श्रीकृष्ण अर्जुन को उच्चतम ज्ञान बता रहे हैं — आत्मज्ञान। उसके बाद व्यवहार की चीज़ें बहुत सरल हो जाती हैं। जो आख़िरी बात जान गया, उसको बाक़ी बातें समझाना बहुत आसान हो जाता है। जिसने ब्रह्मविद्या साध ली, उसको अब और कुछ भी साधना मुश्किल नहीं पड़ेगा। ब्रह्मविद्या माने स्वयं को हरा देना। जो गीता का हो गया, वह जान जाता है भली-भाँति कि सांसारिक परीक्षाएँ भी कैसे पार करनी हैं। उसको हराना असंभव हो जाएगा।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मैं रुचि दिल्ली से हूँ। कल मैं जब मूवी से आ रही थी अकेले लगभग 11:40 का समय रहा होगा। जैसे ही मैं कैब में बैठी, मेरा सारा ध्यान था कि ड्राइवर कहीं गलत जगह न ले जाए। मैं सुरक्षित घर पहुँच जाऊँ। उस वक़्त जो सारा गीता का ज्ञान था, वो सब रह गया और बस मुझे अपनी सेफ्टी का कंसर्न होने लगा। मुझे उस समय ऐसा लगा कि लड़कियों को शायद ज्ञान से ज़्यादा फिज़िकली और मेंटली स्ट्रॉन्ग बनना पड़ेगा पहले, तभी ज्ञान उनकी कुछ मदद कर पाएगा। क्या ये बात सही है? मुझे इस बारे में जानना है।
आचार्य प्रशांत: ये जो आप सही पूछ रहे हो ये भी तो ज्ञान की ही बात है न। ज्ञान का किसी भी स्थिति में अर्थ होता है, सच क्या है? झूठ क्या है? — इसका निपटारा। तो वो तो आप कैब में फँसे हुए हो, चाहे आप पिक्चर देख रहे हो, चाहे घर पहुँच गए हो, आपको तो हमेशा ही जानना पड़ेगा न कि सच-झूठ क्या है? ज्ञान तो आपको हर क्षण में चाहिए। आप लड़की हो तो आपको कितना पैसा होना चाहिए? आपको कितने बजे फिल्म देखनी चाहिए? आपको किस तरह से कैब करनी चाहिए। आपके पास कोई हथियार होना चाहिए। आपके पास और क्या बंदोबस्त होने चाहिए? ये सब भी तो ज्ञान की ही बातें हैं न, या ज्ञान का अर्थ बस ये होता है कि अहम् ब्रह्मास्मि?



