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राम और कृष्ण न आपका सहारा चाहते हैं, न आपकी सफ़ाई || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। कई भ्रांतियाँ मैंने देखी है कि फैली हुई हैं। जैसे कि उत्तरकांड को बहुत से लोग रामायण का हिस्सा नहीं मानते। कहते हैं, रामायण युद्धकांड पर समाप्त हो जाती है, वाल्मीकि जी ने उससे आगे उसको नहीं कहा था।

ऐसे ही कुछ सनातन धर्म पर आक्षेप लगाने वाले यह भी कहते हैं कि, 'अनुशासन पर्व में भीष्म ने कहा था, अगर आप गाय की बलि देंगे तो आपको पुण्य मिलेगा।' जबकि वो अध्याय वहाँ पर उपस्थित ही नहीं है, ऐसा मिलता है।

और ऐसे ही राजीव दीक्षित जी ने एक बार कहा था कि, 'मनुस्मृति में भी जो विकृतियाँ डाली गईं, वो ब्रिटिशर्स द्वारा डाली गईं वहाँ पर।'

तो आपको मैंने उस विषय पर इतना कुछ बोलते हुए नहीं सुना; आपको मैंने रामायण और महाभारत पर लगाए गए लांछनों को तथ्य से काटते हुए कभी नहीं सुना। जिस चीज़ की काट तथ्य से हो सकती है, आप चेतना के ऊँचे तल पर जाकर उस चीज़ को तथ्य से काटते हैं। लेकिन इस विषय में आप ऐसे कुछ नहीं कहते। तथ्य के विषय में आप शायद इसलिए नहीं कहते हैं क्योंकि ओशो ने जैसे कहा है कि, 'तथ्य हमें बहुत दूर तक लेकर नहीं जाते हैं।'.

आचार्य प्रशांत: नहीं, बात दूसरी है। बैठिए। बात यह है कि मुझे तथ्य का इस्तेमाल करके उस बात को जस्टिफाई करने की कोई ज़रूरत महसूस ही नहीं होती है।

समझो!

राम का पूरा वृत्त, पूरा चरित्र हमारे सामने है। ठीक? उसमें से निन्यानवे बातें मेरे बहुत काम की हैं। एक बात ऐसी है जो विवादग्रस्त है किसी वजह से, आप उस पर बात कर सकते हैं—प्रतिशत के तौर पर, अनुपात के तौर पर ले लीजिए कि निन्यानवे प्रतिशत मेरे काम की है और एक प्रतिशत बात विवाद में है।

वह जो मुझे निन्यानवे प्रतिशत राम से मिल रहा है, वह इतना ज़्यादा है, मैं उससे इतना तृप्त हो जाता हूँ, कि उस एक प्रतिशत को अगर कोई ग़लत साबित कर भी दे तो मुझे कोई अंतर पड़ता ही नहीं। मैं काहे को जाऊँ उस एक प्रतिशत की सफ़ाई देने?

मैं कहता हूँ, तुम मान लो। मैं कहता हूँ तुम मान लो, तुम्हारी जीत हुई। उस एक प्रतिशत में मुझे तुम्हारी जीत स्वीकार है, तुम ले जाओ। तुम यही सिद्ध करना चाहते हो कि राम भ्रम में थे? तुम यही सिद्ध करना चाहते हो कि राम अन्यायी थे? यह सबकुछ जो तुम सिद्ध करोगे, वह कितने में सीमित है? एक प्रतिशत में। तो मैं कहता हूँ, तुम मान लो।

तुम कुछ भी मान लो मुझे कोई अंतर ही नहीं पड़ता क्योंकि जो निन्यानवे प्रतिशत मुझे उनसे मिल रहा है, वह इतना ज़्यादा है, इतना ज़्यादा है कि एक प्रतिशत मैं तुम्हें सहर्ष देने को तैयार हूँ, जीत तुम्हारी है! ले जाओ, जाओ ले जाओ!

कहीं-कहीं पर ऐसा बिलकुल हो सकता है कि ग्रंथों में कुछ प्रक्षिप्त अंश हों या कि उनका विकृत अर्थ ही कर लिया गया हो; अनर्थ हो। यह बिलकुल हो सकता है, लेकिन हमेशा ऐसा नहीं है। बहुत जगह पर हमें अवतारी चरित्रों का वही आचरण देखने को मिलता है, जो समकालीन मूल्यों के अनुरूप था।

ठीक है न?

वो जिन मूल्यों में, जिस ख़ानदान में, जिस समाज में, जिस परंपरा में पैदा हुए हैं, भाई! उनका आचरण लगभग वैसा ही तो रहेगा न? तो मैं काहे को कहने जाऊँ कि नहीं-नहीं वैसा नहीं था। था!

अब कृष्ण की परवरिश यदि गौ पालकों के यहाँ हो रही थी, ग्वालों से घिरे हुए थे, तो इसमें अचरज की बात क्या है, कि दूध-दही से उनका रिश्ता था? ‌यह तो होगा! अब मैं क्यों जस्टिफाई करने जाऊँ कि नहीं था; नहीं था। था, लेकिन मुझे उस बात से कोई प्रयोजन नहीं है बाबा! क्योंकि मुझे प्रयोजन गीता से है।

राम यदि क्षत्रिय वंश में पैदा हुए थे, और उस समय की कुछ परंपराएँ थीं; उदाहरण के लिए अब दशरथ की क्या सिर्फ़ एक रानी थी? नहीं थी न? इसी तरीके से युद्ध में जाया जाता था। क्षत्रिय परंपरा थी कि अपने राज्य का विस्तार करो, यह करो, वह करो। यह सब बातें थीं। तो उन सब मूल्यों का प्रभाव भी, जो मानवीय राम हैं, उनके मन पर पड़ेगा न? उससे मुझे क्यों आपत्ति हो। और मैं क्यों साबित करने जाऊँ कि नहीं-नहीं ऐसा नहीं हुआ था; नहीं हुआ था। ऐसा हुआ था, बिलकुल हुआ होगा!

और यह बात तो निश्चित है कि क्षत्रियों में माँसाहार का विधान था, परंपरा थी, खाते थे। तो यदि ऐसा हो भी कि राम वध करने गए थे हिरण का, तो मैं मान लूँगा कि ऐसा हो सकता है। हो सकता है; लेकिन उस बात से मुझे फ़र्क नहीं पड़ता। फर्क नहीं पड़ता!

देखिए! यह बड़ी एक ग़लत पहल चल रही है कि हम आज के मूल्यों पर, तब के चरित्रों का आंकलन करने लग जाते हैं। उन चरित्रों का आंकलन उस समय के मूल्य पर होना चाहिए, आज के मूल्यों पर नहीं।

नहीं समझ रहे हो आप?

उदाहरण के लिए आज का मूल्य है कि स्त्री-पुरुष को हर क्षेत्र में आप समान मानोगे। यह मूल्य आज का है; बिलकुल हो सकता है कि पचास साल बाद इस मूल्य में भी कुछ उन्नति हो जाए, कुछ बदलाव हो जाए। तो आप क्या करते हो कि आज का यह मूल्य लेते हो स्त्री-पुरुष की बराबरी का, और फिर रामायण को या महाभारत को या अन्य ग्रंथों को आप आज के मूल्य पर जस्टिफाई करने लग जाते हो। आप कहते हो, देखो, उनमें भी बराबरी की बात है!

तथ्य यह है कि बराबरी की बात नहीं है। और मान लो चुपचाप! यह उल्टा-पुल्टा जस्टिफिकेशन किसी काम का नहीं है। अनावश्यक है बाबा!

मुझे गीता मिल गई, मैं अघा गया, मैं तृप्त हूँ। उसके बाद तुम्हें कृष्ण पर जो आक्षेप लगाने हैं, लगाओ! मेरे लिए कृष्ण कौन हैं? गीताकार जो हैं, उनका नाम कृष्ण है। तुम अगर यह भी बोलोगे कि वेदव्यास ने लिखी है, तो मैं कहूँगा, वेदव्यास ही कृष्ण हैं।

गीता कहीं से तो आयी है? जहाँ से आयी है उस स्त्रोत का नाम कृष्ण है। अब उसके बाद तुम्हें कृष्ण पर जो आपत्तियाँ करनी हैं, करते रहो। मैं इतनी भी उसमें रुचि नहीं रखता कि मैं आकर के उसमें सफ़ाई दूँ। मुझे नहीं सफ़ाई देनी! मुझे जो मिलना था वह मिल चुका।

भ‌ई! प्रेम हो गया है, अब दुनिया आ करके तोहमतें लगाती रहे कि तुम्हें जिससे प्रेम हुआ है, उसमें यहाँ कलंक है, यह है, वह है; मैंने जो देखना था, मैंने देख लिया। मुझे मेरे प्रिय में जो पाना था, वह पा लिया। अब दुनिया इल्ज़ाम लगाती रहे, मुझे कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता। मैं सफ़ाई क्यों देने जाऊँ?

इससे यह भी समझो कि अगर मुझे बार-बार सफ़ाई देने की रुचि हो रही है, तो इसका मतलब है, मेरा प्रेम अभी अधूरा है। जिन लोगों की बड़ी रुचि रहती है, यह जस्टिफाई करने में कि तब के लोग आज के मूल्यों पर भी खरे उतरते हैं; यह लोग शायद वो हैं जिनको अभी अवतारों से और ऋषियों से पूरा प्रेम हुआ नहीं है। तो उनको फिर लाज-सी आती है, जब उन पर कोई आरोप लगा देता है; मुझे कोई लाज आती ही नहीं।

आप राम पर आरोप लगा दो, मुझे दुख हो सकता है, वह भी आपके लिए, कि आप कितने अभागे निकले। लेकिन मुझे लाज नहीं आएगी कि राम ने बुरा काम कर दिया। क्योंकि मैं राम को जानता हूँ, मेरा उनसे बहुत निकट का रिश्ता है। तो आप उनके बारे में कोई इल्ज़ाम लगाते रहो, मुझे कोई अंतर पड़ेगा ही नहीं।

हाँ, मैं फिर भी आपको शायद समझाऊँगा, ताकि आप कहीं राम से वंचित न रह जाएँ। लेकिन राम के पक्ष में दलीलें देने की, राम की सफ़ाई देने की मुझे कोई ज़रूरत नहीं है। उनका कुछ नहीं जाता।

मैं कौन हूँ, उनका वकील बनकर खड़ा होने का? राम की वकालत मैं करूँगा क्या? राम-राम हैं, बात खत्म! तुम्हें जो करना है करो। तुम नारे लगा लो, तुम अपशब्द बोल लो, तुम उनकी मूर्तियाँ तोड़ दो, तुम्हें जो करना है करो; तुम्हारा ही नुक़सान हो रहा है।

गीता समझ में आ गई, उसके बाद कृष्ण से प्यार कैसे नहीं होगा? मेरे लिए तो आश्चर्य ही यही है। जिसने गीता पढ़ ली, उसके बाद भी वो कहे कि अरे!‌ कृष्ण तो देखो!—अभी आजकल चलता है यह। कुछ बहुत प्रगतिशील और उदार सोच के लोग हैं, वो कहते हैं, यह देखो—सीधे-सीधे शब्द इस्तेमाल किया है 'लफंगई'!—कहते हैं, देखो! नहाती औरतों के कपड़े उठाकर भाग रहे थे, यह गॉड कैसे हो सकते हैं? यह सब ट्विटर पर चलता है आजकल!

तुमने गीता पढ़ी है? या तुम्हें बस इसमें ही रुचि है कि औरतों के कपड़े उठा लिए (आचार्य जी व्यंग करते हुए हँसते हैं)? और गीता तुमने पढ़ ली होती, तो उसके बाद इन बातों से तुम्हारा क्या ताल्लुक़ रह जाता भाई?

इसी तरह तुमने योगवाशिष्ठ पढ़ा है? राम का वशिष्ट से क्या रिश्ता था, तुम जानते हो? वहाँ ज्ञान क्या है, यह जानते हो? राम के चरित्र में मूर्धन्य बातें क्या हैं, केंद्रीय बातें क्या हैं, वह जानते हो? वह जान लो, उसके बाद तुम इधर-उधर की बात थोड़ी ही करोगे। जहाँ से जो चीज़ सीखने लायक है, वो सीखो!

'सार-सार को गहि रहे, थोथा देई उड़ाय।' आम का छिलका नहीं चाटते और गुठली नहीं चूसते।

समझ में आ गई बात?

'रसो वै सः!' रस को ग्रहण करो और बाकी सब छिलके और गुठली की तरह त्याग दो, उससे कोई अभिप्राय नहीं।

इतना समझाया है कि सब ग्रंथों में और महाकाव्यों में दो तरह की बातें होती हैं — समयातीत और समयसापेक्ष। जो समयसापेक्ष बात होती है, वह उस समय के मूल्यों को प्रतिबिंबित करती है कि उस समय लोग कैसा सोचते थे, कैसा करते थे। उसमें आपको वह बात मिलेगी। उस बात से आज हमारा कोई वास्ता नहीं। हम उस बात को न सुनेंगे, न देखेंगे, न कुछ उससे सीखेंगे।

हम वो बात सीखेंगे जो समयातीत है। जो तब भी वैध थी, और आज भी वैध है। जिसका तब भी मूल्य था और आज भी है, वह बात सनातन है। और यही सनातन धर्म है, सिर्फ़ उससे रिश्ता रखना जो चीज़ सनातन हो।

जो चीज़ किसी समय पर आयी थी, परंपरा बन गई, विचार बन गई, मूल्य बन गई, फिर दूसरे समय में वो परंपरा, वो विचार, वो मूल्य, पीछे छूट जाते हैं, उनसे रिश्ता रखना सनातन बात नहीं है। न वह सनातन धर्म है। खेद की बात यह है कि हमने सनातन धर्म का संबंध परंपराओं, प्रथाओं, मान्यताओं से ही ज़्यादा जोड़ दिया है।

जो वास्तव में समयातीत और कालातीत है, उसको हम भूल गए हैं। उसको पकड़ कर रखिए। और वह सबसे ज़्यादा साफ़ कहाँ दिखाई देती है? वेदांत में।

पुरानी चीज़ों को जायज़ ठहराने के लिए आजकल कैसे-कैसे तो प्रयास किए जा रहे हैं। कोई बताने की कोशिश कर रहा है कि ब्रह्मास्त्र न्यूक्लियर एनर्जी से चलता था। मैं पूछता हूँ, 'पगलों! अगर उनके पास न्यूक्लियर एनर्जी होती, तो अपने रथ के लिए हॉर्स एनर्जी यूज़ करते?'

उस समय पर टेक्नोलॉजी की स्थिति यह थी कि जो सबसे निचले स्तर की उर्जा होती है, उसका इस्तेमाल करना पड़ता था। सबसे निचले स्तर की उर्जा मालूम है कहाँ होती है? आपकी माँसपेशियों में। जब आपका विज्ञान इतना नहीं होता कि आपको और तरह की उर्जा दे पाए, तो आप शारीरिक ऊर्जा का इस्तेमाल करते हो। रथ अगर घोड़ों से जुत रहे हैं, तो इसका अर्थ क्या है? कि इंजन तक उपलब्ध नहीं था, तो फिर बाण में कहाँ से न्यूक्लियर एनर्जी आ गई?

लेकिन हम गीता को नहीं जानते, हम राम के चरित्र से प्रेम नहीं करते, तो फिर हमें उनके चरित्र को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने की आवश्यकता महसूस होती है। कोई बोलना चाह रहा है कि उस समय भी इंटरनेट चलता था। कोई बोल रहा है, अरे स्पेस टेक्नोलॉजी बहुत अच्छी थी, नहीं तो पुष्पक कहाँ से आता! ज़रूर जेट फायर्ड था वो। लोग रिसर्च कर रहे हैं कि प्रोपल्शन की कौन-सी टेक्नोलॉजी थी पुष्पक में? काहे को फ़ालतू बातों में दिमाग लगा रहे हो? क्या मतलब है?

कोई कह रहा है कि रामसेतु खोजकर निकालेंगे, होगा! ये क्या है? क्या चल रहा है यह? इससे यही पता चलता है कि अभी राम से प्रेम हुआ नहीं। एक हीन भावना है राम को लेकर के। जिस चीज़ को लेकर हीन भावना होती है, उसी को तो और अलंकृत और सुसज्जित करना चाहते हो न?

जब अपना चेहरा अच्छा नहीं लगता तो उसको क्या करना चाहते हो? उसको और सजाते हो। तो राम के चरित्र को और सजाने की ज़रूरत क्या है? इसका मतलब राम का चरित्र जैसा है, वैसा तुम्हें पूरा नहीं पड़ रहा। तुममें हीन भावना है राम को लेकर के, क्योंकि राम को न तुम जानते हो, न राम से तुम्हें प्रेम है। तो फिर तुम उसमें और तरह के अलंकरण जोड़ना चाहते हो कि ऐसा था वैसा था।

'अरे! फाइव-जी क्या होता है, सेवन-जी चलता था तब। आँख बंद करते थे और कम्युनिकेशन हो जाता था।' यह सब बातें हैं और पढ़े-लिखे लोग इस तरह की बातें बोल रहे हैं।

कोई सेवन-जी नहीं था पागल! कोई मेकेनिकल इंजीनियरिंग नहीं थी, जिस तरह की आज देखते हो। नहीं था, मान लो! लेकिन कोई फ़र्क नहीं पड़ता क्योंकि असली चीज़ जो हमें राम से सीखनी है, वह है चरित्र; विज्ञान नहीं।

चरित्र तुम सीखना नहीं चाहते, इसलिए फिर विज्ञान के तल पर बढ़-चढ़ कर डींगे हाँकते हो कि उस समय भी ऐसा होता था, वैसा होता था, सर्जरी हो जाती थी। 'देखो! हाथी का सिर काटकर के गणेश जी बना दिए; इससे क्या पता चलता है? आज कोई ऐसा कर सकता है डॉक्टर? लेकिन उस समय पर हमारी शल्यक्रिया इतनी सुविकसित थी।' नहीं! प्रतीक हैं गणेश, कोई व्यक्ति नहीं हैं गणेश। बहुत एक ऊँचे स्तर का प्रतीक हैं। कोई हाथी नहीं था जिसका सिर काटा गया हो और एक बच्चे के लगा दिया गया हो। ऐसे नहीं होता।

बच्चे का आकार देखो और हाथी का सिर देखो। बच्चे के दिल में इतनी क्षमता है कि उसके सिर को इतना खून दे पाए? कुछ थोड़ा तो विचार कर लो। कुछ भी बुद्धि नहीं है? इतना-सा (छोटा) दिल है बच्चे का, इतना बड़ा सिर है हाथी का। ब्लड सप्लाई कैसे होगी? शिराएँ कैसे सारी कनेक्ट होंगी?

कुछ सोचना ही नहीं है, कर दिया!

कैसे कर दिया? यह इसलिए कर रहे हो क्योंकि तुम गणेश जी को समझते नहीं। समझते नहीं इसलिए तुम्हारे मन में उनके लिए सम्मान नहीं है। इस तरह की बातें करना वास्तव में गणेश और शिव दोनों के प्रति अपमान की बात है। और दोनों को ही हम समझते नहीं। तो फिर हमें इस तरह की बढ़ा-चढ़ा कर के डींग हाँकने वाली, व्यर्थ की अलंकृत बातें करनी पड़ती हैं।

हर चीज़ को जस्टिफाई करना है। आप कुछ भी करते हो, बोलो, यह वैज्ञानिक बात है। 'पुरानी चल रही है इसलिए वैज्ञानिक होगी, क्योंकि असली विज्ञान तो पुराने समय में था।' कुछ भी तुम करते हो वह वैज्ञानिक बात है।

बृहस्पतिवार को बाल क्यों नहीं कटाने? 'मैं विज्ञान बताता हूँ।' और एक नया हिंदू जन्म ले रहा है, जो गौरव ही इसी बात में पाता है कि उसके जितने अंधविश्वास हों और जितनी कुप्रथाएँ हों, कोई आ करके उनको साइंटिफिकली जस्टिफाई कर दे बस। और कुछ गुरु हैं, जो पेशेवर रूप से इसमें माहिर हैं। वो सिर्फ़ यही करते हैं दिन-रात, कि जितनी भी तुम्हारी प्रथाएँ होंगी, वो साबित कर देंगे कि इनका एक वैज्ञानिक आधार है।

बाबा! सनातन धर्म की विशेषता उसकी प्रथाएँ, परंपराएँ नहीं हैं; उसका ज्ञान है, ज्ञान! आत्मा और ब्रह्म, इनसे सरोकार रखो! यह सनातन हैं! आत्मा के अतिरिक्त कुछ सनातन नहीं होता। सनातन माने समझते हो न? जिसका कभी अंत न आए। आत्मा के अतिरिक्त कुछ अनंत है ही नहीं, तो तुम बाकी बातों को क्यों सनातन कह रहे हो? वो हैं हीं नहीं सनातन धर्म।

समझ में आ रही है बात?

तो डिफेंसिव हो जाने की कोई ज़रूरत नहीं है अगर कोई आ करके कहे कि, 'अरे देखो! तुम्हारे ग्रंथों में तो ऐसा लिखा है। फलाने ने यह गलती करी थी।'

मान लो, बिल्कुल करी थी। लेकिन मुझे प्रयोजन किससे है? आत्मा से। सनातन की विशेषता यह है कि उसने आत्मा दी है पूरे संसार को। और वो इतनी बड़ी चीज़ दे दी कि उसके आगे अगर कुछ गुण-दोष हैं भी, तो वो एकदम शून्य बराबर हो गए।

कोई तुमको अरबों का हीरा दे दे, एक मैले कागज़ में लपेट करके; हीरे की कीमत कम हो गई क्या? या तुम यही बात करते रहोगे कि देखो कागज़ मैला है, कागज़ मैला है? लेकिन तुमने किसी को हीरा दिया, मैले कागज़ में, और वह व्यक्ति बार-बार कहे कि, 'नहीं-नहीं कागज़ मैला नहीं है, कागज़ मैला नहीं है।' इसका मतलब क्या है? वह कागज़ को बार-बार जस्टिफाई करने की कोशिश कर रहा है।

इसका अर्थ क्या है?

उसे हीरे की कीमत ही नहीं पता। नहीं तो वो कहता, 'हाँ! कागज मैला है, तो क्या हो गया? हीरा यह रहा भाई! हीरा यह रहा! कागज़ को छोड़ो, हीरे को देखो!'

उस हीरे का क्या नाम है? आत्मा। सनातन धर्म आत्मा है। आत्मा! आत्मा! और कुछ नहीं! बाकी बातें छोड़ो। बाकी बातों का अगर कोई उपहास करना चाहता हो तो उसको दे दो वो बातें; 'ले उपहास कर। तेरे पास आत्मा तो है ही नहीं दरिद्र आदमी, तू उपहास का ही आनंद ले ले। क्योंकि सच्चिदानंद का अमृत तो तुझे मिल नहीं रहा है न—सच्चितानंद तो आत्मा होती है—वह आनंद तो तुझे मिल नहीं रहा, तू उपहास से ही कुछ प्रसन्नता ले ले। ले! ले जा, करले उपहास।'

यह बात समझ में आ रही है?

आजकल धर्म की बहुत बातें हैं। सनातन धर्म क्या है? मात्र और मात्र आत्मा, क्योंकि सनातन मतलब जिसका अंत नहीं आना। जिसका अंत नहीं आना उसके लिए एक ही नाम है — आत्मा। बाकी सारी बातें आप त्याग सकते हो। कोई समस्या नहीं हो जाएगी। आप सनातनी रहोगे।

और आपने बाकी सारी बातें पकड़ रखी हैं; यह किस्सा है, यह कहानी, वो प्रथा, वो परंपरा, लेकिन आत्मा का आपको कुछ पता नहीं, तो आप सनातनी हो ही नहीं। आप पारंपरिक हो सकते हो; आप सनातनी नहीं हो सकते अगर आप आत्मा को नहीं जानते।

और जो आत्मा को जानता है, उसके लिए परंपराएँ हैं, अच्छी बात है; परंपराएँ नहीं हैं, तो भी अच्छी बात है। जो असली चीज़ है वही तो असली है, बाकी से क्या?

समझ में आ रही है बात?

इसीलिए संतो ने जब राम की बात करी, उदाहरण के लिए कबीर साहब ने, तो उनके लिए, कबीर साहब के लिए राम क्या हैं? आत्मा ही हैं, ब्रह्म। वो फिर दशरथ पुत्र राम की बात नहीं करते। वह उन राम की बात नहीं करते कि जिन्होंने रावण का वध करा था, जो सीता के पति थे।

जब वो कहते हैं, 'राम'; 'एक कबीरा ना मरे जाके राम आधार।' तो कौन से राम की बात कर रहे हैं? वो उस राम की बात कर रहे हैं, ब्रह्म की। वो सनातन धर्म है।

तो आहत नहीं हो जाना है, बुरा नहीं मान लेना है जब लोग तरह-तरह से विक्षेप करें और यह उठाएँ, वह उठाएँ।‌ कोई उठाकर कहीं से दो पंक्तियाँ दिखा देगा। कहेगा, यह देखो तुम्हारे ग्रंथों में तो ऐसा लिखा है। हमें बड़ा बुरा लग जाता है।

बुरा लगने की कोई बात ही नहीं, हँस दीजिए। कहिए, 'तुझे इसमें सुख मिला, तुझे यह भूल-चूक निकालने में सुख मिला? तू ले ले वो सुख! क्योंकि वैसे भी तू सच्चिदानंद अमृत से तो वंचित ही है। तू यह छोटा सुख ही ले ले। तुझे कुछ तो तृप्ति मिलेगी। तू यही ले ले बाबा! और अगर तू आत्मा का अमृत पाना चाहता है, तो फिर मेरे पास आ। मैं तुझे वेदांत तक ले चलता हूँ। ठीक! हीन भावना से ग्रस्त होने की कोई ज़रूरत नहीं है।'

आज के हिंदू में बड़ी हीन भावना आ गई है। इस कारण वो आक्रामक होने लग गया है। यह जो झूठमूठ का जस्टिफिकेशन है, वो उसी हीन भावना का द्योतक है। हमें नहीं जस्टिफाई करना। इसी तरीके से यह बातें कि तुम अपनी सब परंपराओं को वैज्ञानिक तल पर जायज़ ठहराओ, यह भी हीन भावना का ही द्योतक है।

जो परंपराएँ ठीक नहीं हैं, हम उनको त्याग देंगे। हम यह नहीं साबित करना चाहेंगे कि ये वैज्ञानिक हैं।

और कोई परंपरा काम की है, तो हमें पता है न काम की है। कोई कुछ भी कहता रहे हम नहीं त्यागेंगे। और काम की सिर्फ़ कब होगी? जब वो हमें कहाँ तक ले जाए? आत्मा तक; राम तक ले जा रही है। अगर कोई परंपरा हमें राम तक ले जाती है, तो काम की है। अब जान दे देंगे लेकिन परंपरा नहीं छोड़ेंगे। लेकिन सिर्फ़ तब जब वो परंपरा हमें राम तक ले जाती हो। खाली परंपरा है, तो अभी छोड़ देंगे।

यह बात साफ़ हो रही है बिलकुल? समझ में आ रहा है?

जब प्रेम होता है, तो एक बड़ा गहरा आत्मविश्वास होता है। फिर आप जल्दी से आहत नहीं हो जाते। आपको हर बात का जवाब देने की ज़रूरत नहीं महसूस होती कि फलाने ने इल्ज़ाम लगा दिया राम पर, चलो प्रतिकार करें। अरे! उसने लगा दिया, उसका अभाग है। बोलने दो!

'नहीं, लेकिन इससे हमारी नई पीढ़ी पर बुरा असर पड़ता है, कैसे बोलने दें?' तुम्हारी नयी पीढ़ी पर बुरा असर पड़ता है, तो अपनी नयी पीढ़ी को सही शिक्षा दो। अपनी नयी पीढ़ी को राम में इतनी गहराई से स्थापित कर दो कि फिर कोई कुछ भी बोलता रहे अंतर ही न पड़े।

नयी पीढ़ी को राम की कोई शिक्षा तो तुम देते नहीं, लेकिन जब कोई राम पर इल्ज़ाम लगाता है, तो तुम दंगा करने पर तैयार हो जाते हो। दंगा करने से थोड़ी कुछ हो जाएगा। शिक्षा से होगा न!

समझ में आ रही है बात?

जय श्री राम से पहले, जानो श्री राम। नहीं तो जय श्री राम का नारा एकदम खोखला है, बल्कि पाखंडी है। जानो श्री राम! जानो तो उनको, कि राम माने क्या? फिर सिर्फ़ सम्मान नहीं रहेगा, फिर प्रेम उठेगा।

प्र२: आचार्य जी, शत-शत प्रणाम। मेरा प्रश्न अभी आपने जो बताया हमें, उसी बारे में है। आपने बोला कि, 'यदि आप सजग हो, दूसरों से लोहा लेते हो, आपमें ताकत है, तो आपको उस स्थिति में लोगों को क्षमा करना चाहिए।'

मेरा प्रश्न यह है कि हम पर मान लो इतनी बड़ी कोई विपत्ति आ जाए, जो हमारा मूल उद्देश्य ही बदल दे। इस टाइप से कोई आक्रमण हो, तो ऐसे इंसान को मैं कभी क्षमा कर सकता हूँ क्या?‌

जैसे उदाहरण के लिए, जैसे हमारे यहाँ विदेशी आक्रमणकारी आए और हमारी नालंदा यूनिवर्सिटी को उन्होंने जला दिया और एक साल तक जलती रही। वो उस वक़्त हमारी चेतना भी उच्च थी, हमें बहुत नुक़सान भी हुआ, तो जो इतना बड़ा संकट था, ऐसे आदमी को हम कभी अपने दिल से क्षमा कर सकते हैं क्या?

आचार्य: नहीं करना चाहिए! और प्रतिशोध यह होता कि आप पाँच और नालंदा खड़ी करते। करी क्या? बदला लिया कहाँ हमने?

जिसने मेरी एक नालंदा जलायी थी, अगर मुझमें वाक़ई बदला लेने का जज़्बा होता, तो मैं पाँच नालंदा खड़ी करता। बदला लिया कहाँ हमने?

मैं तो कह रहा हूँ, बदला लो! (श्रोतागण तालियाँ बजाते हुए)

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