सुबह 5 बजे उठो, जिम जाओ, ठंडे पानी से नहाओ: रील्स कहती हैं, यही सफलता की कुंजी है। पर अगर कोई आदमी पहले बेतरतीब सड़े टमाटर फेंकता था, और अब घड़ी देखकर ठीक ब्रह्म मुहूर्त में फेंकने लगे, तो क्या वह बदल गया? बस उसकी मूर्खता अनुशासित हो गई। रूटीन कर्मों को सजा देता है, करने वाले को वहीं का वहीं छोड़ देता है। और सफलता भी किसकी? मछली के लिए पेड़ पर चढ़ना सफलता नहीं होती। जब हमें यही नहीं पता कि हम कौन हैं, तो यह रूटीन हमें ले कहाँ जा रहा है?
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
[बेंगलुरु में एक संवाद से।]
प्रश्नकर्ता: हाल ही में मैंने इंस्टाग्राम पर बहुत सारे रील्स वायरल होते हुए देखे, जहाँ पर लोग अपने डेली रूटीन जो भी वो फ़ॉलो करते हैं वो डालते हैं और वो बहुत वायरल चले जाते हैं। लाइक 5:00 बजे उठना और जिम जाते हैं, फिर कोल्ड शावर लेते हैं और उसके बाद में काम करते हैं और फिर रात को जल्दी सो जाते हैं। मैं कमेंट्स भी देखता हूँ उनके तो उसमें बहुत सारे लोग होते हैं कि दिस इज़ अ आइडियल वे कि मेरे को यह फ़ॉलो करना है। ऐसा रूटीन होना चाहिए। दिस इज़ अ की टू सक्सेस। तो मैं सोचता हूँ कि क्या हमें ऐसा रूटीन मतलब ऐसे काइंड ऑफ़ टेम्पलेट ज़रूरी है ऐसे फ़ॉलो करना। क्या कोई सक्सेस मैटर करती है इस रूटीन को फ़ॉलो करने से?




