मन की दौड़ और जीत का भ्रम || आचार्य प्रशांत, गुरु नानकदेव पर (2014)

सोचै सोचि न होवई जे सोची लख वार ॥ चुपै चुप न होवई जे लाइ रहा लिव तार ॥ भुखिआ भुख न उतरी जे बंना पुरीआ भार ॥ सहस सिआणपा लख होहि त इक न चलै नालि ॥ किव सचिआरा होईऐ किव कूड़ै तुटै पालि ॥ हुकमि रजाई चलणा नानक लिखिआ नालि ॥१॥
आचार्य प्रशांत: “सोचै सोचि न होवई जे सोची लख वार। चुपै चुप न होवई जे लाइ रहा लिव तार। भुखिआ भुख न उतरी जे बंना पुरीआ भार।“ कौन है? किसकी बात हो रही है? कौन है जो सोचने में उद्यत रहता है? कौन है जो कभी चुप नहीं हो पाता? और कौन है जिसकी भूख, जिसकी अतृप्ति कभी मिटती नहीं है?
प्रश्नकर्ता: मन।
आचार्य: ठीक है। तो सोचने का विषय नहीं हो सकता वो। और मन एक ही साधन जानता है कुछ भी पाने का — सोच। मन के पास विचारणा के अलावा कोई ताक़त नहीं है। नानक शुरू में ही हमसे कह दे रहे हैं — “सोचै सोचि न होवई” — तुम लाख माथा फोड़ लो, तुम होगे बहुत बड़े चिन्तक, बहुत बड़े विचारक, पर चिन्तन और विचार तुम्हें सत्य तक नहीं ले जा सकते हैं। चिन्तन और विचार तुम्हें सत्य तक नहीं ले जा सकते। वो मात्र एक प्रकार का शोर हैं।
वो क्या है जो तुम्हें सच तक, परम तक ले कर जाएगा?
उसके ठीक बाद हमें बता देते हैं नानक — “चुपै चुप न होवई, जे लाइ रहा लिव तार।” 'चुप' है जो वहाँ तक ले जा सकती है, मौन में ही उसका नाद सुनायी देने लग जाता है। लेकिन विवशता ये है मन की कि वो मौन उसको मिलता ही नहीं है, क्योंकि उसके लिए मौन भी मात्र एक विचार है, एक





