दो ही चीज़ें होती हैं जो जीवन को समृद्ध करती हैं — तन के लिए व्यायाम, मन के लिए अध्यात्म। युवा होने का अर्थ होता है कि सुडौल शरीर हो, विराट हृदय और दुनिया की समझ। दुनिया की सारी क्रांतियाँ जवान लोगों ने की हैं; क्रांति का मतलब एक नया सृजन होता है। वो जवानी जो पढ़ती नहीं, लिखती नहीं, जो अपने आप को बोध से भरती नहीं — वो जवानी व्यर्थ ही जा रही है।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, किसी भी काम को करने में मन क्यों नहीं लगता है?
आचार्य प्रशांत: अभी कल ही एक लड़का आया था मुझसे मिलने। वो मध्य प्रदेश के सागर जिले में खाद्य विभाग में काम करता है। नया लड़का है, अभी-अभी नौकरी का एंट्रेंस क्लियर किया है और डेढ़-दो साल से वो नौकरी कर रहा है। प्रतिभाशाली लड़का था तो अपना बताने लगा कि ज़िन्दगी खाली-खाली सी लगती है, सूनी लगती है।
ज़्यादातर बातें जो उसने मुझे बताईं जिन बातों से वो नाखुश था, वो उसके काम से संबंधित थी। उसने कहा कि वर्कप्लेस इशूज़(दफ़्तर से संबंधित समस्याएँ) हैं। सरकारी नौकरी है, इस तरह का माहौल है, इस तरह का अनुशासन रखना होता है और कई बार इस तरह की नकारात्मकता देखने को मिलती है।
तो कई बातें उसने बोलीं जो तकरीबन सभी जगहों पर पाई जाती हैं। ऐसा नहीं कि उसी के दफ़्तर में माहौल कुछ ख़ास ख़राब था, दुनियाभर के जगहों पर यही हालत है, चाहे पब्लिक सेक्टर, प्राइवेट सेक्टर, सरकारी या कोई भी और जगह। यहाँ तक कि फौज में भी यही हालत है। फौजियों से मिलता हूँ, वो भी अपनी कहानी ऐसे ही बताते हैं।




