मेहनत पूरी करी, पर सफलता नहीं मिली (कोई बात नहीं!) || आचार्य प्रशांत, आइ.आइ.टी रुड़की में (2022)

आचार्य प्रशांत: इक्कीस-चौबीस साल की उम्र में जब बाहर निकलते हो तो ये अचानक से पता चलता है, अरे! ये क्या हो गया? कैंपस में तो ऐसा होता था कि अगर मेहनत कर ली है तो मार्क्स आ जाते थे। थोड़ा ऊपर-नीचे हो जाते थे पर आ ही जाते थे। तो वहाँ पर एक कोरिलेशन (आपस में सम्बन्ध) होता था या ऐसे कह लो कि जो कोरिलेशन कोइफिशिएंट (सह सम्बन्ध गुणांक) काफ़ी हाई (ऊँचा) होता था, बिटवीन इनपुट एंड आउटपुट (इनपुट और आउटपुट के बीच)। तो पहली बात तो कोरिलेशन हाई है और दूसरी बात इनपुट वेरिएबल्स क्या हैं ये साफ़-साफ़ पता था, डिज़ायर्ड (मनचाहा) आउटपुट पाने के लिए कौन-कौन से बटन दबाने हैं, ये पता था। बाहर की दुनिया में इतने सारे वेरिएबल्स आ जाते हैं कि आपको कुछ नहीं पता कौनसी चीज़ किस दूसरी चीज़ से डिक्टेट (संचालित) हो रही है, ठीक है?
तो क्या करें इंसान? ये तो नहीं पता क्या करे पर ये पता है कि क्या न करे। आप रिज़ल्ट्स (परिणामों) के भिखारी होकर के नहीं चल सकते। आप ये सोचकर नहीं चल सकते कि मैं काम कर रहा हूँ और मैं अपनेआप को सन्तुष्ट तभी मानूॅंगा, जब रिज़ल्ट मेरे हिसाब से आ जाएगा। क्योंकि इतनी सारी चीज़ें लगतीं हैं उस रिज़ल्ट में जिसकी कोई गिनती नहीं है। इसके अलावा उन सारी चीज़ों में से निन्यानवे प्रतिशत चीज़ों पर आपका कोई कन्ट्रोल (नियंत्रण) भी नहीं है, समझे?
और इसमें आपकी ग़लती नहीं है कि आपका कोई कन्ट्रोल नहीं है। कुछ भी हो सकता है, कैसे भी हो सकता है, प्रकृति है ही इसी तरीक़े की। तो जीवन का एक नियम है कि जो लोग रिज़ल्ट ओरिएन्टेड (परिणामोन्मुखी) होकर जीते हैं, वो हमेशा दुखी रहते हैं, चोट खाते रहते हैं, परेशान होते रहते हैं। उन्होंने बहुत मेहनत करी हो तो भी परेशान होते हैं, नहीं मेहनत-वेहनत करी है, काम ही नहीं करा है ईमानदारी से तब तो उनको कुछ मिलेगा भी नहीं वैसे भी।








