जो कुछ भी तुम्हारे भीतर है न, जब तक उसके प्रति, उसके विरुद्ध सक्रिय ऊर्जा नहीं उठेगी, तब तक कोई परिवर्तन नहीं आता। बहुत सोच-समझ के कहा है — नफ़रत, घृणा होनी चाहिए। जो घृणा की ऊर्जा होगी न वही ऊर्जा काम आएगी। जो संतुष्ट हैं, उनकी ज़िन्दगी में कोई बदलाव नहीं आता।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बहुत डर लग रहा था आपसे पूछने से पहले, लेकिन फिर भी।
आचार्य प्रशांत: नहीं डरा करो। अब क्यों नहीं लग रहा है? ये (खिलौना) तैनात कर दूँगा तुम्हारे ऊपर!
प्रश्नकर्ता: तो आचार्य जी, प्रश्न ये है कि — जैसे मैं कोई भी काम उठाता हूँ, तो वो कभी ठीक से पूरा नहीं हो पाता है, या फिर ऐसा कहें कि वो ढंग से पूरा नहीं हो पाता है। लेकिन कभी-कभी जैसे।
आचार्य प्रशांत: आज तक किसका कोई काम पूरा हुआ है? मेरा तो नहीं हुआ है।
प्रश्नकर्ता: मतलब, बहुत ही विकट स्थिति है। तो कभी-कभी जब कोई काम पूरा हो जाता है, तो अच्छा भी लगता है कि — "आज हो गया पूरा!" लेकिन ज़्यादातर समय तो नहीं होता है। तो ऐसे में फिर, घोर निराशा उठती है या अवसाद उठता है, ऐसा कह सकते हैं। फिर उसके बाद में क्रोध भी उठता है, और फिर वो चारों तरफ़ उठता है — अलग-अलग जगह पर।




