वक्ता: सवाल है कि अपनी काबिलियत पता है, ये भी पता है कि क्या कर के दिखा सकती हूँ, उसके बाद भी अगर सफलता नहीं मिलती तो क्या करूँ? तुम्हें काबिलियत पता है या फिर तुमने बस मान लिया है कि काबिलियत है? जिसको तुमने मान लिया है कि काबिलियत है, उसमें तो बस इतना ही दम है कि वो तुम्हें असफलता ही देती है। तुमने जिसको अपनी काबिलियत मान लिया है उससे तो तुम्हें कुछ मिल नहीं रहा। उसमें कितना दम है ये बात तो सामने ही है ना। खुद ही कह रही हो कि उस पर चल के बस असफलता ही हाथ लगती है। तुमने जिन बातों को अपनी काबिलियत मान लिया है वो तुम्हारी काबिलियत हैं हीं नहीं और तुमने जिसको अपनी नाकाबिलियत मान लिया है, वो भी तुम्हारी नाकाबिलियत हैं नहीं। किसी ने तुमसे कह दिया कि तुम फ़िज़िक्स में बहुत अच्छी हो। क्यों? क्योंकि तुम्हारे आसपास का जो सारा झुण्ड था, उसमें तुम ही अच्छे थे फ़िज़िक्स में और तुमने मान लिया कि मैं बड़ी काबिल हूँ। और किसी ने आ कर तुमसे कह दिया कि कोई चीज़ तुम्हारी नाकाबिलियत है क्योंकि उनको ऐसा लगता है और क्योंकि ये बात बहुत लोगों ने कही और बार-बार कही तो तुमने इसको भी मान लिया कि ये मेरी नाकाबिलियत है। जिनको तुम अपनी काबिलियत माने बैठे हो, वो तुम्हारी काबिलियत हैं नहीं। जिनको तुम अपनी नकाबिलियत माने बैठे हो, वो भी दूसरों ने बस कह दी हैं। वो तुम्हारी वास्तविक नाकाबिलियत नहीं हैं।
तुम्हारी काबिलियत तुम्हारा होना भर है। तुम हो ना? तो बस काबिल हो। ये ना पूछो कि किस बात के काबिल हैं? जिस भी काम में डूबे हो उसी के काबिल हो। डूब कर पढ़ाई कर रहे हो तो उसके काबिल हो। खेल रहे हो तो उसके काबिल हो। गा रहे हो तो उसके काबिल हो। खाना खा रहे हो तो उसके काबिल हो। तुम अपनी जो काबिलियतें जानते हो वो ऑब्जेक्ट स्पेसिफिक हैं, वस्तु सापेक्ष कि मैं बहुत काबिल हूँ रीडिंग में। तुमने चुनाव कर लिया है, तुमने हिस्से कर दिये हैं। ये मेरी काबिलियत, और ये मेरी नाकाबिलियत। हिस्से हैं ही नहीं। ये झूठे हिस्से कर रखे हैं तुमने। तुमने जबरदस्ती अपने मन में ये बात ठूँस रखी है। तुम्हारी काबिलियत पूर्ण है। जो कर रहे हो उसी के काबिल हो। अभी सुन रही हो ना, ध्यान से सुनने के काबिल हो। अभी चलोगी ना, तो ध्यान से चलने के काबिल हो। और जब नाचो, तो वही काबिलियत है। जिस क्षण में जो है वही तुम्हारी काबिलियत है। वही तुम्हारा होना ही तुम्हारी काबिलियत है। बशर्ते पूरी तरह हो। हम पूरी तरह होते नहीं हैं। कम लोग होंगे जो सुनने में पूरी तरह होंगे। कम लोग होते हैं जो किसी भी क्षण में पूरी तरह होते हैं। हमारा होना अधूरा-सा है, खाली-सा क्योंकि मन कहीं और रहता है। मन कहीं और ही रहता है। हमारा होना पूरा नहीं है।




