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जलवायु संकट का समाधान किसके हाथ में है?
Climate Change
जलवायु संकट का समाधान किसके हाथ में है?
11min
56reads
5

जलवायु संकट पर बहस अक्सर नीतियों और तकनीक तक सिमट जाती है, पर दुनिया की आबादी, उत्पादन, कार्बन और तापमान के ग्राफ़ साथ रखें तो एक ही रेखा दिखती है। धरती को दो चीज़ें मार रही हैं: बढ़ती जनसंख्या और बढ़ता उपभोग। दोनों एक ही वृत्ति से निकलते हैं, ख़ुद को न जानना और बाहर जाकर भोगना। जंगल घट रहे हैं, जीव-जंतु मिट रहे हैं। जब तक करने वाला नहीं बदलेगा, नीतियाँ कैसे बदलेंगी? क्या समाधान हमारे ही हाथ में है?

नवरात्रि व्रत का असली अर्थ क्या है?
Beliefs
नवरात्रि व्रत का असली अर्थ क्या है?
17min
393reads
19
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नवरात्रि आते ही हम सोचने लगते हैं कि क्या खाना है, क्या नहीं खाना, कौन-सा हवन करना है। पर व्रत का अर्थ है संकल्प, और शुभ संकल्प एक ही है: हम जैसे हैं, वैसे न रहें। इसीलिए ये नौ दिन दुर्गा सप्तशती को समझने के लिए हैं, केवल रस्मों के लिए नहीं। जिसे हम माँ कहते हैं, वह यह पूरी प्रकृति है, और उसके ही बच्चों को चोट पहुँचाकर उसका पर्व नहीं मनाया जा सकता। क्या इस बार हम नौ दिन अपने ही जीवन को ईमानदारी से देख पाएँगे?

मेडल लाने वाली से पूछते हो, बच्चा कब देगी?
Women Empowerment
मेडल लाने वाली से पूछते हो, बच्चा कब देगी?
8min
110reads
7
1

कोई खिलाड़ी देश के लिए मेडल जीतकर लौटती है, और बधाई के साथ ही सवाल आता है कि खुशखबरी कब दोगी। उम्र का पैमाना और परिवार की अपेक्षा मिलकर उसकी पूरी मेहनत को एक देह की भूमिका तक सीमित कर देते हैं। पर सफलता केवल वह नहीं जिसे दूसरे गिन सकें। जब हम स्वयं को देह भर मान लेते हैं, तो हमारे विचार, लहजा और अपनी छवि तक उसी में बँध जाते हैं। इंसान बनकर जीना और किसी के हाथों न बिकना अपने आप में बड़ी और बिरली सफलता है। हमारे लिए असली खुशखबरी क्या है?

Excerpts from Articles
Excerpts From Articles
शादी या लिव-इन: आज़ादी किसमें है?
सच्चा वैराग्य महत्वहीन या हानिकारक चीज़ों को छोड़ना है, और सच्ची महत्वाकांक्षा उस चीज़ के लिए पूरी तरह समर्पित होना है जो वास्तव में मूल्यवान है। दोनों विरोधी नहीं, बल्कि गहरी समझ के दो पहलू हैं। जब विवेक से सत्य और असत्य स्पष्ट दिखने लगते हैं, तो त्याग प्रयास नहीं रहता, स्वाभाविक हो जाता है। आध्यात्मिक यात्रा में यह प्रक्रिया लगातार चलती रहती है।
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रक्षाबंधन: वो रक्षा माँग रही है - ज़रा सुनिए
रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के रिश्ते और सुरक्षा की रस्म तक सीमित नहीं होना चाहिए। आज असली रक्षा उन चीज़ों की ज़रूरत है जो कमज़ोर और संकट में हैं—गौरैया, नदियाँ, पहाड़, पेड़, महासागर और पृथ्वी। साथ ही ईमानदारी, आत्मज्ञान और मानवीय मूल्यों की भी रक्षा जरूरी है। धर्म कर्मकांड नहीं, अपनी शक्ति और उससे जुड़ी व्यापक ज़िम्मेदारी को समझना है।
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जवान हो, नाराज़ हो? देश बदलना चाहते हो? तो सुनो ये बात
मन पर बाहरी प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है, लेकिन जीवन का संचालन उन प्रभावों से नहीं, अपने विवेक से होना चाहिए। जानकारी बाहर से आती है, पर उसे समझना, परखना और सही निर्णय लेना हमारी आंतरिक क्षमता है। जो व्यक्ति अपने विवेक को जागृत रखता है, वही विचारों का स्वामी बनता है; अन्यथा वह केवल परिस्थितियों और दूसरों की धारणाओं का अनुयायी बनकर रह जाता है।
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प्रूफ नहीं है, तो मानें क्यों?
अंधविश्वास या किसी दावे को केवल किताबों, परंपराओं या बड़ी-बड़ी हस्तियों के कहने से नहीं मानना चाहिए। भौतिक जगत से जुड़े हर दावे के लिए प्रमाण माँगना आवश्यक है। जो बात जाँची-परखी जा सकती है, उसे तर्क, प्रयोग और उपकरणों से जाना जाए; बिना जाने नहीं माना जाए। सच्ची जिज्ञासा वही है जो हर दावे के सामने प्रश्नचिह्न रखे और प्रमाण मिलने पर ही स्वीकार करे।
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बाबा नहीं, यार आया है - मंतर नहीं, मिरर लाया है
सच्चा गुरु या मित्र पूजा का विषय नहीं, बल्कि दर्पण होता है, जो बिना स्वार्थ हमारी वास्तविक स्थिति दिखाता है। आध्यात्मिक मार्ग पर अंधभक्ति नहीं, बल्कि प्रेम, कृतज्ञता और व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी आवश्यक है। मुक्ति किसी गुरु के भरोसे नहीं मिलती; स्वयं को बदलने का साहस स्वयं जुटाना पड़ता है। गुरु का कार्य केवल सत्य का प्रतिबिंब दिखाना है, चलना साधक को ही होता है।
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आप दुखी नहीं… आपको दुख में मज़ा आता है!
समझदारी याददाश्त से नहीं, समझ से आती है। जीवन हर पल नए प्रश्न पूछता है, इसलिए रटे हुए उत्तर नहीं चलते। जानकारी बाहर से मिल सकती है, पर सही उत्तर तभी जन्म लेते हैं जब मन वर्तमान में पूरी तरह उपस्थित हो। जो समझ में न आए उसे रटने के बजाय प्रश्न करो, जिज्ञासु बने रहो। सीखने का सार स्मृति नहीं, जागरूकता, समझ और वर्तमान क्षण में जीने की क्षमता है।
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सपने, सरकारी नौकरी और पेंशन: जवानी किसके लिए है?
सपनों और सामाजिक प्रतिष्ठा के पीछे भागते हुए युवा अक्सर अपनी वास्तविक क्षमता, रुचि और वर्तमान चुनौतियों को देखना भूल जाते हैं। आईआईटी, यूपीएससी, सरकारी नौकरी और पेंशन को जीवन का लक्ष्य मान लेने के बजाय ज़रूरी है आत्मज्ञान—ख़ुद को ईमानदारी से परखना। जवानी भविष्य की सुरक्षा की चिंता में नहीं, आज की वास्तविक चुनौतियों से जूझने और सार्थक कर्म में लगनी चाहिए।
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फ़ालतू खर्च छोड़िए, अपनी ज़िंदगी पर खर्च करना सीखिए
आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।
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जो खुद आज़ाद नहीं, वह लोकतंत्र को मजबूत कैसे करेगा?
लोकतंत्र, गणतंत्र और स्वतंत्रता केवल संविधान में लिखे शब्द नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक की चेतना पर निर्भर हैं। वास्तविक स्वतंत्रता मनमानी करने की छूट नहीं, बल्कि भीतर घुसे भय, लालच, अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और बाहरी प्रभावों से मुक्ति है। जब नागरिक अपने ही विचारों और मान्यताओं की जाँच नहीं करता, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र और संप्रभुता खोखली बन सकती है।
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अंधविश्वास असल में झूठ को स्वीकृति पाने की चाह है
एक पुजारी जो रोज़ भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र और वशीकरण के नाम पर आए लोगों से मिलता है, आचार्य प्रशांत से पूछता है: जब वो ख़ुद जानता है कि कुछ भूत-चुड़ैल नहीं होता, तो लोग बार-बार इसी झूठ की शरण में क्यों जाते हैं? जवाब अंधविश्वास से कहीं गहरा निकलता है — यह हमारे भीतर के उस झूठ की कहानी है, जिसे हम हर कीमत पर बचाना चाहते हैं।
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विघ्नहर्ता के सामने खड़ा विघ्न: गणपति की कथाओं के संकेत
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विघ्नहर्ता के सामने खड़ा विघ्न: गणपति की कथाओं के संकेत
24min
3.3kreads
276
43

बाल गणेश अहंकार का प्रतीक है, जो प्रकृति (पार्वती) से जन्मा पर अभी सत्य (शिव) से अस्पर्शित है—इसलिए द्वार पर सत्य को रोकता है। सिर काटना और नया सिर लगाना अहंकार के क्षीण होने और उसे नया केंद्र यानी बोध मिलने का संकेत है। मूषक कामना का प्रतीक है, जो क्षैतिज अक्ष पर भागती इंद्रियों को दर्शाता है। शिव की परिक्रमा सूक्ष्म दृष्टि और ऊर्ध्व अक्ष पर होने वाली गति को इंगित करती है—स्थूल दौड़ यानी क्षैतिज गति कभी ऊँचाई नहीं देती। मूर्ति-विसर्जन नाम-रूप के त्याग और निर्गुण की ओर संकेत का प्रतीक है। विघ्नहर्ता नाम एक भ्रम को उजागर करता है: असली विघ्न अहंकार स्वयं है; उसका विगलन केवल स्वयं की नीयत यानी सक्रिय चुनाव से संभव है—कोई बाहरी सत्ता उसकी संप्रभुता नहीं छीन सकती।

In Media
एक अरबपति का मास्टरप्लान: सूरज को रोको, कार्बन उगलते रहो?
29min
1.9kreads
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7
एक अरबपति का मास्टरप्लान: सूरज को रोको, कार्बन उगलते रहो?

एक अरबपति ने चाँद से खरबों छोटे उपग्रह लॉन्च कर उन्हें सूरज और पृथ्वी के बीच तैनात करने और इस तरह सूरज की रोशनी का एक हिस्सा रोककर ग्लोबल वॉर्मिंग सुलझाने का प्रस्ताव रखा, ठीक उसी हफ्ते जब नेपाल में जलवायु-जनित त्रासदी ने हज़ारों लोगों की जान ले ली। संकट तकनीक की कमी से नहीं, उस भोग-वृत्ति से पैदा हुआ है जो अधिक उपभोग, अधिक उत्पादन और अधिक उत्सर्जन छोड़ना नहीं चाहती। जब जीवनशैली पर सवाल उठाना कठिन लगता है, तब मनुष्य समाधान भी ऐसा खोजता है जो उसे बदले बिना दुनिया को बदल दे।

एक अरबपति का मास्टरप्लान: सूरज को रोको, कार्बन उगलते रहो?
In Media
एक अरबपति का मास्टरप्लान: सूरज को रोको, कार्बन उगलते रहो?
29min
1.9kreads
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एक अरबपति ने चाँद से खरबों छोटे उपग्रह लॉन्च कर उन्हें सूरज और पृथ्वी के बीच तैनात करने और इस तरह सूरज की रोशनी का एक हिस्सा रोककर ग्लोबल वॉर्मिंग सुलझाने का प्रस्ताव रखा, ठीक उसी हफ्ते जब नेपाल में जलवायु-जनित त्रासदी ने हज़ारों लोगों की जान ले ली। संकट तकनीक की कमी से नहीं, उस भोग-वृत्ति से पैदा हुआ है जो अधिक उपभोग, अधिक उत्पादन और अधिक उत्सर्जन छोड़ना नहीं चाहती। जब जीवनशैली पर सवाल उठाना कठिन लगता है, तब मनुष्य समाधान भी ऐसा खोजता है जो उसे बदले बिना दुनिया को बदल दे।

In Media
जन्माष्टमी: मूर्ति, कहानी और गीता
17min
3.5kreads
163
25
जन्माष्टमी: मूर्ति, कहानी और गीता

जन्माष्टमी केवल बाल-कृष्ण की पूजा, मिठाई और उत्सव का दिन नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, मोह, भय और अज्ञान से युद्ध करने का अवसर है। मूर्ति, गुरु और गीता साधन हैं, मंज़िल नहीं—वे हमें अपनी क्षुद्रता दिखाकर सत्य की ओर ले जाने वाले दर्पण हैं। कृष्ण का वास्तविक जन्म तब होता है, जब मन झूठ और आसक्ति से मुक्त होकर सत्य, आत्मबोध और अपनी उच्चतम संभावना की ओर जागता है।

जन्माष्टमी: मूर्ति, कहानी और गीता
In Media
जन्माष्टमी: मूर्ति, कहानी और गीता
17min
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163
25

जन्माष्टमी केवल बाल-कृष्ण की पूजा, मिठाई और उत्सव का दिन नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, मोह, भय और अज्ञान से युद्ध करने का अवसर है। मूर्ति, गुरु और गीता साधन हैं, मंज़िल नहीं—वे हमें अपनी क्षुद्रता दिखाकर सत्य की ओर ले जाने वाले दर्पण हैं। कृष्ण का वास्तविक जन्म तब होता है, जब मन झूठ और आसक्ति से मुक्त होकर सत्य, आत्मबोध और अपनी उच्चतम संभावना की ओर जागता है।

Life ProblemsSee All
आखिर क्यों एक महिला की काबिलियत से ज़्यादा उसके शरीर पर ध्यान दिया जाता है?
Women Empowerment
आखिर क्यों एक महिला की काबिलियत से ज़्यादा उसके शरीर पर ध्यान दिया जाता है?
8min
350reads
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एक महिला खिलाड़ी वर्ल्ड चैंपियनशिप में मेडल जीतती है, लेकिन उसे ऑनलाइन हैरसमेंट, फ़ेक अकाउंट्स और आपत्तिजनक तस्वीरों का सामना करना पड़ता है। सदियों की वर्जनाओं ने हमें स्त्री को सिर्फ़ देह के तल पर देखने का आदी बना दिया है, उसकी काबिलियत या गहराई से कोई सरोकार नहीं रहता। यही पैटर्न गाड़ी, नौकरी और शादी जैसे रोज़मर्रा के फैसलों में भी दिखता है। यह कोई विकृति नहीं, बल्कि इन्हीं वर्जनाओं की स्वाभाविक परिणति है।

Love
जैसे तुम, वैसा तुम्हारा प्रेम
10min
3.8kreads
341
40
जैसे तुम, वैसा तुम्हारा प्रेम

प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।

जैसे तुम, वैसा तुम्हारा प्रेम
Love
जैसे तुम, वैसा तुम्हारा प्रेम
10min
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341
40

प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।

Values
फ़ालतू खर्च छोड़िए, अपनी ज़िंदगी पर खर्च करना सीखिए
48min
1.2kreads
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फ़ालतू खर्च छोड़िए, अपनी ज़िंदगी पर खर्च करना सीखिए

आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।

फ़ालतू खर्च छोड़िए, अपनी ज़िंदगी पर खर्च करना सीखिए
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फ़ालतू खर्च छोड़िए, अपनी ज़िंदगी पर खर्च करना सीखिए
48min
1.2kreads
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आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।

Bhagavad GitaSee All
साल बदल गया, हम कब बदलेंगे?
Bhagavad Gita
साल बदल गया, हम कब बदलेंगे?
42min
4.8kreads
160
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शुरुआत होगी प्रेम से; प्रेम माने, संवेदनशीलता; संवेदनशीलता माने, दुख। दुख का उदय नहीं, दुख का अनुभव। दुख तो है ही, पर असंवेदन बनकर हम उस दुख से किसी तरह बच लेते हैं। किसी चीज़ का होना और उसका अनुभव होना, दो अलग-अलग बातें हैं। दुख है, पर हम उसके अनुभव से बच जाते हैं। कैसे? सुन्न पड़कर। असंवेदनशील होकर हम दुख के अनुभव से कन्नी काट लेते हैं।

Bhagavad Gita
क्या अध्यात्म में संकल्प लेना वर्जित है?
8min
4.7kreads
111
41
क्या अध्यात्म में संकल्प लेना वर्जित है?

तुमने जब भी कोई संकल्प उठाया है, अपनी इच्छित वस्तु को पाने का ही तो उठाया है न? और तुम उसी वस्तु की इच्छा करोगे जो तुम्हारे ही जैसी होगी। इन संकल्पों को त्यागने की बात करी जा रही है। ये छोटे संकल्प हैं। संकल्प बनाओ, पर सब संकल्पों के केन्द्र में श्रीकृष्ण को बिठाओ। जो कुछ भी करने से श्रीकृष्ण मिलते हों, वो ज़रूर करो और जो करने से तुम संसार के कारागार में ही कैदी रह जाते हो, वो बिल्कुल मत करना।

क्या अध्यात्म में संकल्प लेना वर्जित है?
Bhagavad Gita
क्या अध्यात्म में संकल्प लेना वर्जित है?
8min
4.7kreads
111
41

तुमने जब भी कोई संकल्प उठाया है, अपनी इच्छित वस्तु को पाने का ही तो उठाया है न? और तुम उसी वस्तु की इच्छा करोगे जो तुम्हारे ही जैसी होगी। इन संकल्पों को त्यागने की बात करी जा रही है। ये छोटे संकल्प हैं। संकल्प बनाओ, पर सब संकल्पों के केन्द्र में श्रीकृष्ण को बिठाओ। जो कुछ भी करने से श्रीकृष्ण मिलते हों, वो ज़रूर करो और जो करने से तुम संसार के कारागार में ही कैदी रह जाते हो, वो बिल्कुल मत करना।

Bhagavad Gita
मूल्य चुकाओ, आनन्द पाओ
51min
8.9kreads
201
16
मूल्य चुकाओ, आनन्द पाओ

गीता आपको यह बताने के लिए है कि आपकी सब चिन्ताओं के साथ-साथ जो आपकी चिन्ताओं को नष्ट कर सकता है, वो भी आपको उपलब्ध है। आपको चुनाव करना है और मूल्य चुकाने को तैयार रहना है। अर्जुन के एक ओर माँ प्रकृति हैं जो कह रही हैं, ‘मेरे बहाव में बहो,’ और दूसरी ओर श्रीकृष्ण हैं जो कह रहे हैं, ‘मेरी ओर बढ़ो और रास्ते में जो भी आता है, उसे सहो।’ सही काम में जो पीड़ा मिले अगर उसे प्रेम का उपहार मान कर सीने से नहीं लगा सकते, तो उसे दवाई का कड़वा घूँट ही मानकर बस सह लो। सच्चाई के मार्ग पर जो तमाम अनुभवों में अडिग रहता है, वो आनन्द का अधिकारी है।

मूल्य चुकाओ, आनन्द पाओ
Bhagavad Gita
मूल्य चुकाओ, आनन्द पाओ
51min
8.9kreads
201
16

गीता आपको यह बताने के लिए है कि आपकी सब चिन्ताओं के साथ-साथ जो आपकी चिन्ताओं को नष्ट कर सकता है, वो भी आपको उपलब्ध है। आपको चुनाव करना है और मूल्य चुकाने को तैयार रहना है। अर्जुन के एक ओर माँ प्रकृति हैं जो कह रही हैं, ‘मेरे बहाव में बहो,’ और दूसरी ओर श्रीकृष्ण हैं जो कह रहे हैं, ‘मेरी ओर बढ़ो और रास्ते में जो भी आता है, उसे सहो।’ सही काम में जो पीड़ा मिले अगर उसे प्रेम का उपहार मान कर सीने से नहीं लगा सकते, तो उसे दवाई का कड़वा घूँट ही मानकर बस सह लो। सच्चाई के मार्ग पर जो तमाम अनुभवों में अडिग रहता है, वो आनन्द का अधिकारी है।

Spirituality and WisdomSee All
अहं अगनि हिरदै जरै॥ आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)
Saint Kabir
अहं अगनि हिरदै जरै॥ आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)
9min
467reads
15

अहं अगनि हिरदै जरै, गुरू सों चाहै मान। तिनका जम न्यौता दिया, हो हमरे मिहमान॥

~ कबीर साहब

वक्ता :गुरु और शिष्य की कहानी है। उनके संबंधों के विषय में है। अहं की आग सीने में धकधक जल रही है। अहं कहता है, “मुझे मान्यता मिले, स्वीकृति मिले, प्रशंसा मिले”।…

Beliefs
अंधविश्वास असल में झूठ को स्वीकृति पाने की चाह है
46min
294reads
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अंधविश्वास असल में झूठ को स्वीकृति पाने की चाह है

एक पुजारी जो रोज़ भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र और वशीकरण के नाम पर आए लोगों से मिलता है, आचार्य प्रशांत से पूछता है: जब वो ख़ुद जानता है कि कुछ भूत-चुड़ैल नहीं होता, तो लोग बार-बार इसी झूठ की शरण में क्यों जाते हैं? जवाब अंधविश्वास से कहीं गहरा निकलता है — यह हमारे भीतर के उस झूठ की कहानी है, जिसे हम हर कीमत पर बचाना चाहते हैं।

अंधविश्वास असल में झूठ को स्वीकृति पाने की चाह है
Beliefs
अंधविश्वास असल में झूठ को स्वीकृति पाने की चाह है
46min
294reads
113

एक पुजारी जो रोज़ भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र और वशीकरण के नाम पर आए लोगों से मिलता है, आचार्य प्रशांत से पूछता है: जब वो ख़ुद जानता है कि कुछ भूत-चुड़ैल नहीं होता, तो लोग बार-बार इसी झूठ की शरण में क्यों जाते हैं? जवाब अंधविश्वास से कहीं गहरा निकलता है — यह हमारे भीतर के उस झूठ की कहानी है, जिसे हम हर कीमत पर बचाना चाहते हैं।

Guru
अध्यात्म, विज्ञान और संविधान: किससे मिलेगी सच्ची स्वतंत्रता?
16min
600reads
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अध्यात्म, विज्ञान और संविधान: किससे मिलेगी सच्ची स्वतंत्रता?

आध्यात्मिकता का उद्देश्य व्यक्ति को बाहरी अधिकारों से आगे आंतरिक स्वतंत्रता की ओर ले जाना है। विज्ञान और संविधान अपने-अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आत्म-भ्रम, गलत चुनाव और अहंकार से मुक्ति का मार्ग आत्मज्ञान से खुलता है। सच्चा गुरु शिष्य को निर्भर नहीं, स्वतंत्र बनाता है। साथ ही, शिष्य का आचरण उसके गुरु और शिक्षा का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए उसे नकल नहीं, समझ और विवेक के साथ जीना चाहिए।

अध्यात्म, विज्ञान और संविधान: किससे मिलेगी सच्ची स्वतंत्रता?
Guru
अध्यात्म, विज्ञान और संविधान: किससे मिलेगी सच्ची स्वतंत्रता?
16min
600reads
59
8

आध्यात्मिकता का उद्देश्य व्यक्ति को बाहरी अधिकारों से आगे आंतरिक स्वतंत्रता की ओर ले जाना है। विज्ञान और संविधान अपने-अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आत्म-भ्रम, गलत चुनाव और अहंकार से मुक्ति का मार्ग आत्मज्ञान से खुलता है। सच्चा गुरु शिष्य को निर्भर नहीं, स्वतंत्र बनाता है। साथ ही, शिष्य का आचरण उसके गुरु और शिक्षा का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए उसे नकल नहीं, समझ और विवेक के साथ जीना चाहिए।

Climate CrisisSee All
क्लाइमेट चेंज: क्या कोर्ट, सरकार और मीडिया सच में बदलाव ला सकते हैं?
Climate Change
क्लाइमेट चेंज: क्या कोर्ट, सरकार और मीडिया सच में बदलाव ला सकते हैं?
15min
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जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्या का समाधान केवल अदालतों, सरकारों या अन्य संस्थाओं से उम्मीद करके नहीं हो सकता, क्योंकि ये सभी संस्थाएँ उसी समाज और चेतना से निकलती हैं, जिसने समस्या को जन्म दिया है। वास्तविक परिवर्तन के लिए मनुष्य को बदलना होगा। जब तक अज्ञान, conditioning और उदासीनता बनी रहेगी, संस्थाएँ भी व्यवस्था को ही बनाए रखेंगी। इसलिए तथ्यों को सीधे देखना, मिथकों से ऊपर उठना और जागरूकता विकसित करना ही मूल परिवर्तन का आधार है।

Climate Change
कम बारिश, ज़्यादा गर्मी - इस अकाल का जिम्मेदार कौन?
28min
391reads
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कम बारिश, ज़्यादा गर्मी - इस अकाल का जिम्मेदार कौन?

जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि चेतना का संकट है। अंधाधुंध उपभोग, अनियंत्रित विकास, जनसंख्या वृद्धि और भविष्य के भ्रम ने पृथ्वी के सीमित संसाधनों पर असहनीय दबाव डाल दिया है। समाधान डर फैलाने या आदेश देने में नहीं, बल्कि स्पष्टता, जागरूकता और सही समझ में है। जब मनुष्य होश में जीना सीखता है, तभी उपभोग, विकास और जीवन के निर्णय प्रकृति के साथ संतुलित हो पाते हैं।

कम बारिश, ज़्यादा गर्मी - इस अकाल का जिम्मेदार कौन?
Climate Change
कम बारिश, ज़्यादा गर्मी - इस अकाल का जिम्मेदार कौन?
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जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि चेतना का संकट है। अंधाधुंध उपभोग, अनियंत्रित विकास, जनसंख्या वृद्धि और भविष्य के भ्रम ने पृथ्वी के सीमित संसाधनों पर असहनीय दबाव डाल दिया है। समाधान डर फैलाने या आदेश देने में नहीं, बल्कि स्पष्टता, जागरूकता और सही समझ में है। जब मनुष्य होश में जीना सीखता है, तभी उपभोग, विकास और जीवन के निर्णय प्रकृति के साथ संतुलित हो पाते हैं।

Animal Cruelty
जानवर ब्रश नहीं करते… तो तुम क्यों करते हो?
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जानवर ब्रश नहीं करते… तो तुम क्यों करते हो?

जानवर अपनी जैविक प्रवृत्तियों के अनुसार जीते हैं, जबकि मनुष्य के पास विवेक और चुनाव की क्षमता है। इसलिए अपने व्यवहार को सही ठहराने के लिए पशुओं का उदाहरण देना उचित नहीं है। जीवन में महत्वपूर्ण यह है कि हम सचेत होकर निर्णय लें। इसी तरह खेल में सफलता तब मिलती है जब ध्यान खेल पर हो, न कि जीत, प्रशंसा या दूसरों को प्रभावित करने पर। परिणाम की चिंता बढ़ते ही एकाग्रता टूटती है और प्रदर्शन प्रभावित होता है।

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Animal Cruelty
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35 की उम्र आते ही खिलाड़ी महिला से कहा जाने लगता है कि अब खेल छोड़ो, बच्चों को मौका दो। हम मान लेते हैं कि यह उम्र और शरीर की मजबूरी है। पर ध्यान से देखें तो शरीर का तर्क टिकता ही नहीं। असल दबाव उस सिखाई गई मान्यता का है जो महिला को उसके शरीर और उससे जुड़ी भूमिकाओं से ही तौलती है, और जिसे हम अपनी ही सोच मान बैठे हैं। जो आवाज़ें हमें बताती हैं कि हमारी ज़िंदगी का क्या करना है, क्या हम ईमानदारी से देख पाएँगे कि वे आवाज़ें किसकी हैं?

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क्या पीरियड्स में महिलाएं सच में कमजोर हो जाती हैं? आचार्य प्रशांत का जवाब
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पीरियड्स से महिलाएं कमजोर नहीं होतीं, फिर भी यह मान्यता सदियों से चली आ रही है। आचार्य प्रशांत बताते हैं कि हर ऐसी मान्यता के पीछे किसी का डर या स्वार्थ छुपा होता है। सिर्फ तर्क या जानकारी से बदलाव नहीं आता, जब तक हम खुद अपने भीतर के इस डर या स्वार्थ को पहचानकर उससे मुक्त होने का चुनाव न करें। असली आज़ादी वहीं से शुरू होती है जहां हम मूर्खता की बातों को पीछे छोड़ना सीखते हैं और सोच-समझकर संगति का चुनाव करते हैं।

क्या पीरियड्स में महिलाएं सच में कमजोर हो जाती हैं? आचार्य प्रशांत का जवाब
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Women Empowerment
"प्रेम" की सच्चाई जाँचने के कुछ तरीके
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"प्रेम" की सच्चाई जाँचने के कुछ तरीके

स्त्री-पुरुष के रिश्तों में समस्या केवल आकर्षण या कामना की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की है जिसमें दोनों एक-दूसरे को अपनी इच्छाओं का साधन बना लेते हैं। पुरुष स्त्री को शरीर और स्त्री पुरुष को धन, सुरक्षा या सुविधा के माध्यम के रूप में देखने लगती है। इससे निर्भरता, कुंठा और संघर्ष पैदा होते हैं। स्वस्थ संबंध के लिए आत्मज्ञान, स्पष्टता, समानता, स्वतंत्रता और अपनी इच्छाओं की विवेकपूर्ण जाँच ज़रूरी है। साथ ही, रिश्तों के बने-बनाए सामाजिक मॉडलों पर पुनर्विचार करना और किसी भी व्यक्ति को अपनी मुक्ति का साधन न बनाना आवश्यक है।

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रामानुजन का सपना था भारत को वैज्ञानिक रूप से सशक्त बनाना। वे मानते थे कि “गणित हर विज्ञान की आत्मा है।” श्रीनिवास रामानुजन ने अपने संघर्ष और प्रतिभा से दुनिया को चौंका दिया, लेकिन उनके जीवन का संदेश इससे भी बड़ा था — ज्ञान, समर्पण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ जीवन को समझना।

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आचार्य नागार्जुन – जीवन वृतांत
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आचार्य नागार्जुन – जीवन वृतांत

आचार्य नागार्जुन की जीवन कथा का आंरभिक विवरण चीनी भाषा में उपलब्ध है, जिसे क़रीब 405 ई. में प्रसिद्ध बौद्ध अनुवादक कुमारजीव ने उपलब्ध कराया। यह अन्य चीनी एवं तिब्बती वृत्तांत से सहमत हैं कि नागार्जुन दक्षिण भारत में एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। ऐतिहासिक रूप से बचपन की…

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हेमलेखा - जीवन वृतांत
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हेमलेखा - जीवन वृतांत

हेमलेखा की कहानी बड़ी अनूठी है। श्री दत्तात्रेय द्वारा रचित त्रिपुरा रहस्य में उनकी कहानी पढ़ने को मिलती है। एक तपस्वी ऋषि की पुत्री, विद्वत्ता ऐसी कि ऋषिगण आनंदित हो जाते, सौंदर्य ऐसा कि राजे मोहित हो जाते।सभी को हैरान कर देता हेमलेखा का विवेक। शारीरिक सुंदरता का उसे कोई घमंड नहीं था और राजाओं द्वारा विवाह के बदले सुख-सुविधाओं का लालच दिए जाने पर उसका सिर्फ़ एक उत्तर हुआ करता, जो खुशी सिर्फ़ पलभर की है, उसे आप खुशी कैसे मान लेते हैं?

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भीतर फौलाद तभी आता है जब जीवन फौलाद से टकराता है। जब तक सामने कोई बड़ी समस्या नहीं होगी, तुम्हारे भीतर ताकत बस सोई रहेगी, जगेगी नहीं। समस्या आविष्कृत नहीं करनी है। समस्याएँ तो होती ही हैं, हम उनसे मुँह चुराते हैं क्योंकि पता होता है कि समस्याओं का सामना करने का दम नहीं है। दम विकसित करना हो तो जिन समस्याओं से मुँह चुराते रहे हो, उनसे जूझ जाओ। मार पड़ेगी, चोट लगेगी, दर्द होगा, लेकिन ताकत विकसित हो जाएगी।

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वासना और डर - समस्या कहाँ है?
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वासना और डर - समस्या कहाँ है?

तुम्हारे घर में कोई चीज़ अँधेरे में रखी थी, कोई आकर उस पर थोड़ी रोशनी डाल सकता है। उस पर थोड़ा प्रयोग करके बता सकता है कि ये चीज़ सड़ी हुई है। उसके आगे का काम तो तुम्हारी नीयत का है। उसको उठा के बाहर तुम्हें ही फेंकना पड़ेगा। नीयत, फ़ैसला, ईमानदारी, इनका कोई विकल्प नहीं होता। डूबे रहो इधर-उधर की चीज़ों में, वासना हो, डर हो। जिस दिन तुम जलोगे, उस दिन डर और वासना भी जल जाएँगे। कहानी कभी न कभी तो ख़त्म होनी है। या तो ख़ुद अभी ख़त्म कर लो, नहीं तो चिता पर ख़त्म हो जाएगी। मर्ज़ी है।

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अज्ञान का दूसरा नाम शोषण है। जो आज अपनेआप को शोषित कह रहा है, वो भीतर- ही- भीतर तैयारी करके बैठा है कि कल शोषण करूँगा। तो जो आज का शोषित है, वो कल का शोषक बनता है। हमें ये नहीं करना है कि संतुलन ला दिया और संतुलन का मतलब हुआ कि अब दोनों बराबर का शोषण करेंगे। वो कोई संतुलन नहीं होता है। हमें ये करना है कि जो शोषण का मूल कारण ही है उसको मानव मात्र के भीतर से हटा दें।

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रिश्ते केवल किसी का दिल न टूटे, इस डर से नहीं निभाए जाने चाहिए। अज्ञान और झूठ पर टिके संबंध सत्य के सामने बदल जाते हैं। किसी की झूठी मान्यता को बचाना प्रेम नहीं, बल्कि उसकी ज़िंदगी को भ्रम में रखना है। इसलिए रिश्तों में भावनाओं से ऊपर बोध और सत्य को स्थान दें। झूठ हटाने और सच स्वीकारने का साहस रखें। ज्ञान रिश्ते को तोड़ने या जोड़ने के बजाय उसे उसकी उचित जगह देता है।

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