सफलता इस बात से तय होनी चाहिए कि आपने अपने लक्ष्य की ओर कदम किन चुनौतियों का सामना करते हुए बढ़ाया है। आपके सामने कठिनाइयाँ क्या थीं, और किन मुश्किलों के खिलाफ़ आपने अपनी यात्रा की है, यही तय करेगा कि आप सफल हैं या असफल। अपने आप से यही पूछो—‘जो कुछ मैंने पाया है, कितनी चुनौतियों को हराकर पाया है?’ अगर बिना किसी चुनौती के पा लिया है, तो वह व्यर्थ है, क्योंकि परिस्थितिवश मिली चीज़ें सफलता नहीं, महज़ संयोग हैं।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सफलता कैसे नापें, किस आदमी को सफल मानें?
आचार्य प्रशांत: सफल कौन है, सफल किसको माना जाए, सफलता क्या है, और सफल कौन है? देखो, पहली बात तो ये कि ‘सफलता’ शब्द के साथ ही जो दूसरा शब्द जुड़ा है वो है ‘लक्ष्य’। लक्ष्य सही होना चाहिए, इसके बाद आऊँगा मैं ‘सफलता’ पर, क्योंकि सफलता की बात करनी शुरू कर दूँ तो वो बात अधूरी होगी, ख़तरनाक होगी। सबसे पहले तो लक्ष्य सही बनाओ, ये बाद में पूछना कि लक्ष्य मिला कि नहीं मिला, सफल हुए कि असफल हुए। लक्ष्य ही गलत है, तो क्या सफल और क्या असफल?
जैसे कि कोई गलत ट्रेन (रेलगाड़ी) पर चढ़ा हो और गुस्सा खा रहा हो कि ये लेट (विलम्ब) क्यों चल रही है इतनी। अरे भाई, तुम गलत ट्रेन पर चढ़े हो, वो लेट चले, चाहे सही रफ़्तार पर चले, चाहे बिफ़ोर टाइम (समय से पूर्व) पहुँच जाए, तुम्हें क्या मिलेगा?
समझ में आ रही है बात?




