इस चीज़ से बच गए, तो फिर कभी नहीं डरोगे || आचार्य प्रशांत कार्यशाला (2023)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। कल का सत्र बहुत अच्छा था और जब सत्र में जुड़ने करने के लिए हम आवेदन करते हैं, मेल भेजते हैं, उसमें सबसे पहला सवाल पूछा जाता है कि आपकी अपेक्षा क्या है सत्र में भाग लेने से? मेरी जो अपेक्षा थी, वो पहले दस मिनट में आपने मुझे दे दिया, उसके लिए धन्यवाद। और गीता पर जो सत्र था, वो भी बहुत लाभदायक था। आचार्य जी, मेरा सवाल, अभी जो हम दोहे भज रहे थे, उन पर है।
“बिन सत्संग विवेक न होई, रामकृपा बिनु सुलभ न सोई।”
और बिलकुल ऐसा ही एक आता है,
“हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर।”
तो जब ये मेरे ही अलग-अलग चेतना के स्तर हैं, डिग्रीज़ हैं, तो ये रामकृपा माने किस कृपा की बात हो रही है? किसकी कृपा की बात हो रही है? और हरि रूठे से क्या मतलब है?
आचार्य प्रशांत: "राम ब्रह्म परमारथ रूपा।" ठीक है! इन्होंने (तुलसीदास जी ने) ही कहा है — "राम ब्रह्म परमारथ रूपा।" तो रामकृपा माने क्या हुआ? ब्रह्म की कृपा। अब ब्रह्म कोई व्यक्ति तो है नहीं। ब्रह्म कहीं कोई किसी प्रकार की भौतिक या अभौतिक शक्ति भी नहीं है। अदृश्य है, अलक्ष्य है या अप्रमेय है या अचिंत्य है।
तो रामकृपा से आशय क्या है? रामकृपा से क्या मतलब है, ये जानने के लिए वेदांत की प्रणाली पर वापस जाना पड़ेगा। प्रणाली किसकी है?









