बड़े मैच में उतरते ही हाथ बेड़ियों में जकड़े लगते हैं, और हम घबराहट सँभालने की कोई तरकीब खोजते हैं। पर मैदान बदल जाता है, भीतर का केंद्र नहीं बदलता। जो रोज़ की ज़िंदगी में हर काम से मनचाहा नतीजा माँगता है, वह बड़े दिन भी वही माँग लेकर उतरता है। मेडल पक्का होते ही दबाव उतर जाना भी यही बताता है, और जो जीत पर इतराता है, वही हार से घबराता है। ज़िंदगी की ऊँचाई हमेशा मेडल के रूप में सामने नहीं आती। क्या हम देख पाएँगे कि हम नतीजे को कितना पकड़े हुए हैं?
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प्रश्नकर्ता: मेरा नाम जय मीणा है। मैं भारतीय सॉफ़्ट टेनिस खिलाड़ी हूँ। और हमने एशियन गेम्स में भारत के लिए पहला ऐतिहासिक पद जीता है। [तालियाँ] मैं पिछले 16 साल से इस गेम में हूँ। एशियन गेम्स के जो पाँच दिन थे ना, सर, उस पाँच दिन में मैंने वो 16 साल देख लिए, स्टार्टिंग डे से लेके एंड डे तक।
जब एशियन गेम्स की ओपनिंग हो रही थी, उसके एक दिन पहले ही हम भारत को पहला पदक दिलाते, भारत का इंडोनेशिया से क्वार्टर फ़ाइनल मैच था। तो जब हम उस टाइम मैदान में उतरे थे तब मेरे मन में यह नहीं चल रहा था कि “मैं इस खेल को मज़े के लिए खेलूँगा।” “अब मैं, मेरे तिरंगे, 140 करोड़ देशवासियों को रिप्रेज़ेंट करता हूँ।” यह मेरी मेंटैलिटी उस टाइम मैदान में चल रही थी जिसके चलते मेरे हाथ में बेड़ियाँ लग गईं। किस चीज़ की ज़िम्मेदारी की है। खेलना कैसा था? आनंद के साथ। खेल कैसे? ज़िम्मेदारी मानकर। जिसके चलते मैं और हमारे साथी प्रेशर में आ गए और उसी के चलते हम हमारा ओरिजिनल गेम नहीं खेल पाए। हम मेडल हार गए, सर




