनाया है और वो पूरा रसिया है। इतने कामुक शरीरों का निर्माण किसने किया? शरीर में भाँति-भाँति के हॉर्मोन (ग्रन्थिरस) किसने भरे?

फूलों की पँखुड़ियों को देखो, तुम लोग अभी गये थे, कैसे-कैसे तुमने चित्र खींचे हैं। सेंशुअल (उत्तेजक) चित्र हैं बिलकुल, हज़ार रंग बिखरे हुए हैं। तुम उस कलाकार का सोचो जो इस प्रकार की चित्रकारी करता है। वो कोई त्यागी-वागी नहीं है, संसार उसी का है। तुम्हें उसी में लिप्त होना है, तुम्हारी मर्ज़ी। उसी ने बनाया है, नाराज़ थोड़ी हो जाएगा तुम लिप्त हो रहे हो तो। हाँ, कर्मफल का सिद्धान्त लागू होता रहेगा। संसार में घुसोगे तो समय की नदी में घुसोगे; डूबते-उतराते रहो, जो करना है करो।

ये सब मान्यताएँ व्यर्थ हैं कि भक्ति करो तो वो प्रसन्न होता है। न वो प्रसन्न होता है, न वो अप्रसन्न होता है, उसे तुम्हारी भक्ति से कोई लेना-देना नहीं है। सब उसी का खेल है। अपने ही रचे खेल से कोई प्रसन्न या अप्रसन्न कैसे हो सकता है? तुम एक वीडियो गेम बनाओ, उसमें तुम ही कुछ खिलौने खड़े करो, कुछ पात्र और चरित्र खड़े करो, तुम ही उनका प्रोग्राम लिखो। उसके बाद तुम उनसे नाराज़ भी हो जाओगे कि ये वाला बदतमीज़ है? अरे! वो बदतमीज़ क्या है, जो तुम चाह रहे हो वही तो कर रहा है।

तो उसको न चुनना है, न तुमसे अप्रसन्न होना है। ये सब बातें बेकार हैं कि वो रूठ गया है, हम उसको मनाने जा रहे हैं। कि ईश्वर की कृपादृष्टि हमारे ऊपर नहीं है तो हम यज्ञ कर रहे हैं कि प्रार्थना कर रहे हैं। ये बेकार की बातें हैं।

वो सदा प्रसन्न है। वो अपने में प्रसन्न है, उसको तुमसे कोई मतलब नहीं है। वो अपने में खुश है। अगर वो तुम पर निर्भर होने लगे तो फिर तुममें और उसमें अन्तर क्या रह गया? तुम भी तो यही चाहते हो न कि कोई आकर के तुम्हारे सामने प्रणाम करे तो तुम खुश होओगे। फिर वो भी अगर यही कहने लगे कि जो मुझे आकर के प्रसाद चढ़ाएगा मैं उससे ही खुश होऊँगा तो वो तुम्हारे ही जैसा हो गया। वो तुम्हारे जैसा नहीं है। वो सदैव खुश है।

तुम पूजा करो चाहे न करो, उसका आशीर्वाद तुम्हारे साथ है। तुम नमाज़ पढ़ो चाहे न पढ़ो, उसकी बरकत तुम्हें उपलब्ध है। हाँ, पूजा करके तुममें पात्रता आ जाती है। उसकी ओर से जो दिया जाना था वो तो उसने दे ही रखा था। ध्यान में जाकर के तुम्हारा चुनाव बदल जाता है। तुम्हारा पात्र बदल जाता है।

वास्तव में नास्तिकता जैसी कोई चीज़ होती ही नहीं। सब आस्तिक हैं। बस दो अलग-अलग रूपों में उसको पूज रहे हैं। एक उसे संसार के रूप में पूज रहा है और एक निराकार सत्य के रूप में पूज रहा है। सब भक्त हैं, सब आस्तिक हैं, पूजने के तरीक़े में अन्तर है।

तुम अपनी मुक्ति का उपयोग करो। होश में आओ और अपनेआप से पूछो कि मुझे कैसे पूजना है। जो मुक्ति उसने बख़्शी ही है होश के रूप में, उस मुक्ति का ज़रा सदुपयोग करो। और अपनेआप से पूछो कि किस रूप में मुझे उसे भजना है, ऐसे कि वैसे। होश का यही अर्थ है, यही विवेक है।

प्र: यहाँ पर जो हम कहते हैं फिर कि बड़े की आकांक्षा करना अच्छा है।

आचार्य: अपने लिए अच्छा है, उसके लिए व्यर्थ है। आपकी बातें सुनकर उसे जम्हाइयाँ आती होंगी। वो कहेगा, 'कितना और कहूँ।' तू कहती है, ‘कानों में ज़रा कह दे’, मैं लाउडस्पीकर से बोल रहा हूँ। तू सुनने को तैयार नहीं है। और तू सुनने को तैयार नहीं, इसके लिए भी दोष क्या देना, चुनने का हक़ भी तो तुझे मैंने ही तो दिया। मैंने ही तो तुझे ये हक़ दिया कि तू आनन्द से ज़्यादा पीड़ा को चुन ले तो तूने चुना। तूने चुना। मूर्खता की मुक्ति भी हमें उसी ने तो बख़्शी है। याद है न, 'इगो इज़ द फ्रीडम टू रिमेन स्टूपिड' (अहंकार मूर्ख बने रहने की स्वतंत्रता है)।

देखिए, दया की, अनुकम्पा की अपेक्षा करने में, प्रार्थना करने में एक छिपी हुई श्रद्धाहीनता है। आप ये कह रहे हो कि मैं प्रार्थना करूँगा तब ग्रेस उतरेगी। आपने तो उसको भी कार्य-कारण में बाँध दिया। आपने कहा, कार्य क्या है? ग्रेस का उतरना। और उसका कारण क्या होगा? कि मैंने जाकर के प्रार्थना करी। आपकी प्रार्थना से ग्रेस नहीं उतरेगी भाई। ये तो आपने कुछ घूस देने जैसी बात कर दी।

उसे जो देना है वो तुम्हें बिना माँगे दे ही रहा है। तुम्हें बार-बार जाकर ये चिल्लाने की ज़रूरत नहीं है कि दे दे, दे दे, दे दे। अरे, और कितना दे दे! अपनेआप को उसने पूरा ही तो दे दिया है। अब कुछ बचा कर रखा है जो दे देगा!

हसन-राबिया की कहानी है कि हसन चिल्लाये कि मालिक रास्ता बता, सामने आ। राबिया देखे जाए, देखे जाए, देखे जाए। कई सालों बाद एक दिन उसके पास जाती है। बोलती है, 'क्या रास्ता बता, रास्ता खुला हुआ है, सामने है। कौनसा दरवाज़ा तू चाहता है कि खुल जाए? दरवाज़ा कभी बन्द था ही नहीं। कौन सामने आएगा? उसके अलावा तेरे सामने और क्या है! उससे माँगे जा रहा है और उसके दिये हुए को भूले बैठा है।'

माँगने में ठीक यही भाव है — भूलने का। तुम भूल गये हो कि उसे जो देना था उसने दे ही दिया है, तो और माँगे जा रहे हो। अब और क्या देगा, सब दे दिया। अब उससे मत माँगो, माँगना बेवकूफ़ी है। उसने दे दिया, कंजूस नहीं है वो‌।

अब तुम अपनी सुध लो कि उसके दिये हुए का मैं क्या कर रहा हूँ। उसने मुक्ति दी, उसने चेतना दी, मैं उस चेतना का क्या प्रयोग कर रहा हूँ या मैंने बेहोशी को चुना है? और याद रखना, हम बेहोशी चुनते हैं। कोई ये दावा न करे कि हम तो अकारण बेहोश हो गये थे, कि हम तो परिस्थितिवश बेहोश हो गये थे। आप बेहोशी चुनते हो। अपने चुनाव बदलो। जो कुछ तुमने चुन रखा है उसको ध्यान से देखो। ध्यान ही मुक्ति है, इस मुक्ति का प्रयोग करो। जो भी तुमने चुनाव कर रखे हैं जीवन में, उनको ध्यान से देखो। बार-बार उससे कृपा की आकांक्षा मत रखो, उसने कृपा कर रखी है। अब तुम अपना भी कुछ करोगे?

मन इतना चालाक है कि प्रार्थना भी उसके लिए अहंकार को बचाने का उपाय बन जाती है। मुझे कुछ न करना पड़े तो मैं तो प्रार्थना कर रहा हूँ। कुछ हुआ क्यों नहीं? ‘जी, हमारी प्रार्थना सुनी नहीं गयी।’ तो जीवन सड़ा-का-सड़ा है और बेचैनी क़ायम है। तो क्यों क़ायम है? ‘ऊपरवाले की मर्ज़ी है।’ ऊपरवाले की मर्ज़ी है या तुम्हारी मर्ज़ी है? तुम आरोप लगा रहे हो, तुम कह रहे हो कि ऊपरवाले की मर्ज़ी है कि तुम कष्ट में रहो। क्या देख पा रहे हो कि कितना घिनौना आरोप है ये?

आप जब कष्ट में होते हैं तो तुरन्त दावा क्या कर देते हैं? क्या? 'जैसी उसकी मर्ज़ी।' क्या कहना चाहते हो कि उसकी मर्ज़ी है कि संसार कष्ट में रहे, बेचैन रहे? घटिया बात है। उसकी नहीं मर्ज़ी है, तुम्हारी मर्ज़ी है। उसने अपनेआप को तुम्हारे भीतर बैठाया है हृदय बनकर।

हृदय है चेतना का उद्गम, स्रोत। वो तुम्हारे भीतर बैठा है बोध बनकर। वो तुम्हारे भीतर बैठा है विचारणा की शक्ति बनकर। वो तो बैठा ही है। और अपनेआप को ही उसने तुम्हारे रूप में प्रकट किया है पूरी ताक़त देकर के, पूरी मुक्ति देकर के कि जो चाहो सो करो। जैसे मन हो वैसे जियो। अब अगर तुम्हारा जीवन कष्ट से और वियोग से भरा है तो क्या ये उसकी मर्ज़ी है? तो फिर प्रार्थना क्या करते हो? वास्तविक प्रार्थना है इस भाव में अभिभूत रहना कि देने वाले ने सब दे ही रखा है; देगा नहीं, दे ही रखा है।

कह रहे हैं नानक, "रते तेरे भगत रसाले" — रत रहना। कि तूने तो दे ही रखा है, अब मैं खेलूँगा तेरे दिये हुए के साथ। वास्तविक प्रार्थना है अपना जगना, उससे माँगना नहीं। अपना जगना है वास्तविक प्रार्थना। माँगने को कुछ है ही नहीं, क्या माँगोगे? जीवन में सही चुनाव करना, जीवन में चैतन्य, होशपूर्ण चुनाव करना ही प्रार्थना है। यही तुम्हारी प्रार्थना है। ध्यान ही तुम्हारी प्रार्थना है, और कोई प्रार्थना नहीं होती।

इस बात को तो गाँठ बाँध लो — हाथ जोड़कर के भीख माँगने का नाम प्रार्थना नहीं है। ये तो तुम्हारा संसारी व्यापार है कि किसी के अहंकार को तुष्टि देंगे तो वो हम पर दया कर देगा। इंसान ने प्रार्थना शब्द के साथ बड़ा खिलवाड़ करा है।

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