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मेहनत पूरी करी, पर सफलता नहीं मिली (कोई बात नहीं!) || आचार्य प्रशांत, आइ.आइ.टी रुड़की में (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
27 min
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आचार्य प्रशांत: इक्कीस-चौबीस साल की उम्र में जब बाहर निकलते हो तो ये अचानक से पता चलता है, अरे! ये क्या हो गया? कैंपस में तो ऐसा होता था कि अगर मेहनत कर ली है तो मार्क्स आ जाते थे। थोड़ा ऊपर-नीचे हो जाते थे पर आ ही जाते थे। तो वहाँ पर एक कोरिलेशन (आपस में सम्बन्ध) होता था या ऐसे कह लो कि जो कोरिलेशन कोइफिशिएंट (सह सम्बन्ध गुणांक) काफ़ी हाई (ऊँचा) होता था, बिटवीन इनपुट एंड आउटपुट (इनपुट और आउटपुट के बीच)। तो पहली बात तो कोरिलेशन हाई है और दूसरी बात इनपुट वेरिएबल्स क्या हैं ये साफ़-साफ़ पता था, डिज़ायर्ड (मनचाहा) आउटपुट पाने के लिए कौन-कौन से बटन दबाने हैं, ये पता था। बाहर की दुनिया में इतने सारे वेरिएबल्स आ जाते हैं कि आपको कुछ नहीं पता कौनसी चीज़ किस दूसरी चीज़ से डिक्टेट (संचालित) हो रही है, ठीक है?

तो क्या करें इंसान? ये तो नहीं पता क्या करे पर ये पता है कि क्या न करे। आप रिज़ल्ट्स (परिणामों) के भिखारी होकर के नहीं चल सकते। आप ये सोचकर नहीं चल सकते कि मैं काम कर रहा हूँ और मैं अपनेआप को सन्तुष्ट तभी मानूॅंगा, जब रिज़ल्ट मेरे हिसाब से आ जाएगा। क्योंकि इतनी सारी चीज़ें लगतीं हैं उस रिज़ल्ट में जिसकी कोई गिनती नहीं है। इसके अलावा उन सारी चीज़ों में से निन्यानवे प्रतिशत चीज़ों पर आपका कोई कन्ट्रोल (नियंत्रण) भी नहीं है, समझे?

और इसमें आपकी ग़लती नहीं है कि आपका कोई कन्ट्रोल नहीं है। कुछ भी हो सकता है, कैसे भी हो सकता है, प्रकृति है ही इसी तरीक़े की। तो जीवन का एक नियम है कि जो लोग रिज़ल्ट ओरिएन्टेड (परिणामोन्मुखी) होकर जीते हैं, वो हमेशा दुखी रहते हैं, चोट खाते रहते हैं, परेशान होते रहते हैं। उन्होंने बहुत मेहनत करी हो तो भी परेशान होते हैं, नहीं मेहनत-वेहनत करी है, काम ही नहीं करा है ईमानदारी से तब तो उनको कुछ मिलेगा भी नहीं वैसे भी।

उन्होंने बहुत ईमानदारी से काम कर भी दिया है, वो तो भी फ्रस्टेट (परेशान) होंगे, क्योंकि ज़िन्दगी तुम्हारी ईमानदारी से नहीं चलती है, ज़िन्दगी के अपने दूसरे नियम हैं। तो ये बातें जिन लोगों ने समझी हैं, फिर उन्होंने ये सलाह दी है, निष्काम कर्म। कि बेटा वो करो न, जिसपर तुम्हारा हक़ चलता है, आउटपुट (परिणाम) पर तुम्हारा अधिकार नहीं है। बस नहीं है तो नहीं है, क्यों नहीं है? मत पूछो। आउटपुट पर किसी का अधिकार नहीं है क्योंकि *आउटपुट इज़ अ फंक्शन ऑफ ए वन, ए टू, ए थ्री … और बी वन, बी टू, बी थ्री, बी फोर, एक्स वन, एक्स टू, टिल इनफिनिटी*। (परिणाम अनन्त कारणों पर निर्भर करता है)

आउटपुट इतने वेरिएबल्स का फंक्शन (संयोग) है, हमें ये तक नहीं पता कि कितने वेरिएबल्स का फंक्शन है, हमें कुछ नहीं पता। और तुर्रा ये है कि हम कहते हैं कि मुझे आउटपुट वो चाहिए जो मैं माँग रहा हूँ। मेरा जो डिज़ायर्ड आउटपुट (मनचाहा परिणाम) है। आउटपुट समझ रहे हो न? जो भी गोल है आपका, जो भी परिणाम है। हम कहते मुझे तो वही चाहिए, मुझे तो वही चाहिए। भाई एक कंट्रोल सिस्टम (संचालित व्यवस्था) नहीं है न यूनिवर्स (ब्रह्माण्ड)। एवर एक्सपेंडिंग यूनिवर्स (निरन्तर विस्तारित ब्रह्माण्ड) है, ओवर एक्सपेंडिंग एन्ट्रापी है। यहाँ तो रैंडमनेस (अनियमितता) भी बढ़ रही है। इतनी चीज़ें हैं जो बाहर की दुनिया में ही नहीं पता और भीतर की दुनिया का तो कहना ही क्या! वहाँ तो कुछ भी नहीं पता। तुम इस टोटली अनप्रेडिक्टेबल (पूर्णतया अप्रत्याशित) और अननोन (अनजानी) दुनिया को क्या करना चाहते हो?

श्रोता: कन्ट्रोल

आचार्य: तो वो हो सकता है क्या?

श्रोता: जी नहीं।

आचार्य: तो फिर इसीलिए कृष्ण बोले गये—

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ।।४७।।

कर्म में ही तुम्हारा अधिकार है, कभी कर्मफल में नहीं, क्योंकि वह तुम्हारे अधिकार से बाहर है; तुम कर्मफल की आशा से कर्म में प्रवृत्त मत होओ, फिर कर्मत्याग में भी तुम्हारी प्रवृत्ति न हो अर्थात् अपना कर्तव्य-कर्म करते चलो।

~ श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय २, श्लोक ४७)

“कर्मण्येवाधिकारस्ते” तुम्हारा जो अधिकार है वो सिर्फ़ अपनी ज़िन्दगी पर है भाई! कि मैं क्या कर रहा हूँ। अपने खोपड़े पर अपना अधिकार है, अपने कर्म पर अधिकार है। किसपर अधिकार नहीं है? “मा फलेषु कदाचन” मा माने नहीं, फल पर कदाचित भी अधिकार नहीं है, एकदम भी नहीं है, शून्य। जो लोग गोल ओरिएन्टेड (परिणामोन्मुखी) होकर जिऍंगे, उनको सिर्फ़ सफ़रिंग (दुख) मिलेगी। गोल ओरिएन्टेड होकर आप कहाँ जी सकते हो? स्माल (छोटे) और लिमिटेड सिस्टम्स (सीमित व्यवस्थाओं) में। लिमिटेड सिस्टम्स में गोल ओरिएन्टेशन चल सकता है क्योंकि वहाँ नंबर ऑफ़ वेरिएबल्स कम होते हैं तो प्रेडिक्टेबिलिटी (अनुमान) और कन्ट्रोल दोनों रहता है। लाइफ (जीवन) क्या है? एक ह्यूज सिस्टम (बड़ी व्यवस्था) जिसमें नंबर ऑफ़ वेरिएबल्स बहुत ज़्यादा हैं।

तो इसीलिए “कर्मण्येवाधिकारस्ते”। तुम्हारा जो अधिकार है, वो सिर्फ़ तुम्हारे काम पर है। जान लगाकर सही काम करो और उसके आगे मत देखो। मत सोचो कि इसकी वजह से अब कल क्या होगा? क्योंकि तुम कुछ भी सोच लो तुमने जो सोचा है कल वो तो नहीं होगा। तो सोच ही क्यों रहे हो? क्यों सोच रहे हो इतना? और कभी तुक्का लग गया, तुमने जो सोचा था कल वो हो गया। तो ये और ख़तरनाक बात है। क्यों?

श्रोता: तो फिर आगे की सोचेंगे।

आचार्य: नहीं, तुम एक रैंडम कोइंसीडेंस (अनायास घटना) को कॉज़ेशन (कारण जनित) समझ लोगे। काज़ेशन क्या होता है? काज़ेशन का मतलब होता है, आज मैंने कुछ करा उससे कल कुछ हुआ। और कोइंसिडेंस क्या होता है?

श्रोता: इत्तिफाक़।

आचार्य: बस इत्तिफाक़, अनायास, हो गया। जो कोइंसिडेंटल (अनायास) था, उसको तुमने कॉज़्ड (कारण जनित) मान लिया तो तुम्हारा इनर एल्गोरिदम (भीतरी गणित) ख़राब हो जाएगा। भाई एक्स करा कल आउटपुट वाई आ गया। तुम सोचोगे, *एक्स कॉज़ेज़ वाई*। तो तुम बार-बार एक्स करोगे इस उम्मीद में..

श्रोता: कि वाई आएगा।

आचार्य: वाई आएगा नहीं। फिर तुम फ्रस्टेट होओगे, कहोगे, आया नहीं उस बार तो आ गया था। उस बार भी नहीं आया था, कभी नहीं आता। वो बस ऐसे ही है कि कभी तुक्का लग गया तो लग गया। ज़िन्दगी तुक्के पर नहीं जी जा सकती न? तो इसलिए कृष्ण ने बोला कि ज़िन्दगी जिस चीज़ पर जी जा सकती है, बेटा उसपर जान लगाओ। ज़िन्दगी जी जा सकती है कि अपनी ओर से जो सही है उसको पूरा डूबकर करो और उसमें इतना डूब जाओ कि आगे-पीछे सोचने का होश बचे नहीं। बस यही है हमारे वश में।

प्रश्नकर्ता: तो जैसे अगर रिज़ल्ट मन के मुताबिक नहीं आया तो हम अपने एक्शन्स (कर्मों) को चाहते हैं कि कन्ट्रोल कर लें।

आचार्य: एक मन होता है जो पहले रिज़ल्ट की सोचता है फिर उस रिज़ल्ट को पाने के लिए क्या एक्शन करना चाहिए वो एक्शन करता है। ज़्यादातर लोग ऐसे ही होते हैं। उनको क्या चाहिए?

श्रोता: रिज़ल्ट।

आचार्य: तो वो पहले क्या सोचते हैं?

श्रोता: रिज़ल्ट।

आचार्य: और फिर कहते हैं, रिज़ल्ट पाना है तो फिर मुझे क्या करना चाहिए और जो करना चाहिए वो करने लग जाते हैं, है न? ये सब भी छोटे सिस्टम्स में चल जाता है। जो जानने वालों ने कहा है, उन्होंने कहा है कि तुम्हारे मन में पहले रिज़ल्ट नहीं आना चाहिए, तुम्हारे मन में पहले राइटनेस आनी चाहिए। कामना पहले नहीं आती, धर्म पहले आता है। धर्म समझ रहे हो? धर्म माने ये नहीं हिन्दू, मुसलमान वगैरह। धर्म माने क्या? जो करना उचित है, जो करना आवश्यक है, तुम वो करो। रिज़ल्ट क्या होगा, मत सोचो। हमारी गाड़ी उल्टी चलती है, हम पहले सोचते हैं कि मुझे कौनसा रिज़ल्ट चाहिए? मुझे फ़लानी चीज़ अच्छी लग गयी, मुझे उसको पाना है। यही होता है न? इसी को हम अपना डिज़ायर (इच्छा) बनाते हैं। यही टारगेट (लक्ष्य) बन जाती है।

जानने वाले कह रहे है नहीं, जो ऐसे चलेंगे, उनको फिर सज़ा मिल जाती है। सज़ा क्या मिलती है?, सफरिंग , फ्रस्ट्रेशन। कह रहे हैं, अगर उससे बचना है तो तुम वो पकड़ो जो सही है और जो सही है उसको करना ही अपनेआप में मैक्सिमम रिज़ल्ट (अधिकतम परिणाम) है। फिर ग्रैटिच्यूड (कृतज्ञता) इस बात का रहता है कि जो सही है वो मुझे करने को मिला। फिर इस बात का इन्तज़ार नहीं रहता कि मैंने सही काम कर दिया है, अब एक हफ़्ते बाद इसका रिज़ल्ट आएगा। फिर आप एक हफ़्ता इन्तज़ार नहीं करते जो आपने करा है वो ठीक है, एकदम ठीक है तो हो गया न, मिल तो गया *रिज़ल्ट*। क्या रिज़ल्ट मिल गया?

श्रोता: ठीक काम किया।

आचार्य: ठीक काम करा और ठीक काम करने में आनन्द है। बस हो गया, ख़त्म बात। क्या है, कुछ नहीं।

प्र२: सर, सही और ग़लत में भेद कैसे जानें?

आचार्य: आज हमने क्या बात करी थी सत्र में, सही और ग़लत का क्या पैमाना होता है? एक अन्त में सवाल आया था न, शेर ने हिरण को मार दिया तो मैंने क्या कहा था कि ज़िन्दगी में कभी भी कैसे नापना है क्या सही, क्या ग़लत? कैसे पता करना है?

जो कुछ भी दिमाग को साफ़ करे, जिसपर चलकर जो चीज़ें उलझी हुईं हों वो समझ में आने लगें वो सही है। और जो कुछ भी दिमाग को और गन्दा कर दे, दूषित कर दे, और उलझा दे, परनिर्भर और डरपोक बना दे वो ग़लत है। बस, ऐसे ही तय करते हैं। तो सही काम क्या है, जिसकी हम बात कर रहे हैं कि उसमें डूब जाओ और रिज़ल्ट की परवाह करे बिना?

सही काम क्या है फिर? वो काम जो अपनी और दूसरों की ज़िन्दगी को साफ़ करता हो, मन को बेहतर करता हो, जो उलझनें थीं वो हटतीं हों, जो बात पहले समझ में नहीं आतीं थीं वो समझने लग गये। जो छुटपन और एकदम पेटिनेस (संकुचन) रहती है दिमाग में, वृत्तियों में वो हटने लग गयी। जो भी काम ऐसा है उसको करने में साहस लगता है, धीरज रखना पड़ता है, वो काम अगर तुम कर रहे हो तो फिर रिज़ल्ट की सोचनी नहीं चाहिए। तो उसी बात को ऐसे कह देते हैं कि उस काम का रिज़ल्ट वो काम ख़ुद है। उस काम का रिज़ल्ट वो काम है। फिर तुमसे कोई पूछता है रिज़ल्ट क्या मिला? तुम बोलते हो, मुझे काम करने को मिला, यही रिज़ल्ट है। और क्या रिज़ल्ट चाहिए? आगे थोड़े ही रिज़ल्ट मिलेगा, मिल गया *रिज़ल्ट*।

प्र३: आचार्य जी, जैसे बच्चे कोटा तैयारी करने जाते हैं तो घर वाले यही बोलते हैं कि अपने काम-से-काम रखना, ज़्यादा फालतू वहाँ पर इनवॉल्व (लिप्त) मत होना किसी चीज़ में। अद्वैत वेदान्त जो बोलता है कि जीवन में ज़्यादा इन्वॉल्व मत हो। इनवाल्व का मतलब कि ये मेरा शरीर है, ये खम्भा है, ये सारी चीज़ें हैं तो अगर मैं ऐसे बोलूॅं कि अद्वैत वेदान्त में क्योंकि पूरा दर्शन तर्क पर टिका हुआ है। अद्वैत वेदान्त ने जो बोल दिया है और जैसे सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने भी बोला कि उसके आगे कोई दर्शन है ही नहीं, वो एक सीमा है, जहाँ के आगे कोई सोच नहीं सकता कभी। मैं ये बोलता हूँ कि वो केवल एक कॉन्सेप्ट (धारणा) है जिससे कि आपने सारा जो रियलाइज़ेशन (जानना) था न, उसको स्वप्न बना दिया।

आचार्य: आपने रियलाइज़ (जानने) करने वाले को स्वप्न देख लिया, बना नहीं दिया। रियलाइज़ेशन को स्वप्न नहीं बनाया है जो रियलाइज़ करने वाला है वो स्वयं स्वप्न है ये जान लिया है। मुझे सपना दिखाई नहीं पड़ रहा है, मुझे सपना दिखाई नहीं पड़ रहा है। पूरा करो?

श्रोता: मैं ख़ुद ही सपना हूँ।

आचार्य: मैं स्वयं सपना हूँ। नागार्जुन के सपने में तितली आयी या तितली के सपने में नागार्जुन आये? ये एक बौद्ध कहानी है, पुरानी।

प्र: लेकिन इस तरह तो हमने जो तर्क है कुछ भी, उसपर ताला लगा दिया, कम्प्लीटली (पूर्णतया) कि इससे आगे अब हम सोच ही नहीं सकते?

आचार्य: हम तर्क की बात नहीं कर रहे हैं, हम तर्ककर्ता की बात कर रहे हैं, हम तर्क करने वाले की बात कर हैं। तर्क तो आपके लिए, एक ऑब्जेक्ट (विषय) है। अद्वैत वेदान्त पकड़कर के जो सब्जेक्ट (विषयी) है, तर्क करने वाला, ‘तर्ककार’ वो उसकी बात करता है। ये जो तुम्हारा तर्क उठ रहा है, कहाँ से उठ रहा है? तुम्हारे शरीर से ही तो उठ रहा है, तुम्हारे मस्तिष्क से उठ रहा है, जो तुमने खाया-पिया उससे उठ रहा है, रात में तुम कुछ और खा लेते तुम्हारा तर्क दूसरा हो जाता।

बड़े तर्कवादी हो अभी थोड़ी शराब पी लो देखो तुम्हारा सारा तर्क उलट जाएगा बिलकुल। तो तुम हो कहाँ? जो तुम्हें पिताजी से जीन्स मिल गये और दोस्तों से शराब मिल गयी, उसको तुम कह देते हो ये मैं हूँ। और फिर वो जो मैं तर्क करता है, तुम उस तर्क को साबित करने में जुट जाते हो। तर्क को हटा दो, हम तर्क की बात बाद में करेंगे। ये जो तर्ककार है वो ख़ुद संसार की मिट्टी से उठा है उसका अपना कोई अस्तित्व नहीं है। वो वैसे ही है कि ‘कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानुमति ने कुनबा जोड़ा।’ पचास जगह के प्रभाव एक में संकलित होकर बन जाते हैं कुछ, जिसको तुम बोलने लग जाते हो ‘मैं’। तो ये जो तर्ककार है ये स्वयं मिथ्या है इसका तर्क क्या सुनें हम?

प्र४: सर, बाहरवीं के बाद मैंने बीएससी की, अब लगता है कि नहीं करना चाहिए था, लेकिन उस समय मुझे इतनी समझ नहीं थी, जो ठीक लगा वो किया। तो कैसे जाने हमें आगे क्या करना चाहिए, मतलब चुनाव कैसे करे?

आचार्य: दो लिस्ट्स बना लो। ये सबके लिए है जो भी लोग चुनना चाहते हों कि आगे ज़िन्दगी में क्या करना है। दो लिस्ट बनाओ अगल-बगल। पहली, कौन-कौनसी चीज़ें मुझे तकलीफ़ दे रहीं हैं। दूसरी, कौन-कौनसी चीज़ें दुनिया को तकलीफ़ दे रहीं हैं। उनमें देखो कि इन्टरसेक्शन (साझापन) कहाँ पर हो रहा है दोनों लिस्ट्स में, कॉमन (एक जैसा) क्या है? और जो-जो कॉमन आयें चीज़ें, उनमें ये देख लो कि तुम जिस हालत में खड़े हो, तुम्हारे पास जो रिसोर्सेज़ (संसाधन) वगैरह हैं और ज्ञान है और ताक़त है, जो भी समय है, उसमें अभी तुम्हें प्रैक्टिकल (व्यावहारिक) क्या लग रहा है अपने लिए? जो लग रहा है, वही तुम्हारे लिए जीवन का उचित काम है।

काम का निर्धारण कैसे होना है? मैं जहाँ फॅंसा हुआ हूँ भीतर से; कौन-कौनसी चीज़ें हैं, मुझे जो सबसे ज़्यादा तकलीफ़ देतीं हैं? फिर दुनिया की ओर नज़र करो कि दुनिया में आज कौनसी चीज़ें हैं जो बहुत क्रिटिकल (गम्भीर) हैं फिर इन दोनों में देखो, इन्टरसेक्शन कहाँ है और जो उसमें एलिमेन्ट्स (तत्व) आयें उनमें से जो एलिमेंट्स तुमको प्रैक्टिकली फिज़िबल (क्षमता अनुसार) लगें इम्प्लीमेंट (कार्यान्वित) करने को, उसको उठाकर कर डालो, ठीक है।

ये भी हो सकता है कि जो अभी प्रैक्टिकल लग रहा हो वो उस लिस्ट में तीसरे-चौथे नंबर की चीज़ हो। पहली वाली चीज़ तुमने क्यों नहीं उठायी? क्योंकि अभी वो तुम्हारे सामर्थ्य से बाहर की हो सकती है, हो सकता है जो पहले नंबर की चीज़ हो वो शुरू करने के लिए ही दस करोड़ की राशि लगती, तुम्हारे पास दस करोड़ अभी नहीं है तो तुम वो चीज़ नहीं शुरू कर सकते। तुम तीसरे नंबर की चीज़ से शुरू करो, धीरे-धीरे करके पहले पर भी पहुँच जाओगे। लेकिन हमेशा कुछ ऐसा करना जिससे तुम्हारी ज़िन्दगी भी बेहतर होती है और दुनिया भी बेहतर होती है।

कुछ अगर ऐसा जो तुम्हारे लिए अच्छा है, दुनिया के लिए नहीं तो वो तुम्हारे लिए भी अच्छा नहीं होगा। और कुछ ऐसा है जिसमें दुनिया की बहुत भलाई है पर तुम्हें लग रहा है मेरी कोई भलाई नहीं है तो तुम ग़लत सोच रहे हो। किसी चीज़ में अगर वाकई दुनिया का हित है तो उसमें तुम्हारा भी अपना हित ज़रूर होगा, तुम्हें अभी दिख नहीं रहा है। कर डालो बस।

प्र५: सर, एक मेरा सवाल है। सर, आपने जो प्रेक्टिसेज़ (अभ्यास) बतायी, सर, अगर मैं वह फॉलो (अनुसरण) कर रही हूँ लेकिन जो मेरे क्लोज्ड वन (क़रीबी लोग) हैं, मेरे फैमिली , फ्रेंड्स , वो नहीं उस चीज़ को फॉलो कर रहे हैं तो उन्हें क्या लगता है कि मैं ग़लत हूँ।

आचार्य: कौन सी प्रैक्टिसेज़?

प्र: सर, जैसे रियल-अनरियल (वास्तविक-अवास्तविक) जो आपने अभी बताया तो उन्हें लगता है, मैं ग़लत हूँ, मैं सबसे अलग हो चुकी हूँ अभी और घर वाले बोलते हैं कि पढ़ा-लिखाकर ग़लती कर दी कि तुम अभी ऐसी बातें करने लगी हो तो सर, ऐसे में कैसे समझायें जो हमारे क़रीबी, प्रिय लोग हैं उनको?

आचार्य: देखो, दोनों तरफ़ से तैयारी होनी चाहिए, ठीक है। जो सीखने वाला है, अगर वो तैयार ही नहीं हो रहा है तो पत्थर पर सर फोड़ लोगी, मर जाओगी, कुछ मिलेगा नहीं। सन्तों ने भी मज़बूरी स्वीकार कर ली है, एक जगह पर आकर के।

गुरु बेचारा क्या करे, शब्द न लागे अंग। कहे कबीर काली चादर, कैसे चाढ़े रंग।।

~कबीर साहब

गुरु पूरी जान दे रहा है और उसको कुछ समझ में ही नहीं आ रही है बात तो फिर गुरु ने भी ऐसे हाथ खड़े कर दिये कि काली चद्दर है ये, मैं इसपर कुछ भी कर लूँ, इसपर रंग नहीं चढ़ने का। तो तैयारी दोनों ओर से होनी चाहिए, आपकी ओर से इच्छा होनी चाहिए, घर वाले भी तो तैयार होनें चाहिए न? नहीं है तो वहाँ बार-बार कोशिश करना अपने समय और ऊर्जा की बर्बादी है। हाँ, कोशिश करनी ज़रूर चाहिए, कोशिश करो, नहीं सुन रहे तो धैर्य रखकर पीछे हट जाओ, कहो कि जब फिर सही समय आएगा, तब फिर कोशिश कर लूॅंगी। लेकिन बुरा मत मानो, इसमें कोई अपना अपमान नहीं हो गया, न अपनी असफलता हो गयी, हर इंसान, हर समय, सच्चाई सुनने की स्थिति में नहीं होता है तो उसपर ज़्यादा सच्चाई वगैरह बताना व्यर्थ ही जाएगा, रिश्ते और ज़्यादा ख़राब कर लोगे।

प्र: हाँ लेकिन सर, वो प्रैक्टिस फॉलो करते हैं, जैसे पूजा करना एंड आल अदर थिंग्स फिर भी सफ़रिंग (दुख) में हैं।

आचार्य: हाँ, वो सफ़र (दुखी) कर रहे हैं पर उनमें ये भाव तो उठे कि हमें अपनी सफरिंग बन्द करनी है?

प्र: हाँ सर, ये चीज़ नहीं है।

आचार्य: नहीं है, क्योंकि आम आदमी अपनी सफरिंग के साथ समझौता कर लेता है न कि सफरिंग है और इसी का नाम ज़िन्दगी है। फिर कोई आकर अगर तुम्हारी सफरिंग हटाये तो तुम्हें लगता है उसने क्या हटा दी? ज़िन्दगी। सफरिंग बराबर ज़िन्दगी। तो अगर कोई आपकी सफरिंग हटाने आता है तो आपको क्या लगता है? उसने क्या हटा दी?

श्रोता: ज़िन्दगी।

आचार्य: ज़िन्दगी हटा दी तो आप क्या हो गये? मुर्दा। ज़िन्दगी हट गयी तो आप मुर्दा हो गये तो आप उसको बोलते हो तू मेरी जान लेने आया है। वो आपकी सफरिंग लेने आया है और आप उसको बोलते हो?

श्रोता: तू मेरी जान लेने आया है।

आचार्य: तू मेरी जान लेने आया है। ठीक है। तो कोशिश करनी चाहिए, घर वालों पर, पूरी दुनिया पर, लेकिन कोशिश करते उसी पर रहो जो तुम्हारी कोशिशों में साझीदार हो रहा हो। अपनी ओर से शुरुआत सबपर करो, सबको दो कि जो मैं देना चाहता हूँ, लो-लो-लो! लेकिन और-और-और लगातार उसी को दो, जो तुम्हारी दी हुई चीज़ को ले भी तो रहा हो न। तुम तो दे रहे हो, ले तो रहा नहीं। तुम्हारा दिया सब कहाँ गया?

श्रोता: व्यर्थ।

आचार्य: और तुम्हारे पास समय सीमित है, ऊर्जा सीमित है। उतना समय तुमने किसी एलिजिबल (सुपात्र) आदमी पर लगा दिया होता तो उसका फ़ायदा भी हो जाता। तो तुमने ग़लती कर दी न? बल्कि नाइंसाफी कर दी न? जितना तुमने समय लगा दिया एक ऐसे आदमी पर जो अभी तैयार ही नहीं हो रहा है, सुनने के लिए क्यों उसपर बहुत मेहनत कर रहे हो?

प्र: सर, एक सन्देह और है कि कई बार कुछ ऐसे विचार आते हैं जो बहुत डिस्टर्बिंग होते हैं, वो पूरा इनर पीस (आन्तरिक शान्ति) जो होता है वो ख़राब हो जाता है तो उस चीज़ से कैसे निकलें?

आचार्य: काम करते रहो अपना। ये ऐसी सी बात है कि मन्ज़िल की ओर जा रहे हैं, कई बार बहुत ख़राब हिस्सा आ जाता है रोड का तो क्या करना होता है?

श्रोता: चलते रहो।

आचार्य: चलाते रहो गाड़ी और क्या करोगे? तुम अपनी मन्ज़िल थोड़े ही बदल दोगे। न मन्ज़िल बदल सकते हो, न रुक सकते हो, गड्ढे भी आ गये तो भी गाड़ी तो चलानी है, हाँ, अब तकलीफ़ से चलेगी कुछ देर तक, धीरे चलेगी, पर रुकना नहीं है भाई! रुकना नहीं है या रुक जाना है?

श्रोता नहीं।

आचार्य: क्रिकेट खेल रहे हो और बीच में सामने कोई फास्ट बॉलर आ गया, उसका स्पेल चल रहा है धुऑंधार। तो क्या करोगे?

श्रोता: डिफेंस। (बचाव)

आचार्य: अब वो आया है और उसका चार या पाॅंच ओवर का स्पेल है और सौ मील से डाल रहा है वो गेंद, तो क्या करना है? वो चार-पाॅंच ओवर? निकालो! निकालो भाई! झेलो, निकालो, सहो, बर्दाश्त करो। पाॅंच-सात बार गेंद यहाँ लगेगी, यहाँ लगेगी, मुँह पर लगेगी, जहाँ भी लग रही हो बर्दाश्त करो। और जब ये हट जाएगा, अगला वाला आएगा फिर मारेंगे, फिर मारेंगे लेकिन अभी अगर धीरज तोड़ दिया और बेताब हो गए और कुछ इधर-उधर की हरक़त कर दी तो फिर किसी को मारने लायक नहीं बचोगे। या तो विकेट टूट जाएगा या मुँह टूट जाएगा, दोनों ही हालत में आगे कहानी चलेगी नहीं।

प्र६: आचार्य जी, अभी जो पेरेंट्स (माता-पिता) वाला प्रश्न आया था तो उसमें पेरेंट्स एक चीज़ ये भी बोलते हैं, एक एजुकेशन है न, जैसे मैंने बचपन से देखा है कि किसी का सच्चा प्रयास नहीं है, बच्चों को स्कूल भेजने का। सब लोग जा रहे हैं तो बेटा जाओ! तुम भी जाओ! घर पर क्या हल्ला करोगे, तुम भी जाओ! देखता हूँ कि बस फाॅर्मेलिटी के लिए उसको ज़ोर दे रहे हैं। सर, जैसे दसवीं का बच्चा है उसे पढ़ने के लिए एक माहौल चाहिए, अब बच्चा छोटा होता है, पढ़ने के प्रति इतना जागरूक नहीं होता, तो वो कहते हैं, चलो यार पढ़ लेगा, जो कर लेगा, कर लेगा। इसे कलेक्टर थोड़े ही न बनाना है। और आगे प्रोपोगेट (बढ़ा-चढ़ाकर) करके बोलते हैं, नहीं ज़्यादा पढ़ लेगा तो वो अपने काम का नहीं रहेगा वो इतना डायरेक्ट (सीधा) नहीं बोलते हैं लेकिन बोलते हैं।

आचार्य: बस तुम लोग इस तरह के माॅं-बाप मत बनना। बाक़ी दुनिया में जो कर रहा हो, भाॅंति-भाॅंति के लोग होते हैं, ऊँचे-से-ऊँचे भी होते हैं, गिरे हुए भी बहुत होते हैं। जितनी तुम बात कर रहे उससे भी ज़्यादा गिरी हुई बातें करते हैं लोग। बस तुम ये सब मत करना इतना काफ़ी है।

प्र७: और आचार्य जी इसके अपोजिट (विपरीत) जो पेरेंट्स होते हैं कि तुम्हें आईएएस ही बनना है, हमारी सारी उम्मीदें तुम पर टिकी हुई हैं।

आचार्य: वो भी तुम मत करना।

प्र: तो आचार्य जी बच्चे के लिए मेरा बेटा है सात साल का, मतलब बच्चे के लिए कैसे मैं डिसाइड नहीं करूँ लेकिन मैं उसको कैसे फलने-फूलने दूँ?

आचार्य: फलने-फूलने का कार्यक्रम अपनेआप हो जाएगा। जो गन्दगियाॅं उसे प्रभावित करतीं हैं उससे जिस सीमा तक उसको बचा सकते हो, बचाओ। बस इतना एक अभिभावक का दारोमदार होता है। जानते हो न कहाँ-कहाँ से आती है गन्दगी एक बच्चे के दिमाग में? कोशिश करो कि उन चीज़ों को ब्लॉक (बाधित) कर सको, जब तक कर सकते हो। उसके आगे तो कोई किसी का भाग्य विधाता तो हो नहीं सकता, लेकिन बाप होने के नाते जितना तुम उसके जीवन को गन्दगी से बचा सकते हो बचाओ।

प्र: उसकी जैसे किसी से लड़ाई हो गयी, कुछ हो गया, छोटी छोटी चीज़ों पर। लेकिन हम उसे कैसे आत्मनिर्भर बनायें? क्योंकि उसका आत्मनिर्भर होना बहुत ज़रूरी है।

आचार्य: ये जो बातचीत चल रही है इसको सरल बनाकर के, बच्चे के लिए बोधगम्य में बनाकर के, करो बात घर में, करी जा सकती है, करो!

प्र८: आचार्य जी, जैसे अभी हम बातचीत कर रहे हैं तो हमारा उसमें मकसद ये है कि अगर मैं सुन रहा हूँ तो इसपर प्रतिप्रश्न करूँगा। आमतौर पर दुनिया में जो बातचीत होती है तो वो बस ऐसी है कि दो लोग मिल गये, टाइम पास कर रहे हैं, बातचीत कर रहे हैं। तो जब किसी को बोलो न कि नहीं यार! ये बात बोली तो फॉलोअप (प्रतिप्रश्न) भी तो लेना है तो वो लोग बड़ा अजीब सा बर्ताव करते हैं, ऐसा क्यों है?

आचार्य: तुम करना फॉलोअप न। लोग कैसे हैं, छोड़ो उनकी निंदा! हर तरीक़े के लोग हैं।

प्र: जैसे मैं वीगनिज़्म पर बात कर रहा हूँ, बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो मेरे तर्क वगैरह से सहमत होते हैं, बहुत अच्छा संवाद होता है, पर आख़िरी में वो कहते हैं, अरे! यार ऐसा थोड़े ही होता है प्रैक्टिकल (व्यवहार) में। क्या कैसी बात कर दी? मतलब ज़्यादातर जो कन्वर्सेशन (बातचीत) होते हैं किसी से भी, बहुत अच्छे कनवर्सेशन्स होते है कि हाँ यार! ऐसा होना चाहिए।

आचार्य: हाँ, मनोरंजन अच्छा रहता है।

प्र: हाँ, बस बिलकुल एंटरटेनमेंट के लेवल पर ही बात होती है तो ये बात करनी चाहिए कि नहीं करनी चाहिए?

आचार्य: कुछ नहीं, अब तुम्हारा काम है, ऐसे-ऐसे करके बीज उछालते रहना, पत्थर पर पड़ेगा तो उसमें से कुछ नहीं निकलेगा, पर हर जगह पत्थर-ही-पत्थर नहीं है, कहीं सही लोग भी हैं उनको मिल जाएगा। दुनिया की लगभग एक प्रतिशत आबादी हो चुकी है, शुद्ध शाकाहारी, वीगन हो चुकी है। और आठ सौ करोड़ लोगों की दुनिया में एक प्रतिशत भी कितना होता है?

श्रोता: आठ करोड़।

आचार्य: आठ करोड़ लोग कोई कम होते हैं क्या? जानते हो, आठ करोड़ की संख्या दुनिया के ज़्यादातर देशों की आबादी से ज़्यादा हैं। आठ करोड़ लोग हो चुके हैं लेकिन जिसको अभी दूध-दही का लोभ नहीं जा रहा, अब नहीं जा रहा है, तुम क्या कर लोगे उसमें? कोई अच्छा काम अगर करना है तो बस ये मत करना कि काम करके उसका परिणाम नापने लग जाओ, बार-बार, दिल बहुत टूटेगा, पहले से बता रहा हूँ।

चुपचाप जो काम सही है करते रहो, करते रहो, करते रहो। और जिस दिन ये लगे की अब काम करना भी असम्भव हो गया है, बोरिया-बिस्तर बाँधकर रवाना हो जाओ। पर ये मत करना कि मैं कर रहा हूँ और देख रहा हूँ कि कितना परिणाम आया। तुम्हारी कैलकुलेशन (जोड़-घटाव) तुम्हारे हिसाब से हो सकता है चल भी दे तो भी उन कैलकुलेशन्स से तुम्हें वो नहीं मिलेगा जो तुम सोच रहे हो। ये दुनिया किसी की नहीं है, यहाँ जिसने उम्मीद बाँधी है, उसने ही ठोकर खायी है, ठीक है?

मस्त काम करो, डूबकर करो, सब कुछ करो। काम में पूरा दिल लगा दो, बस अंजाम से दिल मत लगाना। और जब अंजाम अपने हिसाब से आये क्योंकि हम उम्मीदें तो बाँध ही लेते हैं। अंजाम अपने हिसाब से न आये तो कहना ये तो होना ही था। हम होशियार हैं, हमें पहले से पता था तो चलो कुछ बुरा लगा तो साथ में अच्छा भी लग गया, मुझे तो पहले ही पता था। लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि तुम काम में ही कोताही करना शुरू कर दो कि अंजाम तो गड़बड़ आना है। काम तो मस्त करना, एक नंबर का, डूबकर। ज़रा भी उसमें कहीं मीन-मेख नहीं बचनी चाहिए।

प्र९: प्रणाम आचार्य जी, मेरा नाम मोहित है, मैं यहाँ पीएचडी स्कॉलर हूँ तो मैं ये जानना चाहता हूँ कि कुछ चीज़ों को हम मना नहीं कर पाते बड़ों को, जिनसे हम सीख रहे हैं और कई बार हम नहीं करना चाहते वो काम, लेकिन हम किस तरीक़े से मना करें उनको? कई जगहों पर हम उन्हें मना नहीं कर सकते तो अब वहाँ कैसे मना किया जाए? जैसे मैं ऑफिस में हूँ और मुझे कोई काम दिया जाए, पर मैं कहीं और ज़रूरी चीज़ में ज़्यादा व्यस्त हूँ, उस समय ‘ना’ बोलना है तो वो ‘ना’ कैसे किया जाए? क्योंकि डर की वजह से हम कई बार हाँ बोल देते हैं तो ‘ना’ कैसे बोला जाए?

आचार्य: यहाँ पर ऑफिस के सीनियर्स की बात कर रहे हो या घर वालों की?

प्र: सभी की।

आचार्य: देखो जिनसे सम्बन्धित हो उनको सच्चाई बता दो अपनी ज़िन्दगी की। उनको बता दो मेरी ज़िन्दगी असलियत में ऐसी है और उसमें ये-ये चीज़ें मेरे लिए महत्वपूर्ण हैं। ये बताना पड़ेगा। अगर उन्हें सच्चाई नहीं बताओगे एक बार। तो झूठ बोलना पड़ेगा बार-बार। इससे अच्छा एक बार उनको बता ही दो न कि मेरी ज़िन्दगी ऐसी-ऐसी चलती है। देखिये साहब! इतना समय इस चीज़ में लगता है, यह मेरी प्रायोरिटीज़ (वरियताऍं) हैं, ऐसा-ऐसा-ऐसा। अब आप मुझसे ये काम करने को कह रहे हैं तो आप ख़ुद ही सोचिए कि कैसे करूँ? लेकिन फिर भी आप कह रहे हैं तो एक बार कर देता हूँ। लेकिन आप समझ लीजिए अच्छे से कि मेरी ज़िन्दगी कैसी है और आप मेरे शुभचिंतक हैं, अब आप जान गये हैं कि मेरी सच्चाई क्या है, क्या उसके बाद भी आप मुझे बार-बार ये काम करने को कहेंगे?

किसी को तुमने बता रखा है कि मैं पूरा खाली हूँ तो वो तो तुमको बोलेगा ही न, आप जाकर सब्जी ख़रीद लाओ। सब्जी जो ख़रीदकर लाये हो, उसमें एक टमाटर सड़ा निकला, जाओ! इसको बदलकर लाओ। बता ही दो न कि मैं खाली नहीं हूँ। वो फिर ख़ुद ही नहीं बोलेगा कि टमाटर बदलकर लाओ।

प्र: सब्मिसिव नेचर (विनम्र स्वभाव) होना सही बात है मतलब आज की दुनिया में?

आचार्य: सबमिशन (विनम्रता) एक के सामने, बाक़ी सबके सामने फियरलेसनेस (निर्भयता) , कोई सबमिशन नहीं। सबमिशन को ही तो काटने के लिए अध्यात्म होता है न? सबमिशन माने डर, सबमिशन माने दूसरे का तुम पर प्रभाव, रुतबा और हम पैदा ही ऐसे होते हैं, दूसरों के अधीन, दूसरों से प्रभावित। उसके लिए ही तो अध्यात्म है। एक चीज़ को पकड़ लो कि ये ज़रूरी है जो भी तुम्हें ऊँचे-से-ऊँची चीज़ समझ में आती है, कह दो ये ज़रूरी है फिर बाक़ी चीज़ों के सामने सबमिशन नहीं करना पड़ेगा।

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