हर बार असफल क्यों हो जाते है? असली कारण जानें!

Acharya Prashant

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हर बार असफल क्यों हो जाते है? असली कारण जानें!
जो कुछ भी तुम्हारे भीतर है न, जब तक उसके प्रति, उसके विरुद्ध सक्रिय ऊर्जा नहीं उठेगी, तब तक कोई परिवर्तन नहीं आता। बहुत सोच-समझ के कहा है — नफ़रत, घृणा होनी चाहिए। जो घृणा की ऊर्जा होगी न वही ऊर्जा काम आएगी। जो संतुष्ट हैं, उनकी ज़िन्दगी में कोई बदलाव नहीं आता। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बहुत डर लग रहा था आपसे पूछने से पहले, लेकिन फिर भी।

आचार्य प्रशांत: नहीं डरा करो। अब क्यों नहीं लग रहा है? ये (खिलौना) तैनात कर दूँगा तुम्हारे ऊपर!

प्रश्नकर्ता: तो आचार्य जी, प्रश्न ये है कि — जैसे मैं कोई भी काम उठाता हूँ, तो वो कभी ठीक से पूरा नहीं हो पाता है, या फिर ऐसा कहें कि वो ढंग से पूरा नहीं हो पाता है। लेकिन कभी-कभी जैसे।

आचार्य प्रशांत: आज तक किसका कोई काम पूरा हुआ है? मेरा तो नहीं हुआ है।

प्रश्नकर्ता: मतलब, बहुत ही विकट स्थिति है। तो कभी-कभी जब कोई काम पूरा हो जाता है, तो अच्छा भी लगता है कि — "आज हो गया पूरा!" लेकिन ज़्यादातर समय तो नहीं होता है। तो ऐसे में फिर, घोर निराशा उठती है या अवसाद उठता है, ऐसा कह सकते हैं। फिर उसके बाद में क्रोध भी उठता है, और फिर वो चारों तरफ़ उठता है — अलग-अलग जगह पर।

आचार्य प्रशांत: तुम कोई भी काम उठाते क्यों हो? तुम्हें क्यों करना है कोई भी काम? क्यों?

प्रश्नकर्ता: जैसे उदाहरण के लिए — आचार्य जी, जिम जाना है।

आचार्य प्रशांत: तो फिर क्यों जाना है? मस्त हो तुम! सब पहलवान ही हो जाएँगे, तो कुश्ती कौन देखेगा? क्यों जाना है जिम? जब तुम्हारे पास कोई गरजता हुआ जवाब नहीं है, तो तुम जिम जाओगे भी — तो वहाँ क्या करोगे? इंस्टाग्राम चलाओगे और क्या करोगे? ट्रेडमिल पर चढ़ जाओगे — पाँच की स्पीड लगा दोगे, स्क्रीन पर मूवी देखोगे। एक जिम में मशीन होती है जिस पर चढ़ जाओ, तो ऐसे गोल-गोल घूमती है — वो वेस्ट के लिए होती है, ऐसे-ऐसे बस (गोल-गोल घूमना)। मैं एक जिम जाता था। वहाँ एक आंटी आती थी, उसने साल भर यही किया — और कान में उसके दो ऐसे, मस्त पता नहीं क्या सुनती थी, ऐसे-ऐसे — घंटा भर करती थी, और चली जाती थी। तुममें कोई ललक है? कोई आग है? मैं पूछ रहा हूँ — जिम क्यों जाना है? कोई जवाब ही नहीं है।

प्रश्नकर्ता: जैसे — आचार्य जी, मैं संस्था में हूँ तो जो काम है, वो बेहतर हो पाए उससे।

आचार्य प्रशांत: तुम्हें नफ़रत होनी चाहिए — जैसे तुम हो, तब जाकर कुछ बदलता है। “संस्था में हूँ, काम बेहतर हो जाए।” संस्था में नहीं रहोगे, तो जिम नहीं जाओगे? तो तुम एक कर्तव्य की तरह कर रहे हो — जॉब रिक्वायरमेंट है! हाँ जी —जिम जाना है।

जो कुछ भी तुम्हारे भीतर है न, जब तक उसके प्रति, उसके विरुद्ध सक्रिय ऊर्जा नहीं उठेगी, तब तक कोई परिवर्तन नहीं आता।

जो है, जैसा है — यथावत, यथास्थिति, स्टेटस क्वो — चलता रहता है। बहुत सोच-समझ के कहा है — नफ़रत, घृणा होनी चाहिए। जो घृणा की ऊर्जा होगी न वही ऊर्जा काम आएगी। जब पसीना बह रहा है, साँस उखड़ रही है, और अभी आठ रेप्स (रिपीटिशन) बाकी हैं — वो ऊर्जा और कहाँ से आती है? वो नफ़रत की ऊर्जा होती है। जिसके पास नफ़रत की ऊर्जा है ही नहीं जिम में कदम रखते वक़्त, वो कहेगा — “हो गया ना, अब और नहीं करना।”

जो अच्छे, संकल्पित जिम जाने वाले होते हैं, जब वहाँ होते हैं तो तुम उनकी गरज सुनना। वो इसलिए नहीं गरज रहे होते कि वो वीडियो बनवा रहे हैं, या उनको किसी को डराना है या कुछ। भीतर कुछ होता है जो फट रहा होता है — उसी को फाड़ने के लिए जिम जाया जाता है। बाइसेप्स बहाना है, भीतर कुछ है उसको फाड़ना है। बाइसेप्स ले के क्या मरना है? जल ही जानी है ये भी, इसका भी इस्तेमाल किया जाता है।

भीतर जो बैठा है न, जो खुश है — “जैसा हूँ, ठीक ही हूँ” लोट रहे हैं कीचड़ में। “चल ही तो रहा है, क्या हो गया? कीचड़ ही तो है, ये भी तो पंचभूत का है! सब एक ही चीज़ है। सांख्य योग कहता है — प्रकृति के ही तत्व हैं। साफ़ बिस्तर हो या कीचड़ हो, सब क्या है? पंचभूत है।”

जो संतुष्ट हैं, उनकी ज़िन्दगी में कोई बदलाव नहीं आता। सौ बार मैंने कहा है — मेरे पास आए हो, तो मैं तुम्हें बेचैनी दूँगा। जिनका सब ठीक ही ठीक चल रहा है, उनका कुछ काहे के लिए बदलेगा? और अपनी ज़िन्दगी से उन लोगों को बेदखल करो जो तुम्हें स्वीकार करते हैं जैसे तुम हो। तुम्हें ऐसे लोग चाहिए जो लानतें भेजते हों तुम्हारे ऊपर। जो कहते हों — "हमारे पास मत आ जाना, अगर ऐसे ही रहना है तुमको तो!"

तुमने अपना दोस्त-यार का दायरा, अपना फ्रेंड सर्कल ही ऐसा बना रखा होगा, वो भी तुम्हारे ही जैसे होंगे। कोई छिला हुआ है, कोई चूसा हुआ है, कोई नोचा हुआ है। बुरा लग रहा है अब?

प्रश्नकर्ता: हाँ में सिर हिलाते हुए।

आचार्य प्रशांत: कम लग रहा है, और ज़्यादा बुरा लगना चाहिए। भीतर से ज़बरदस्त ज्वाला उठनी चाहिए — “क्यों सुनना पड़ रहा है मुझे ये सब? मैं नहीं सुनना चाहता,” तब कुछ बदलेगा। नहीं तो जिम में जाओगे — और दूसरों ने जो वेट्स कर लिए होंगे, वो उठा-उठा के रैक पर रख के वापस आ जाओगे। जब तुम्हें कुछ बुरा ही नहीं लगता — तो माने सब जो है, अच्छा ही है। जब सब अच्छा ही है, तो बदले क्यों? बताओ ना।

जाओ पहलवानों से करो यारी, उनके साथ चलो। लगनी चाहिए हीनता — कि जितना तो मेरा कमर का घेरा नहीं है, उतना तो उसका बाजू है! तब लगेगा कि — यार, ये क्या कर रहा हूँ? दोस्त है, उसके साथ जा रहा हूँ, कोई पूछ रहा है — "ये पापा हैं तुम्हारे?" तब कुछ बदलाव आएगा न।

हमें जलते हुए लोग चाहिए — असंतुष्ट। हमें शांत, संयत, संतोषी लोग नहीं चाहिए — “जो है, जैसा है, भगवान ने दिया है, इसी में संतोष करो। समय से पहले और किस्मत से ज़्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता, बच्चा! जब लिखा होगा, तब तुझे भी बाइसेप्स मिल जाएगा।” उतना ही मिलेगा, जितने से लिख सको। लिखने के लिए जितनी मसल चाहिए होती है न, उतनी मिल जाएगी।

ललकार और कराह — कई बार बिल्कुल एक से सुनाई देते हैं, तब जानना सच्चाई है।

भीतर कुछ है जिसे मैंने खुद चोट दी है। मैं ख़ुद को ललकार रहा हूँ और ख़ुद को ललकारा है मैंने ही — और कराह उठी है मेरी ही। तब जानना सच्चाई ये है। ये बाहर वाले को ललकारने में, अपनी तो कोई कराह उठती ही नहीं। ख़ुद को ललकारो और फिर कराह उठती है। वो जिम में भी होता है, कई बार तुम कराहते हो। बिना उस कराह के कोई नहीं बदलता, कोई नहीं सुधरता।

अच्छा नहीं लगना चाहिए। मेरी बातें तुम्हें संतुष्ट करने के लिए नहीं हैं, तुम्हें घायल करने के लिए हैं। तुम्हें और बुरा लगना चाहिए। तुम संस्था में इसलिए नहीं आए हो कि जैसे हो वैसे ही रहो। या तो यहाँ से भाग जाओगे और अगर यहाँ टिकोगे, तो कुछ और हो जाओगे।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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