प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नितनेम साहिब ग्रन्थ को ध्यान में रखते हुए आज का मनुष्य समय में रहते हुए समयातीत को कैसे याद रख सकता है?
आचार्य प्रशांत: कह रहे हो समय में रहते हुए समयातीत को कैसे याद रखें? समय परेशान करेगा इसलिए समयातीत को याद रखना पड़ेगा; समय ही तो विधि है। समय द्वारा दी जा रही परेशानी और समयातीत के प्रति तुम्हारा प्यार; इन दोनों के अतिरिक्त कोई विधि हो सकती है क्या?
समय तुम्हें अगर परेशान करता हो तो तुम ज्ञानमार्गी हो जाओ। समयातीत से अगर तुम्हें प्रेम है तो तुम प्रेममार्गी हो जाओ। और कोई ऐसा नहीं होता जो इन दोनों में से बिलकुल किसी एक पाले में पड़ता हो। सब ऐसे होते हैं जिनको समय परेशान भी करता है और समयातीत आकर्षित भी करता है। इसीलिए हम सबको ‘ज्ञानप्रेम मार्गी' ही होना पड़ेगा। हम सबको ‘ध्यानीभक्त’ होना पड़ेगा।
बात समझ पा रहे हो?
समय परेशान करता है कि नहीं? ये जो पूरा प्रवाह है समय का, बदलाव का, ये भीतर लहरें पैदा करता है न? विक्षेप पैदा करता है न? तो समय से ज़्यादा उपयुक्त तुम्हें क्या विधि चाहिए बताओ?
तुम्हारी बात ऐसी है कि जैसे किसी के शरीर में खुजली हो और वो पूछे कि डॉक्टर के पास जाना याद कैसे रहे? तो मैं कहूँगा, खुजली ही तो विधि है। खुजली जब उठे तब तुम्हें ख़ुद ही स्मरण आ जाएगा कि चिकित्सक चाहिए।









