
प्रश्नकर्ता: अपूर्वा हैं, अगर कोई हमारी किसी कमज़ोरी का फ़ायदा उठाए, हमें बार-बार परेशान करे तो हम उस समय पर न्यूट्रल (तटस्थ) कैसे बने रहें?
आचार्य प्रशांत: देखो, दो-तीन तरह की परेशानियाँ होती हैं जो लोगों को लगती हैं। मान लो, तुम ट्रेन में जा रही हो, भारतीय रेल। अब…







Many of us promise our parents high marks, and when the result falls short, the guilt can feel heavier than the exam itself. But no one controls results; they depend on far too many things outside us. What is in our hands is our intent, our effort and our honesty with what we study. The Bhagavad Gita says the same: our right is to action alone, never to its fruit. What if the only promise we made was to study honestly and with love?

Break it down. Just ask yourself, “How much is to be done right now,” and that’s all. Beyond that I don’t bother. You know, how the Upanishads put it? They say, “Yes, it’s infinite but it’s also very immediate; very, very far, but I also know that it’s also very immediate.” So, I’ll focus on the immediacy. Why horrify myself with the thought of the infinite? I would rather remain humble and think only of the immediate.







Questioner (Q): Life comes with so much chaos and sometimes exposes the order. So when there is chaos, we feel challenging, and we try to overcome them, and then we try to look for orders. But even when there is so much order, we feel like something is not happening

Acharya Prashant (AP): I was asked how to get out of aggressiveness. First of all, you have to totally forget that aggressiveness is the issue. All problems arise from ignorance, all problems including aggressiveness. And it is a part of ignorance to assume that aggression is an important problem or


प्रश्नकर्ता: आज हमारे साथ मौजूद है एक ऐसी सख्सियत जिन्हें हम गुरु, हमारे टीचर,


छोटे आदमी की सज़ा ये कि उसकी ज़िंदगी में सब छोटे-छोटे मुद्दे होंगे। यही मुद्दा होगा कि इतने से इतने बजे तक पानी आता है, पोछा लगाया कि नहीं लगाया, भैंस का दूध लेना है कि गाय का दूध लेना है, नौकरी में फलाने को नीचा कैसे दिखाना है, ऊपर

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप कहते हैं कि तनाव गलत जीवन जीने का परिणाम है। पर यदि मेरा जीवन ही गलत है तो मुझे हर समय तनाव क्यों नहीं रहता?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरे जीवन में कोई उपलब्धि नहीं है। बड़ा दुःख है, कैसे बाहर निकलूँ? मेहनत ख़ूब करी है लेकिन नतीजे नहीं मिले। पढ़ाई को भी पूरी ज़िंदगी बहुत महत्व दिया, लेकिन घर वालों ने हमेशा सुनाया ही है। फ़िलहाल मेरी उम्र 32 वर्ष की है।



Questioner (Q): Good evening, sir. In many places, especially in college, it is seen that the person starts drinking or smoking just because of peer pressure because he has a fear that if he doesn't do this, his group will throw him out. So, what are your views regarding this…
आचार्य प्रशांत: जो तनावग्रस्त है, उसकी ज़िन्दगी में तनाव, चिंता और मनोविकार लगातार है। बस वो कुछ मौकों पर प्रदर्शित हो जाता है। ये आपके लिए कोई खुशखबरी नहीं है कि आपका तनाव दिन में दो-चार घंटे ही प्रकट होता है। ऐसे समझ लीजिए, यदि आपका तनाव चौबीस घंटे बना…
Questioner: Why do people commit suicide?
Acharya Prashant: They still have a lot of hope. They feel that suicide would redeem them. They have not given up everything. They are still carrying a lot of hope. If I do not know what is beyond life, how can I enter that…
A modern woman calls herself liberated, yet lives anxious — anxious about age, desirability, marriage, motherhood. Acharya Prashant exposes this anxiety as proof that feminism never touched the real wound: centuries of conditioning that reduced women to bodies for pleasure and reproduction. External equality isn't enough. True freedom demands she reject the entire inheritance of tradition and simply become human — not woman, not wife, not mother by decree, but free.
मन एक रस्सी की तरह है, जिसे दस दिशाओं से — भविष्य, अतीत, रिश्ते, सोशल मीडिया जैसी ताक़तें खींचती हैं। हर कोई हमें ग़ुलाम बनाना चाहता है, और हम बनते जाते हैं; यही तनाव है। इससे मुक्त होना कठिन नहीं, बस यह भ्रम छोड़ो कि कोई सहारा चाहिए, क्योंकि जो भी आएगा, वह अपने अनुसार ही खींचेगा। इसलिए साहस जुटाओ और अपने क़दमों पर चलो — दो-चार बार गिरो, चोट खाओ, पर रस्सी की तरह मत बनो: बेजान, मुर्दा, ग़ुलाम।
अध्यात्म के बिना, चाहे हम बाहर कितना भी कुछ पा लें — पद, प्रतिष्ठा, ज्ञान — फिर भी डर और तनाव से नहीं बच पाते। व्यक्ति के पास ऐसा कुछ होना चाहिए जिसे संसार का कुछ भी छू न सके — जिसका उल्लेख श्रीकृष्ण अर्जुन से करते हैं: ‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि’; न शस्त्र उसे काट सकते, न अग्नि जला सकती है। पहले झूठ काटना पड़ेगा। जैसे-जैसे वो कटता जाता है, वैसे-वैसे तुम उसको पाते जाते हो जो बिल्कुल तुम्हारा अपना है। उसके बाद कोई बाहरी दबाव तुमको परेशान नहीं कर पाएगा।
काम तनाव तभी देता है जब आप काम सही कारणों से न कर रहे हों। जब आप सही कारणों से काम नहीं करते तो आप दो ही चीज़ों का इंतज़ार करते हो — एक रविवार का और दूसरा सैलरी डे का। काम का अंतिम उद्देश्य पैसा नहीं हो सकता। आपको काम में अर्थ ढूँढना पड़ेगा। कुछ ढूँढिए जिसमें सौंदर्य हो, सार्थकता हो, बड़ी कोई चुनौती की बात हो। तब फिर उस काम में आप घंटे नहीं गिनते, उस काम में आप परिणाम की ओर भी नहीं देखते।
बड़े मैच में उतरते ही हाथ बेड़ियों में जकड़े लगते हैं, और हम घबराहट सँभालने की कोई तरकीब खोजते हैं। पर मैदान बदल जाता है, भीतर का केंद्र नहीं बदलता। जो रोज़ की ज़िंदगी में हर काम से मनचाहा नतीजा माँगता है, वह बड़े दिन भी वही माँग लेकर उतरता है। मेडल पक्का होते ही दबाव उतर जाना भी यही बताता है, और जो जीत पर इतराता है, वही हार से घबराता है। ज़िंदगी की ऊँचाई हमेशा मेडल के रूप में सामने नहीं आती। क्या हम देख पाएँगे कि हम नतीजे को कितना पकड़े हुए हैं?
Questioner (Q): Man is typically a social animal who seeks to coexist with the society around him. I am a vegan but many people around me are not, and that creates a difficulty for me. I want to speak out my thoughts on animal cruelty and get into animal activism,…
डर और तनाव मूलतः इसी भाव से निकलते हैं कि कोई दूसरा है जो मेरा कुछ छीन सकता है और कोई दूसरा है जो मुझे कुछ दे सकता है। जब तक तुमने यह धारणा बाँध रखी है, डर और तनाव से मुक्ति संभव नहीं। सदा अपने आपको यही बताओ — मैं लाख गिरूँ तो भी मेरा कुछ नहीं बिगड़ सकता। जब इस भाव में जियोगे, तब न डर रहेगा न तनाव।
Questioner: I am a research scholar. I am in my fourth year of PhD, and it is kind of my second inning. Earlier I was a teacher, I was teaching at a university, but I’ve left that and I have started my PhD.
I’ve been suffering from a condition for…
चिंता का कोई कारण नहीं होता, चिंता बस होती है, और जो मन चिंताग्रस्त है वो चिंता के बहाने खोज लेता है। अगर किसी को रुपयों की चिंता हो, और वो सुलझ जाए, तो मन तुरंत नई चिंता का कारण ढूंढ लेता है। जब तुम पूरी तरह वही कर रहे हो जो उस समय जरूरी है, तो चिंता के लिए समय ही नहीं होगा। चिंता के लिए सोचना पड़ता है, और जब दिमाग पूरी तरह व्यस्त हो, तो सोचने का वक्त ही नहीं मिलता।
Question: How do I cope with the stress that is likely to come in the next four years?
Acharya Prashant: Let’s understand this situation right now.
(Acharya Ji is talking to the first year students of a premier Engineering institution of India. The duration of the entire course is four…
Questioner: How to stop the immediate reaction when we feel hurt?
Acharya Prashant: Why stop it? You don't like that reaction, right? Who is this one who doesn't like that reaction Manish (questioner)? You have said, “The reaction comes when you get hurt.” I am asking you to consider, “Is…
आचार्य प्रशांत: वह प्रजापतियों की सृष्टि करके सब पर अपना आधिपत्य रखता है। जैसे सूरज अकेले ही सबको प्रकाशित करते हैं। प्रकाश के स्रोत दो नहीं, प्रकाश के दो नहीं स्रोत हैं, एक है। वैसे ही वह प्रकाश स्वरुप है और वर्णीय है। वर्णीय माने उसी को चुनना, उसी का…
आचार्य प्रशांत जी आपका बहुत बहुत स्वागत है। सर,…
आचार्य प्रशांत: अब किसी के जीवन के सारे ढर्रे ही तनाव, ऊब, बैचैनी से भरे हुए हैं और वो कहे, ‘मुझे सिगरेट छोड़ देनी है’। सिगरेट की आदत छूटेगी नहीं क्योंकि आपके पास पाँच और आदतें हैं जो सिगरेट को आमन्त्रित करती हैं। जब तक आप उन पाँच और आदतों…
आचार्य प्रशांत: यह हर समय मौजूद होता है नहीं तो कभी-कभार परिलक्षित क्यों होता? आपके घर में कभी-कभार साँप दिखाई देता…
आचार्य प्रशांत: तुम्हें…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कल मेरी परीक्षा है, लेकिन मन शांत नहीं है। मैंने प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय वर्ष में विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त किया। पर इस वर्ष ऐसा हो रहा है कि मन बड़ा अशांत है। कुछ ही घण्टे बचे हैं। आपका आशीर्वाद मिल जाएगा तो कल का दिन…
सभी समस्याओं से एक झटके में मुक्ति रामबाण सूत्र ठंड रख!
आचार्य प्रशांत: एक सीमा से ज़्यादा तनाव सहने की आदत ही नहीं होनी चाहिए।
“थोड़ा बहुत चलेगा, ज़्यादा करोगे तो हम सो जाएँगे।”
‘सो जाएँगे’ माने ग़ायब हो जाएँगे। ये जीवन जीने का एक तरह का तरीका है, एटिट्यूड…
वक्ता: प्रश्न है कि कभी-कभी समस्या इतना बड़ा रूप ले लेती है कि बड़ा तनाव हो जाता है, उससे बाहर कैसे निकालें अपने आप को? अश्विनी दो विकल्प दे रहा हूँ, पहला कि समस्या से अपने आप को बाहर कैसे निकालें और दूसरा यह कि समस्या पैदा ही न हो।…

15 नवंबर को गीता सत्र से कुछ घंटे पहले, देश की बड़ी पशु कार्यकर्ता, गौरी मौलेखी जी का एक संदेश आया। उन्होंने आचार्य जी से नेपाल में होने वाले ‘गढ़ीमाई महोत्सव’ के विषय पर बिहार के, मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और प्रेस से बातचीत के लिए पटना आने का अनुरोध किया। यह एक गंभीर मुद्दा था—हजारों जानवरों की जान बचाने का और एक सदियों पुरानी कुप्रथा के विरुद्ध आवाज़ उठाने का।

On the evening of November 15, just hours before a scheduled Gita session, a message arrived from Gauri Maulekhi, a prominent animal rights activist. She requested Acharya Prashant to join her in Patna the following morning to meet the Chief Secretary of Bihar and address the press about the Gadhimai festival in Nepal. This was no ordinary request. It was a plea to save thousands of animals and to raise a voice against a centuries-old practice of cruelty disguised as tradition.

How many hours do you spend meditating each day?
This is a trick question!
Whether you are “meditating” one hour per day or six, you are not truly meditating. This is because meditation is not something you do to escape life. Meditation is a way of life.
Meditation is to…

Research has shown that loneliness is found throughout the society, including among people in marriages along with other strong relationships, and those with successful careers. As a subjective emotion, people experience loneliness even when surrounded by other people.

Questioner: Would you please be able to explain to us the difference between the mind, the soul, the spirit, and consciousness?
Acharya Prashant: There is just consciousness; that consciousness requires physical support. That consciousness requires a physical support, right? That physical support is called: the man.
When we say consciousness,…

नवरात्रि में हम देवी की पूजा करते हैं और महिषासुर को बाहर का कोई दैत्य मान लेते हैं। पर दुर्गा सप्तशती का दूसरा चरित्र हमारी अपनी वृत्ति की कथा है। जो मन प्रकृति को केवल भोगने की वस्तु मानता है, जंगल काटता है, नदियाँ दूषित करता है, पशुओं को खाता है और कहता रहता है कि मुझे और चाहिए, वही महिषासुर है। त्यौहार उसी के वध के लिए है, उसे भोग लगाने के लिए नहीं। क्या इस नवरात्रि हम अपने भीतर के महिषासुर को पहचानेंगे?

नवरात्रि आते ही हम सोचने लगते हैं कि क्या खाना है, क्या नहीं खाना, कौन-सा हवन करना है। पर व्रत का अर्थ है संकल्प, और शुभ संकल्प एक ही है: हम जैसे हैं, वैसे न रहें। इसीलिए ये नौ दिन दुर्गा सप्तशती को समझने के लिए हैं, केवल रस्मों के लिए नहीं। जिसे हम माँ कहते हैं, वह यह पूरी प्रकृति है, और उसके ही बच्चों को चोट पहुँचाकर उसका पर्व नहीं मनाया जा सकता। क्या इस बार हम नौ दिन अपने ही जीवन को ईमानदारी से देख पाएँगे?

प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। सर आज काफ़ी अच्छे सीख थे सत्र में। और मेरा प्रश्न भी इस सत्र से ही सम्बन्धित है। सर, आपने बताया था कि मान्यताओं का सम्बन्ध अनुभव से है। प्रारम्भ में हमने चर्चा की था। यानी कि जो विकार हैं, वो भी एक तरह से मान्यताओं…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अष्टावक्र कहते हैं कि ध्यान की विधियाँ बंधन हैं। मेरी जिज्ञासा यह है कि इतनी सारी ध्यान की विधियाँ क्यों हैं?
आचार्य प्रशांत: विधियाँ उनके लिए हैं जिन्हें सत्य को तो पाना है और अपनी ज़िद को भी बचाना है। ख़ुदा को भी पाना है ख़ुद को…

प्रश्नकर्ता: एक चीज़ होती है मेंटल एजिलिटी (मानसिक चपलता), जैसे कि मैं कहीं बाइक से जा रहा हूँ और अचानक कोई मोड़ आ गया या एक कुत्ता बीच सड़क पर आ गया, तो मुझे एकदम से ब्रेक लगाने की आवश्यकता पड़ी। तो ये जो स्किल (कौशल) होती है एकदम से …

प्रश्नकर्ता: मन क्यों हमेशा सुरक्षा की तलाश में लगा रहता है? क्या हैं मन के सदा असुरक्षित अनुभव करने के कारण? मैं तो अध्यात्म में, आप में और शिविर इत्यादि में भी सुरक्षा की तलाश कर रहा हूँ कि संसार में सुरक्षा न मिली तो सत्य में मिल जाए। मैं…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, आपने कहा था कि ग़लती ‘मैं’ भाव से आती है। तो इसके साथ ही अक्सर हम अपनेआप को ये तर्क देते हैं कि मुझसे ये ग़लती हो गयी, ये मैं नहीं थी। तो ये ‘मैं’ भाव क्या है? और ग़लती किसको कहा जा रहा है तब?…

आचार्य प्रशांत: ध्यान की एक विधि। उत्सुकता आयी थी कि ध्यान की एक विधि दी जाए। तो आपमें से जो लोग उसके बारे में जानना चाहें, वो समझें।
शून्य-स्मरण। शून्य-स्मरण – जो कुछ भी बहुत आवश्यक और ज़रूरी लगता हो, जो कुछ भी नितांत क़रीबी, आवश्यक प्रतीत होता हो, उसको…

प्रश्नकर्ता: साक्षी भाव के लिए ध्यान की आवश्यकता है?
आचार्य प्रशांत: साक्षी भाव और ध्यान एक ही बात है। ध्यान साक्षित्व का माध्यम नहीं है। थोड़ा समझेंगे, ध्याता हम सब सदा हैं, ऐसा नहीं कि जब आप कुछ विशिष्ट पलों में ध्यान लगाने बैठते हो तभी आप ध्यानी होते हो।…

प्रश्नकर्ता: कई लोग जैसा बोलते हैं कि तुम संसार को छोड़कर यदि कुछ और तरफ जा रहे हो, तो वो पलायनवादिता है। असली स्पिरिचुअलिटी (आध्यात्मिकता) वो है जब तुम सब चीज़ों के बीच में रहते हुए, वो हो सको। तो इस बारे में थोड़ा सा प्रकाश डालें प्लीज़।
आचार्य प्रशांत:…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। आपका एक वीडियो था, वो अभी हाल ही में आया था और उसको कई सारे साथियों ने देखा। और मैं उस वीडियो के कमेंट्स को पढ़ रहा था तो मैंने वहाँ पर देखा कि कई सारी जिज्ञासाएँ थीं, लोगों के सवाल थे, जो मुझे वहाँ मिले और…

Acharya Prashant: It has been told to us that there exist two centers. I suppose it has been very freshly told to you right? Very recently. He says, “How do I know that I am living out of the right center? How does a young man know whether he’s not…

प्रश्नकर्ता: जो अभी जिज्ञासा है मेरी आचार्य जी, यूट्यूब पर एक शॉर्ट्स देखा था, उसके सम्बन्ध में है। तो एक बहुत सुप्रसिद्ध व्यक्ति जो श्रीमद्भगवद्गीता पर बोलते हैं उनका वह शॉर्ट्स देखा था; काफ़ी चल रहा है, बार-बार मेरे फीड पर आया। तो वो निष्काम कर्म पर बोल रहे थे…

जिन वज़हों से एक आदमी दुखी है, उन्हीं वज़हों से पूरी दुनिया दुखी है, चाहे कोई भी हो। आदमी हो और आदमी का दर्द अलग-अलग नहीं है। बच्चे और बूढ़े का दर्द अलग-अलग नहीं है। ऊपर-ऊपर से लगेगा कारण अलग हैं, स्थितियाँ अलग हैं, गहराई में दर्द, दर्द एक है। दुख के यही मूल कारण हैं। न जानना ‘अज्ञान’, और न झुकना ‘अविश्वास।’