राम और कृष्ण न आपका सहारा चाहते हैं, न आपकी सफ़ाई || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। कई भ्रांतियाँ मैंने देखी है कि फैली हुई हैं। जैसे कि उत्तरकांड को बहुत से लोग रामायण का हिस्सा नहीं मानते। कहते हैं, रामायण युद्धकांड पर समाप्त हो जाती है, वाल्मीकि जी ने उससे आगे उसको नहीं कहा था।
ऐसे ही कुछ सनातन धर्म पर आक्षेप लगाने वाले यह भी कहते हैं कि, 'अनुशासन पर्व में भीष्म ने कहा था, अगर आप गाय की बलि देंगे तो आपको पुण्य मिलेगा।' जबकि वो अध्याय वहाँ पर उपस्थित ही नहीं है, ऐसा मिलता है।
और ऐसे ही राजीव दीक्षित जी ने एक बार कहा था कि, 'मनुस्मृति में भी जो विकृतियाँ डाली गईं, वो ब्रिटिशर्स द्वारा डाली गईं वहाँ पर।'
तो आपको मैंने उस विषय पर इतना कुछ बोलते हुए नहीं सुना; आपको मैंने रामायण और महाभारत पर लगाए गए लांछनों को तथ्य से काटते हुए कभी नहीं सुना। जिस चीज़ की काट तथ्य से हो सकती है, आप चेतना के ऊँचे तल पर जाकर उस चीज़ को तथ्य से काटते हैं। लेकिन इस विषय में आप ऐसे कुछ नहीं कहते। तथ्य के विषय में आप शायद इसलिए नहीं कहते हैं क्योंकि ओशो ने जैसे कहा है कि, 'तथ्य हमें बहुत दूर तक लेकर नहीं जाते हैं।'.
आचार्य प्रशांत: नहीं, बात दूसरी है। बैठिए। बात यह है कि मुझे तथ्य का इस्तेमाल करके उस बात को जस्टिफाई करने की कोई ज़रूरत महसूस ही नहीं होती है।
समझो!
राम का पूरा वृत्त, पूरा चरित्र हमारे सामने है। ठीक? उसमें से निन्यानवे बातें मेरे बहुत काम की हैं। एक बात ऐसी है जो विवादग्रस्त है किसी वजह से, आप उस पर बात कर सकते हैं—प्रतिशत के तौर पर, अनुपात के तौर पर ले लीजिए कि निन्यानवे प्रतिशत मेरे काम की है और एक प्रतिशत बात विवाद में है।









