जीतने के लिए मत खेलो। तुम खेलो वो सर्वश्रेष्ठ करने के लिए, जो तुम कर सकते हो। और जो सर्वश्रेष्ठ तुम कर सकते हो, वो जीतने से ज़्यादा ऊपर की बात है। परिणाम की चिंता न करते हुए, प्रतिपक्षी की चिंता न करते हुए, जीवन के हर मैदान में, तुम अपना सर्वश्रेष्ठ करो। खिलाड़ी का धर्म है कि वो लगातार उत्कृष्टता की ही पूजा करे। चाहे क्रिकेट का मैदान हो, चाहे जीवन का कोई भी क्षेत्र हो।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मुझे डर रहता है कि मैं क्रिकेट के मैदान में आउट हो जाऊँगा। मन बार-बार यही याद दिलाता है कि अगर आउट हो गया तो? ऐसा लगता है मैं स्वयं से ही लड़ रहा हूँ। कुछ भी हो, मुझे बिना लड़े खेलना है। और मैं जब बिना डर के खेलता हूँ, तो रन भी बनते हैं। मैं क्या करूँ? कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: जीतने के लिए मत खेलो। ये बात सुनने में अजीब लगेगी क्योंकि खेल का तो उद्देश्य ही जीतना बताया गया है हमें। तुम खेलो वो सर्वश्रेष्ठ कर सकने के लिए, जो तुम कर सकते हो। और जो सर्वश्रेष्ठ तुम कर सकते हो, वो जीतने से ज़्यादा ऊपर की बात है। जीत उसके सामने छोटी चीज़ है। तुम अपना सर्वश्रेष्ठ करो, उसके बाद तुम जीते तो जीते, अगर हारे भी, तो वो हार एक तल पर जीत से बेहतर होगी।
अगर सिर्फ़ तुम जीतने का उद्देश्य लेकर चल रहे हो, तो तुम्हारे दिमाग पर सामने वाला पक्ष ही हावी रहेगा। तुम यही देखते रहोगे कि दूसरा जैसा है, उससे बेहतर हो जाओ। और दूसरे का कुछ भरोसा नहीं। हो सकता है दूसरा बहुत कमज़ोर हो। बहुत कमज़ोर है दूसरा, उससे जीतकर क्या करोगे? कभी लगे दूसरा बहुत मज़बूत है, पर हो सकता है उसकी मज़बूती बस तुम्हारी दृष्टि में है।




