मन जिस आयाम को देख सकता है, वो द्वैत का ही आयाम है। वहाँ उसे वो नहीं मिलता जिसकी उसे तलाश है। हमको तलाश तो सत्य की ही है, पर तरीके अनुचित हैं, क्योंकि हम होश में नहीं है। गुरु तुम्हें कुछ देता नहीं है, वो सिर्फ़ इशारा करता है कि गलत जगह खोज रहे हो। तलाश तो तुम्हारी सपना टूटने पर ही बुझेगी।
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हरि रासि मेरी मनु वणजारा सतिगुर ते रासि जाणी ।
-( श्री गुरु ग्रंथ साहिब)
अनुवाद : प्रभु हैं मेरा धन; मेरा मन है व्यापारी
आचार्य प्रशांत: हरि रासि मेरी मनु वणजारा सतिगुर ते रासि जाणी ।
बहुत सुन्दर पद है, समझेंगे। तीन हिस्से कर लीजिये।
१. हरि रासि मेरी
२. मनु वणजारा







